यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

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कविताएं

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आशा का दीपक - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से;
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का;
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा;
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

...

 
कुंती की याचना - राजेश्वर वशिष्ठ

मित्रता का बोझ
किसी पहाड़-सा टिका था कर्ण के कंधों पर
पर उसने स्वीकार कर लिया था उसे
किसी भारी कवच की तरह
हाँ, कवच ही तो, जिसने उसे बचाया था
हस्तिनापुर की जनता की नज़रों के वार से
जिसने शांत कर दिया था
द्रौणाचार्य और पितामह भीष्म को
उस दिन वह अर्जुन से युद्ध तो नहीं कर पाया
पर सारथी पुत्र
राजा बन गया था अंग देश का
दुर्योधन की मित्रता चाहे जितनी भारी हो
पर सम्मान का जीवन तो
यहीं से शुरु होता है!

...

 
शास्त्रीजी - कमलाप्रसाद चौरसिया | कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

पैदा हुआ उसी दिन,
जिस दिन बापू ने था जन्म लिया
भारत-पाक युद्ध में जिसने
तोड़ दिया दुनिया का भ्रम।

एक रहा है भारत सब दिन,
सदा रहेगा एक।
युगों-युगों से रहे हैं इसमें
भाषा-भाव अनेक।

...

 
हिन्दी दिवस - खाक बनारसी

अपने को आता है
बस इसमें ही रस
वर्ष में मना लेते
एक दिन हिंदी दिवस

...

 
वीर | कविता - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar


...

 
हिंदी जन की बोली है - गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur

एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।

...

 
छोटी कविताएं  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

कलयुग
...

 
मातृ-मन्दिर में - सुभद्रा कुमारी

वीणा बज-सी उठी, खुल गये नेत्र
और कुछ आया ध्यान।
मुड़ने की थी देर, दिख पड़ा
उत्सव का प्यारा सामान॥
...

 
हमारी हिंदी - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीवी है
बहुत बोलनेवाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली
...

 
पहचान - रोहित कुमार 'हैप्पी'

अपनी गली
मोहल्ला अपना,
अपनी बाणी
खाना अपना,
थी अपनी भी इक पहचान।
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हिंदी रूबाइयां - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

 
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अकाल और उसके बाद - नागार्जुन | Nagarjuna

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास‚
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
कई दिनों तह लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त‚
कही दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
...

 
कलगी बाजरे की - अज्ञेय | Ajneya

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरी बाजरे की।
अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद् के भोर की नीहार न्हायी कुँई।
टटकी कली चंपे की, वगैरह, तो
नहीं, कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है
बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के, तुम हो, निकट हो, इसी जादू के
निजी किस सहज गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूँ-
अगर मैं यह कहूँ-
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरे बाजरे की?
आज हम शहरातियों को
पालतू मालंच पर सँवरी जुही के फूल-से
सृष्टि के विस्तार का, ऐश्वर्य का, औदार्य का
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक
बिछली घास है
या शरद् की साँझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती
कलगी अकेली
बाजरे की।
और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूँ
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट जाता है
और मैं एकांत होता हूँ समर्पित।
शब्द जादू हैं-
मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं है?
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कलम, आज उनकी जय बोल | कविता - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

जो अगणित लघु दीप हमारे,
तूफ़ानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन,
मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएं,
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी,
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

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हिंदी मातु हमारी - प्रो. मनोरंजन - भारत-दर्शन संकलन | Collections

प्रो. मनोरंजन जी, एम. ए, काशी विश्वविद्यालय की यह रचना लाहौर से प्रकाशित 'खरी बात' में 1935 में प्रकाशित हुई थी।
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चाँद निकला - सत्यनारायण पंवार

जंगल में लहराते हरे पेड़ लगे हुए
चांद निकला रोशनी फैलाने के लिए
चांद अपनी चांदनी को है दमकाए
विरहणी को गहरी नींद से चाैंकाए
...

 
नई उड़ान - सोहेल खान

उड़ते हुए मुझे बहुत दूर जाना है
पंखो में न जोर, ना ही सहारा है।
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देखो बापू | कविता - पूनम शुक्ला

देखो बापू
कितनी हिंसा है
कितनी अराजकता है
कितनी लंबी टाँगें हैं
झूठ की
फरेब की काली चादर
ढक देती है
सत्य का प्रकाश

पर फिर भी
देखो बापू
सत्य डोलता है
इन रगों में
झूठ हार ही जाता है
देखो बापू
हार गए न दोनों
झूठा गुरु
और लुटेरा नेता

-पूनम शुक्ला

...

 
जन-गण-मन साकार करो - छेदीसिंह

हे बापू, इस भारत के तुम,
एक मात्र ही नाथ रहे,

जीवन का सर्वस्व इसी को

देकर इसके साथ रहे।

...

 
हिन्दी - गौरी शंकर वैद्य ‘विनम्र’

भारत माता के अन्तस की
निर्मल वाणी हिन्दी है।
ज्ञान और विज्ञान शिरोमणि,
जन-कल्याणी हिन्दी है।
भोजपुरी, अवधी, गढ़वाली,
ब्रज वीणा के तार रुचिर
देवनागरी रस की गागर,
वीणा पाणि हिन्दी है।
गौरवशाली भारतीयता की
परिभाषा हिन्दी है।
सरल, सुबोध, शब्द रस-सागर,
नूतन आशा हिन्दी है।
अखिल विश्व में सम्मानित जो फहराती है
कीर्ति-ध्वजा मातृ भूमि के गीत सुनाती,
जन प्रिय भाषा हिन्दी है।
अस्मिता मातृ भू की ललाम,
उन्नत ललाट की बिन्दी है।
अवधी की पावन सरयू है,
ब्रज भाषा कालिन्दी है।
दिनकर, मीरा, रसवान, पंत, जायसी,
प्रसाद, महादेवी महिमा गाकर हुए
अमर जो, उनकी आराध्या हिन्दी है।

...

 
तीन कवितायें - डॉ.प्रमोद सोनवानी

पर्यावरण बचाना है

 
...

 
हिंदी हम सबकी परिभाषा - डा० लक्ष्मीमल्ल सिंघवी

कोटि-कोटि कंठों की भाषा,
जनगण की मुखरित अभिलाषा,
हिंदी है पहचान हमारी,
हिंदी हम सबकी परिभाषा ।

...

 
अनुपम भाषा है हिन्दी - श्रीनिवास

अनुपम भाषा है हिन्दी
बढती आशा है हिन्दी !

...

 
एक भाव आह्लाद हो ! - डॉ० इंद्रराज बैद 'अधीर'

थकी-हारी, मनमारी, सरकारी राज भाषा है,
बड़ी दीन, पराधीन बिचारी स्वराज भाषा है ।
किसी के इंगितों पर डोलती यह ताज भाषा है,
जिस तरह चाहो, करो, हिन्दी तुम्हारी राजभाषा है ।

...

 
हिन्दी भारत की भाषा - श्रीमती रेवती

भाषा हो या हो राजनीति अब और गुलामी सहय नहीं,
बलिदानों का अपमान सहन करना कोई औदार्य नहीं ।
रवि-रश्मि अपहरण करने को मत बढें किसी के क्रूर हाथ
इन मुसकाते जल-जातों को यह सूर्य ग्रहण स्वीकार्य नहीं ।

...

 
हमारी सभ्यता - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे ।
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की ।। ४५ ।।
...

 
मेरी मातृ भाषा हिंदी  - सुनीता बहल

मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l
देश की है यह सिरमौर ,
अंग्रेजी का न चलता इस पर जोर l
विश्वव्यापी भाषा है चाहे अंग्रेजी,
हिंदी अपनेपन का सुख देती l
मेरी मातृ भाषा है हिंदी ,
जिसके माथे पर सुशोभित है बिंदी l

...

 
आओ ! आओ ! भारतवासी । - बाबू जगन्नाथ बी० ए०

आओ !  आओ ! भारतवासी ।
क्या बंगाली ! क्या मदरासी ! ॥

क्या पंजाबी ! क्या गुजराती ! ।
क्या सिंधी ! क्या पर्वतवासी ! ॥

हम हैं एकहि देश के वासी ।
एकहि बोली बोलैं खासी ॥

हिन्दी को सब मिलि अपनावै ।
वाहीको सब सीस नवावैं ॥

हिन्दी मेरी प्यारी प्यारी ।
नख सिख से लगती उँजियारी ॥

सुन्दर डोल सुडौल सुहाई ।
अंग अंग सुन्दरता छाई ॥

सिर में बेनी गुथी बनाई।
ओढ़नि तापर परम सुहाई ॥

पायन में पैजनिया भाई ।
सिर पर मुरछल चँवर ढुराई ॥

ऐसी हिन्दी महरानी की ।
देव नगर की सुख दानी को ॥

सरल स्वभाव दया खानी को ।
सत्यव्रती अखिला मानी की ॥

आओ हम सब मिलिके सारैं ।
तिलक हिन्द का और जुहारैं ॥

करैं पूरती भंडारे की।
दै दै तिन भेट यथा सक्ती ।

सम्मिलनी करके हिन्दी की ।
कह डालैं है जो कुछ जी की ॥
...

 
मेरा नया बचपन - सुभद्रा कुमारी

बार-बार आती है मुझको
मधुर याद बचपन तेरी।
गया, ले गया तू जीवन की
सबसे मस्त खुशी मेरी।।
...

 
विजयादशमी - सुभद्रा कुमारी

विजये ! तूने तो देखा है,
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म-भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुणा का धाम सखी !!
...

 
भारतेंदु की कविता  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। 
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

...

 
हिन्दी–दिवस नहीं, हिन्दी डे - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हिन्दी दिवस पर
एक नेता जी

बतिया रहे थे,

'मेरी पब्लिक से

ये रिक्वेस्ट है

कि वे हिन्दी अपनाएं

इसे नेशनवाइड पापुलर लेंगुएज बनाएं

और

हिन्दी को नेशनल लेंगुएज बनाने की

अपनी डयूटी निभाएं।'

...

 
तीनों बंदर बापू के | कविता - नागार्जुन | Nagarjuna

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!

सर्वोदय के नटवर लाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएंगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

लंबी उमर मिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

खूब होंगे मालामाल
खूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

सेठों क हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के
सत्य-अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के
मुस्काते हैं आंखें मीचे तीनों बंदर बापू के!

छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

मड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के!

दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के
गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के।

...

 
हिन्दी गान  -  महेश श्रीवास्तव

भाषा संस्कृति प्राण देश के इनके रहते राष्ट्र रहेगा।
हिन्दी का जय घोष गुँजाकर भारत माँ का मान बढ़ेगा।।

...

 
ये शोर करता है कोई  - मोहित कुमार शर्मा

कितना और बोले
कोई तो बताए
सुनाई देती नहीं
कोई तो समझाये
काबिल है कोई
देखता नहीं कोई
खो गया है कोई
ढूंढे तो कोई
फिर मत कहना कोई
ये शोर करता है कोई

...

 
ज़िन्दगी - अभिषेक गुप्ता

अधूरे ख़त
अधूरा प्रेम
अधूरे रिश्ते
अधूरी कविता
अधूरे ख्वाब
अधूरा इंसान

...

 
डूब जाता हूँ मैं जिंदगी के - अभिषेक गुप्ता

डूब जाता हूँ मैं ज़िंदगी के
उन तमाम अनुभावों में
जब खोलता हूँ अपने जहन की
एल्बम पन्ना दर पन्ना और
जब झांकता हूँ उन यादों में

कुछ यादें सकूं देती हैं
कुछ यादें परेशान करती हैं
कुछ प्रतिशोध की आग में जलाती हैं
तो कहीं कुछ हौसला भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों में

कहीं कुछ पाने की ख़ुशी है
तो कहीं कुछ खोने का भी है ग़म
कहीं भरोसे का मरहम है तो
कहीं छले जाने का मातम
कहीं दुश्मनों की कतार है
तो कहीं कुछ दोस्त भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों मैं

कहीं बचपन की नासमझी है
तो कहीं जवानी में समझदार होने का दिखावा
कहीं पुरानी परम्पराओं को तोड़ने की जिद है
तो कहीं दुनिया से अलग महसूस होने का छलावा
कहीं कुछ बदगुमानिया हैं
तो कहीं कुछ संस्कार भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों मैं

...

 

 

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