हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। - सैयद अमीर अली मीर।

Find Us On:

English Hindi

काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

Article Under This Catagory

पिता के दिल में माँ - अमलेन्दु अस्थाना

उस दिन बहुत उदास थी माँ,
चापाकल के चबूतरे पर चुपचाप बैठी रही,
आसमान को काफी देर निहारती हुई एकटक,
माँ को माँ की याद आ रही थी,
और पिताजी ने मना कर दिया था नानी के घर पहुंचाने से,
उस दिन फीकी बनी थी दाल,
कई दिनों तक माँ-पिताजी के रिश्तों में कम रहा नमक,
रोटियां पड़ी रहीं अधपकी सी,
घर लौटे बिना खाए लेटे रहे पिताजी,
उस दिन गर्म दूध हमें देते वक्त टप से गिरे थे माँ के आंसू,
और फट गया था सारा दूध रिश्तों की तरह,
उस दिन सुबह पिताजी का तकिया भी भीगा हुआ सा मिला,
बहुत छोटा सा मैं उन दिनों समझ नहीं पाया रिश्तों की कशमकश,
आज जब मैंने रोक दिया बबली को मायके जाने से
तब शायद समझ पाया, वो पुरुष मानसिकता नहीं थी पिताजी की,
दरअसल वो बहुत प्यार करते थे माँ से,
नहीं रहना चाहते थे एक पल भी अलग,
और मुझे याद है कुछ दिन बाद,
पिताजी माँ और हमें छोड़ आए थे नानी के गांव,
और गर्मी छुट्टी बाद जब हम मामा संग लौटे,
शाम को चापाकल के उसी चबूतरे पर पिताजी मिले हमारा इंतजार करते हुए।

 
चल मन | रैदास के पद  - रैदास | Ravidas

चल मन! हरि चटसाल पढ़ाऊँ।।
गुरु की साटी ग्यान का अच्छर,
बिसरै तौ सहज समाधि लगाऊँ।।
प्रेम की पाटी, सुरति की लेखनी,
ररौ ममौ लिखि आँक लखाऊँ।।
येहि बिधि मुक्त भये सनकादिक,
ह्रदय बिचार प्रकास दिखाऊँ।।
कागद कँवल मति मसि करि निर्मल,
बिन रसना निसदिन गुन गाऊँ।।
कहै रैदास राम भजु भाइ,
संत राखि दे बहुरि न आऊँ।।

 
हौसला - देवेन्द्र कुमार मिश्रा

कागज की नाव बही
और डूब गई
बात डूबने की नहीं
उसके हौसले की है
और कौन मरा कितना जिया
सवाल ये नहीं
बात तो हौसले की है
बात तो जीने की है
कितना जिया ये बात बेमानी है
किस तरह जिया
कागज़ी नाव का हौसला देखिये
डूबना नहीं।

 
कभी कभी यूं भी हमने - निदा फ़ाज़ली

कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है

 
उपदेश : कबीर के दोहे  - कबीरदास | Kabirdas

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख ऊपजै, और ठगे दुख होय॥

 
सृजन-सिपाही - श्रवण राही

लेखनी में रक्त की भर सुर्ख स्याही
काल-पथ पर भी सृजन के हम सिपाही,
तप्त अधरों पर मिलन की प्यास लिखते हैं
हम धरा की देह पर आकाश लिखते हैं

 
छाप तिलक सब छीनी - अमीर खुसरो

अपनी छवि बनाइ के जो मैं पी के पास गई,
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैंना मिलाइ के
बात अघम कह दीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाइ के।

 
उड़ान - राज हंस गुप्ता

ऊँचे नील गगन के वासी, अनजाने पहन पाहुन मधुमासी,
बादल के संग जाने वाले,
पंछी रे, दो पर दे देना !
सीमाओं में बंदी हम, अधरों पीते पीड़ा का तम:
तुम उजियारे के पंथी, मेरी अंधियारी राह अगम!
बांहों पर मोती बिखराए, आँखों पर किरणें छितराए,
ऊषा के संग आने वाले
पंछी रे, दो पर दे देना !
तुमसे तो बंधन अनजाने, तुम्हें कौन-से देस बिराने?
मैं बढूं जिधर उधर झेलूं अवरोधक जाने पहचाने|
अधरों पर मधुबोल संजोये, पावनता में प्राण भिगोये,
मुक्ति-गान सुनाने वाले
पंछी रे, दो पर दे देना !

- राज हंस गुप्ता
profgupt@gmail.com

 
हिन्दी-हत्या - अरुण जैमिनी

सरकारी कार्यालय में
नौकरी मांगने पहुँचा
तो अधिकारी ने पूछा-
"क्या किया है?"

 
छोटी कविताएं - मदन डागा

अकाल

आओ दोस्त,
धन्धा करे
अकाल पड़ा है
चन्दा करें।

 
बे-कायदा - माया मृग

जब भी मैं
जागने की
कोशिश करता हूँ
सो जाता हूँ।
पर अक्सर
जागता हूँ
जब भी बाकायदा
सोने की
कोशिश करता हूँ।
यह बात
सीधे तौर पर
मुझे समझाती है
कि जीवन
बाकायदा नहीं
अपनी ही
मरजी से
चलता है।

 
भटकता हूँ दर-दर | ग़ज़ल - त्रिलोचन

भटकता हूँ दर-दर कहाँ अपना घर है
इधर भी, सुना है कि उनकी नज़र है

 
रोटी और संसद - सुदामा पांडेय धूमिल

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ-
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

 
मैंने जाने गीत बिरह के - आनन्द विश्वास

मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है,
कदम-कदम पर मिली विवशता, साँसों में विश्वास नहीं है।
छल से छला गया है जीवन,
आजीवन का था समझौता।
लहरों ने पतवार छीन ली,
नैया जाती खाती गोता।
किस सागर जा करूँ याचना, अब अधरों पर प्यास नहीं है,
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।

 
पैरोडी - कवि चोंच

[रसखान के एक छंद की ‘पैरोडी' ]

 
चार हाइकु  - तपेश

जूते ठाट के -
जैसे बड़े लाट के,
आज के राजे।

 
दस हाइकु - अशोक कुमार ढोरिया

नेक इरादे
चुनौतियां अपार
हार न माने

 
राजनीतिक गठबंधन - प्रवीण शुक्ल

दोनों ने सोचा कि साथ चलने में फ़ायदा है
इसलिए ये भी, वे भी साथ दौड़ रहे हैं।

 
गुम होता बचपन - डा. अदिति कैलाश

अक्सर देखती हूँ बचपन को
कचरे के डिब्बों में
पॉलीथीन की थैलियाँ ढूंढते हुए
तो कभी कबाड़ के ढेर में
अपनी पहचान खोते हुए ।

कभी रेहड़ियों पर तो
कभी ढाबे, पानठेलों पर
और कभी बड़ी कोठिओं में
पेट के इस दर्द को मिटाने
अपने भाग्य को मिटाते हुए ।

स्कूल, खेल, खिलौने, साथी
इनकी किस्मत में ये सब कहाँ
इनके लिए तो बस है यहाँ
हर दम काम और उस पर
ढेरों गालियों का इनाम ।

दो वक्त की रोटी की भूख
छीन लेती है इनसे इनका आज
और इन्हें खुद भी नहीं पता चलता
दारु, गुटका और बीड़ी में
अपना दर्द छुपाते छुपाते
कब रूठ जाता है इनसे
इनका बचपन सदा के लिए ।

और इसी तरह
जाने अनजाने
समय से पहले ही
बना देता हैं इन्हें बड़ा
और गरीब भी ।

 
तख्त बदला ताज बदला, आम आदमी का आज न बदला! - आवेश हिन्दुस्तानी

महाराष्ट्र में धरती के पाँच लालों ने की, आर्थिक तंगीवश खुदकुशी,
छत्तीसगड में 8 महिलाओं की सरकारी शिविर लापरवाही ने जान ली !
राजस्थान में पचास साल की महिला को सरेआम निर्वस्त्र घुमाया,
अच्छे दिनों के सपनों ने हमें किस हकीकत में ला पहुँचाया ?
तख्त बदला ताज बदला, आम आदमी का आज न बदला !

एम्स में एक ने बुलन्द की थी जिसके विरुद्ध ईमान की आवाज,
उसी के हिमायती को पहनाया गया स्वास्थ्य-मंत्री का ताज,
अर्थात ईमानदार से लिया ही जायेगा ईमानदारी का बदला,
तख्त बदला ताज बदला पर आम आदमी का आज न बदला ।

राजाओं के राज की तरह आज भी एक फैसला लिया गया,
नये मंत्री द्वारा रेलकर्मियों को इनाम उद्घोषित किया गया,
जो रेलकर्मी रेल क्रौसिंग प्रकल्प में भूमिका निभायेगा,
उसे पाँच लाख का नकद इनाम दिया जायेगा ।
रेलकर्मी सरकारी सेवा में होने से पहले ही सुखी सम्पन्न है,
असंगठित मजदूर, मजबूर किसान इन फैसलों से मरणासन्न है !
तख्त बदला ताज बदला, आम आदमी का आज न बदला!


 
तुम वाकई गधे हो  - शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi

एक गधा
दूसरे गधे से मिला
तो बोला- "कहो यार कैसे हो?"
दूसरा बोला- "तुम वाकई गधे हो
एक साल होने को आया
एक ही जगह बंधे हो
डाक्टरों ने दल बदले
मगर तुमने
खूंटा तक नहीं बदला।"
तभी बोल उठा पहला-
"सामने वाले बंगले में
दो नेता रहते हैं
रोज आपस में लड़ते हैं
एक कहता है तुमसे गधा अच्छा
दूसरा कहता है गधे का बच्चा
और मैं यह जानना चाहता हूं
कि वो कौन-सा नेता नेता है
जो मेरा बेटा है।"

 
ये जो शहतीर है | ग़ज़ल - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो

 
अंजुम रहबर की दो ग़ज़लें  - अंजुम रहबर

फूलों पे जान दी

फूलों पे जान दी कभी कांटों पे मर लिये
दो दिन की ज़िन्दगी में कई काम कर लिये

 
राष्ट्रीय एकता  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

कितना भी हल्ला करे, उग्रवाद उदंड,
खंड-खंड होगा नहीं, मेरा देश अखंड।
मेरा देश अखंड, भारती भाई-भाई,
हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-पारसी या ईसाई।
दो-दो आँखें मिलीं प्रकृति माता से सबको,
तीन आँख वाला कोई दिखलादो हमको।

 
मोल करेगा क्या तू मेरा? - भगवद्दत ‘शिशु'

मोल करेगा क्या तू मेरा?
मिट्‌टी का मैं बना खिलौना;
मुझे देख तू खुशमत होना ।
कुछ क्षण हाथों का मेहमां हूं, होगा फिर मिट्‌टी में डेरा ।
मोल करेगा क्या तू मेरा ?

 
हर एक चेहरे पर | ग़ज़ल - शांती स्वरूप मिश्र

हर एक चेहरे पर, मुस्कान मत खोजो !
किसी के नसीब का, अंजाम मत खोजो !

 
न जाने इस जुबां पे | ग़ज़ल - शांती स्वरूप मिश्र

न जाने इस ज़ुबां पे, वो दास्तान किसके हैं!
दिल में मचलते हुए, वो अरमान किसके हैं!

 
एक दरी, कंबल, मफलर - अशोक वर्मा

एक दरी, कंबल, मफ़लर, मोजे, दस्ताने रख देना
कुछ ग़ज़लों के कैसेट, कुछ सहगल के गाने रख देना

 
रिश्ते, पड़ोस, दोस्त - उर्मिलेश

रिश्ते, पड़ोस, दोस्त, ज़मीं सबसे कट गए
फिर यूँ हुआ कि लोग यहाँ खुद से कट गए

 
अश्कों ने जो पाया है - साहिर लुधियानवी

अश्कों ने जो पाया है वो गीतों में दिया है
इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है

 
तुमने मुझको देखा... - श्री गिरिधर गोपाल

तुमने मुझको देखा मेरा भाग खिल गया ।
मेघ छ्टे सूरज निकला हिल उठीं दिशाएं,
दूर हुईं पथ से बाधा मनसे चिंताएं,
तुमने अंक लगाया मेरा शाप धुल गया ।

 
हिम्मत वाले पर - डॉ दीपिका

(एक लड़की जो पढ़ना चाहती है पर माँ के साथ सफाई बर्तन के काम करने पर मजबूर है)

 
कुछ छोटी कवितायें  - प्रीता व्यास

मिठास
तुम्हारी मुस्कराहट
की
बिलकुल जैसे
शगुन का
मोतीचूर।

 

 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश