हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। - देवव्रत शास्त्री।

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कविताएं

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झिलमिल आई है दीवाली - भारत-दर्शन संकलन

जन-जन ने हैं दीप जलाए
लाखों और हजारों ही
धरती पर आकाश आ गया
सेना लिए सितारों की
छुप गई हर दीपक के नीचे
देखो आज अमावस काली
सुंदर-सुंदर दीपों वाली
झिलमिल आई है दीवाली

 
शिव की भूख - संध्या नायर | ऑस्ट्रेलिया

एक बार शिव शम्भू को
लगी ज़ोर की भूख
भीषण तप से गया
कंठ का
हलाहल तक सूख !

 
प्रभु ईसा - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

मूर्तिमती जिनकी विभूतियाँ
जागरूक हैं त्रिभुवन में;
मेरे राम छिपे बैठे हैं
मेरे छोटे-से मन में;

 
रिसती यादें - श्रद्धांजलि हजगैबी-बिहारी | Shradhanjali Hajgaybee-Beeharry

दोस्तों के साथ बिताए लम्हों की
याद दिलाते
कई चित्र आज भी
पुरानी सी. डी. में धूल के नीचे
मात खाकर
दराज़ के किसी कोने में
चुप-चाप सोये हुए हैं।
दबी यादें हवा के झोंकों के साथ
मस्तिष्क तक आकर रुक जातीं,
कुछ यादें अभी भी ताज़ा हैं
कुछ धूमिल हो गईं
समय के साथ,
दोस्त तो अब भी मिलते हैं
पेज को लाइक करने वाले
फोटो पर कमेंट करने वाले
स्टेटस पर जोक करने वाले।
नए दोस्त भी मिले
तारीफ करने वाले,
तारीफ भरे शब्दों के साथ
स्माइलीज़ को मुंह पर चिपकाए
घण्टों चैट पर ठहाके लगाने वाले।
अब नहीं मिलते वे दोस्त
लेकिन ... अब नहीं मिलते!
नज़रें बार-बार
उसी दराज़ तक जाकर
रुक जातीं
दोस्ती की उन यादों पर
धूल अभी भी जमी है,
परतें इतनी कि
नहीं दिखते वे दोस्त अब
वे दोस्त ...
जिनके मन की बात को जानने के लिए
स्माइलीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती
अपनी दोस्ती की गहराई दिखाने के लिए
लाइक
कमेंट
की ज़रूरत नहीं पड़ती
एक सेकंड के लॉग इन के फासले पर
बैठे दोस्त...
अब नहीं मिलते वे दोस्त
अब नहीं मिलते।

 
दीवाली : हिंदी रुबाइयां - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

सब ओर ही दीपों का बसेरा देखा,
घनघोर अमावस में सवेरा देखा।
जब डाली अकस्मात नज़र नीचे को,
हर दीप तले मैंने अँधेरा देखा।।

 
अपनों की बातें - प्रीता व्यास | न्यूज़ीलैंड

बातें उन बातों की हैं
जिनमें अनगिन घातें थीं,
बातें सब अपनों की थीं।

 
स्वतंत्रता का दीपक  - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali


 
कवि आज सुना वह गान रे - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक।
नस-नस में जीवन झंकृत हो,
हो अंग-अंग में जोश झलक।

 
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग, प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।

 
साथी, घर-घर आज दिवाली! - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

साथी, घर-घर आज दिवाली!

 
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

 
दीपक जलाना कब मना है  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों, को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अंधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है।

 
जल, रे दीपक, जल तू - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

जल, रे दीपक, जल तू।
जिनके आगे अँधियारा है, उनके लिए उजल तू॥

 
यह दीप अकेला - अज्ञेय | Ajneya

यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

 
दिवाली के दिन | हास्य कविता - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

''तुम खील-बताशे ले आओ,
हटरी, गुजरी, दीवट, दीपक।
लक्ष्मी - गणेश लेते आना,
झल्लीवाले के सर पर रख।

 
फीजी - राजकुमार अवस्थी

प्रकृति-सुंदरी का अंत:पुर
फीजी नंदन-वन लगता है।

 
दिवाली वर्णन  - सोमनाथ

सरस दरस की दिवाली मान आजम खाँ,
राजत मनोज की निकाई निदरत हैं।
जगर मगर दिसा दीपन सो कर राखी,
तिनै पेखि दुजन पतंग पजरत हैं।
छूटत छबीली हथ-फूलन कों बृंद तामें,
ताकी दुति देखि हिये आनंद भरत हैं।
सो छबि अनंद मानों पावक प्रताप तरु,
फूल्यो ताकै चहुंघा तै फूल ये झरत हैं॥

 
लौट रहा हूँ गांव - अमलेन्दु अस्थाना

चलो ये शहर तुम्हारे नाम करता हूँ,
यहां के लोग मेरे हुए,
सारे पेड़ तुम्हारे, पंछी सारे मेरे हुए,
तुमको तुम्हारा शहर मुबारक,
मैं अपनों के संग लौट रहा हूँ गांव
अब तुम अकेले हो, ऐश्वर्य से भरपूर अपने शहर में,
लकदक रौशनी जगमग हैं चारों ओर
और सड़कें खामोश हैं, पेड़ मौन,
तीन दिन हो गए दुलारे के चूल्हे से धुआं निकले,
वहां बस राख है,
चाय के लिए शोर मचाने वाले सब गांव में हैं,
मंदिर की घंटियां, मस्जिद का लाउडस्पीकर बेजान सा है चुप्प
गांव के मंदिर में अष्टजाम हो रहा है उधर मस्जिद में अजान,
शहर की पूरी आत्मा गांव में धड़क रही है,
इधर शहर में ऐशो-आराम के बीच तुम अकेले हो बेचैन से,
हवा गुजर रही है सांय-सांय,
चांदनी तो है पर पड़ोस की चंदा नहीं
जो लोरी गाकर सुनाती थी अपने मोहन को,
रहमान भी नहीं, जो पीछे से टोक देता था तुम्हे,
पूछता था और कैसे हो भाई,
तुम बदहवास से हो, निढाल पड़े हुए,
तुम्हारी रोशनी का दरवाजा अंधेरे की ओर खुल रहा है,
तुम जागते हो और भागते हो गांव की ओर,
लिपट जाते हो दुलारे से और रहमान से,
चंदा से कहते हो लौट आओ,
तुम्हारी आंखें खुलीं हैं,
तुम समझ गए हो आदमी का महत्व।

 
दीवाली का सामान - भारत-दर्शन संकलन | Collections

हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिन में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मजा खुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का।