अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।

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होली है आख़िर.. -  राजेन्द्र प्रसाद

होली है आख़िर मनाना पड़ेगा
मजबूर है दिल मिलाना पड़ेगा

सड़े डालडे की तली पूड़ियां हैं
वह कहते हैं अपने को खाना पड़ेगा

मूरत पर बारह बजे हैं मगर वो
कहते हैं ढोलक बजाना पड़ेगा

उड़ी चाय पी कर के होटल से मैना
मोहब्बत में दिल तो चुकाना पड़ेगा

बढ़ा लो बढ़ा लो अभी बाल अपने
औलाद होगी घटाना पड़ेगा

उन्हें चाय पर जब बुलाया गया
तो कहा आज ठर्रा पिलाना पड़ेगा

हो गया है मैंने उनका ‘मिनी' स्तर
उन्हें अब ‘मिनिस्टर' बनाना पड़ेगा


वह दिन नहीं दूर जबकि वतन में
होली में घर को जलाना पड़ेगा

- राजेन्द्र प्रसाद [गुदगुदी]

 
होली पद  - जुगलकिशोर मुख्तार

ज्ञान-गुलाल पास नहिं, श्रद्धा-रंग न समता-रोली है ।
नहीं प्रेम-पिचकारी कर में, केशव शांति न घोली है ।।
स्याद्वादी सुमृदंग बजे नहिं, नहीं मधुर रस बोली है ।
कैसे पागल बने हो चेतन ! कहते ‘होली होली है' ।।

 
किस रंग खेलूँ अबके होली - विवेक जोशी "जोश"

लाल देश पे क़ुर्बान हुआ
सूनी हुई एक माँ की झोली
किस रंग खेलूँ अबके होली...

 
अन्तस् पीड़ा का गहन जाल  - सागर

अधरों पर हास-------
सुख का परिहास।
हृदय मुखर, स्वर-आकुलित
प्रत्यक्ष शब्दविहीन कंठ
किस वेदना से है चूर-चूर
मेरी देह, मन, मेरी आत्मा
मुझे ज्ञात है, अनभिज्ञ है
ये जगत मेरा, मेरा निज, सखा।
कैसे कहूं, किस मुख कहूं
संताप का जो वितान है
पीड़ाकुलित मन प्राण है
मेरे प्रिय का प्रदान है
जिनने दिया यह क्लेश-धन
करता रहा संतप्त मन
उनके लिए मैं कौन हूँ
बस मैं हूँ अपने साथ
कुछ कहता नहीं, और मौन हूँ ।

 

 

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