पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।

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कथा-कहानी

अंतरजाल पर हिंदी कहानियां व हिंदी साहित्य निशुल्क पढ़ें। कथा-कहानी के अंतर्गत यहां आप हिंदी कहानियां, कथाएं, लोक-कथाएं व लघु-कथाएं पढ़ पाएंगे। पढ़िए मुंशी प्रेमचंद,रबीन्द्रनाथ टैगोर, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वरनाथ रेणु, सुदर्शन, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, यशपाल, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मालियो टोल्स्टोय की कहानियां

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माली की सीख - भारत-दर्शन संकलन | Collections

छह-सात वर्ष का एक बालक अपने साथियों के साथ एक बगीचे में फूल तोड़ने के लिए गया। तभी बगीचे का माली आ पहुँचा। अन्य साथी भागने में सफल हो गए, लेकिन सबसे छोटा और कमज़ोर होने के कारण एक बालक भाग न पाया। माली ने उसे धर दबोचा।

 
छोटी हिन्दी कहानियां  - भारत-दर्शन

दस शिक्षाप्रद व प्रेरणादायक कहानियाँ

 

 
हिंदी की पहली लघुकथा - रोहित कुमार 'हैप्पी'

क्या आप जानते हैं कि हिंदी की पहली लघुकथा कौनसी है?

 
गांधी का हिंदी प्रेम - भारत-दर्शन संकलन | Collections

महात्मा गांधी की मातृभाषा यद्यपि गुजराती थी तथापि वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में जनसंपर्क हेतु हिन्दी को ही सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानते थे।

 
देश के लाल - लाल बहादुर शास्त्री - भारत-दर्शन संकलन | Collections

बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे व केरल में सूखा पड़ा हुआ था। चावल की खेती पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। लोग चावल के दाने को तरसने लगे थे। चूंकि केरलवासियों का मुख्य भोजन चावल ही है इसलिए राज्य सरकार चिंतित थी कि केरल निवासी अपनी दिनचर्या कैसे करेंगे!

शास्त्री जी केरल की समस्या जानकर बहुत व्यथित हुए। उन्होंने केरल सरकार को आश्वासन दिया कि प्रदेश के लिए चावल का उचित प्रबंध किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मेरा संकल्प है कि हर केरलवासी को चावल मिलेगा। बिना चावल के एक भी भाई-बहन भूखा नहीं रहेगा। केरल की जनता को चावल के लिए त्राहि-त्राहि करते देखकर उन्होंने अधिकारियों को चावल की कमी पूरी करने के आदेश दिए। देश के अन्य क्षेत्रों से चावल खरीदकर केरल भेजा जाने लगा।

ऐसे में अन्य प्रदेशों में चावल की कमी होनी स्वाभाविक थी। शास्त्री जी ने रोटी खा सकने वाले लोगों से अनुरोध किया कि वे चावल का प्रयोग कम से कम करें और जो लोग स्वाद के लिए प्रतिदिन चावल का प्रयोग करते हैं, वे भी इसका प्रयोग अनिवार्य होने पर ही करें। उन्होंने अपने घर में भी निर्देश दिए थे कि जब तक केरल में चावल की कमी पूरी नहीं हो जाती तब तक उनके घर में चावल नहीं पकाए जाएं। यह आदेश सुनकर शास्त्रीजी के बच्चे दुखी हुए क्योंकि चावल उन्हें भी प्रिय थे लेकिन शास्त्री जी के आदेश का पालन किया गया।

प्रधानमंत्री निवास में तब तक चावल नहीं पकाए गए जब तक कि केरल की स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पा लिया गया। केरल की सरकार व निवासियों के सहित संपूर्ण भारत ने शास्त्री जी की कार्यशैली के प्रति नतमस्तक हो गया कि  शास्त्री जी ने केरल की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर प्रधानमंत्री निवास तक में चावल बनने पर रोक लगा दी। 

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[ भारत-दर्शन संकलन ]

 
अनुपमा का प्रेम  - शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा- वह एक माधवीलता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु ग्रहण करने से पूर्व सहयोगी को भी (बताने की) आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।

 
शास्त्री जी की खरीदारी - भारत-दर्शन संकलन | Collections

एक बार पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री एक कपड़े की एक दुकान में साड़ियाँ खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख प्रसन्न हो गया। उसने उनके आने को अपना सौभाग्य मान, उनकी आव-भगत करनी चाही।

 
देश के लाल - लाल बहादुर शास्त्री - भारत-दर्शन संकलन | Collections

एक छोटा बालक अपने साधियों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे जाने लगे तो उस बालक को आभास हुआ कि उसके पास नाव के किराये के लिए पैसे नहीं हैं। उसने अपने साथियों से कहा कि वह थोड़ी देर और मेला देखेगा और बाद में आएगा। स्वाभिमानी बालक को किसी से नाव का किराया मांगना स्वीकार्य न था।

 
शास्त्रीजी - कमलाप्रसाद चौरसिया | कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

पैदा हुआ उसी दिन,
जिस दिन बापू ने था जन्म लिया
भारत-पाक युद्ध में जिसने
तोड़ दिया दुनिया का भ्रम।

 
लेनदेन - खलील जिब्रान

एक आदमी था। उसके पास सुइयों का इतना भण्डार था कि एक घाटी उनसे भर जाए।

 
दो अक्टूबर - रत्न चंद 'रत्नेश' | कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

लाल बहादुर, महात्मा गांधी
लेकर आए ऐसी आंधी
कायाकल्प हुआ देश का
जन-जन में चेतना जगा दी।

 
रानी केतकी की कहानी  - सैयद इंशा अल्ला खां

यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट।
और न किसी बोली का मेल है न पुट॥

 
राजा भोज का सपना - राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद

वह कौन-सा मनुष्‍य है जिसने महा प्रतापी राजा भोज महाराज का नाम न सुना हो। उसकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत में व्‍याप रही है और बड़े-बड़े महिपाल उसका नाम सुनते ही कांप उठते थे और बड़े-बड़े भूपति उसके पांव पर अपना सिर नवाते। सेना उसकी समुद्र की तरंगों का नमूना और खजाना उसका सोने-चांदी और रत्‍नों की खान से भी दूना। उसके दान ने राजा करण को लोगों के जी से भुलाया और उसके न्‍याय ने विक्रम को भी लजाया। कोई उसके राजभर में भूखा न सोता और न कोर्ड उघाड़ा रहने पाता। जो सत्तू मांगने आता उसे मोतीचूर मिलता और जो गजी चाहता उसे मलमल दिया जाता। पैसे की जगह लोगों को अशरफियां बांटता और मेह की तरह भिखारियों पर मोती बरसाता। एक-एक श्‍लोक के लिए ब्राह्मणों को लाख-लाख रुपया उठा देता और एक-एक दिन में लाख-लाख गौ दान करता, सवा लाख ब्राह्मणों को षट्-रस भोजन कराके तब आप खाने को बैठता। तीर्थयात्रा-स्‍नान-दान और व्रत-उपवास में सदा तत्‍पर रहता। बड़े-बड़े चांद्रायण किये थे और बड़े-बड़े जंगल-पहाड़ छांन डाले थे। एक दिन शरद ऋतु में संध्‍या के समय सुदंर फुलवाड़ी के बीच स्‍वच्‍छ पानी के कुंड के तीर जिसमें कुमुद और कमलों के बीच जल-पक्षी कलोलें कर रहे थे, रत्‍नजटित सिंहासन पर कोमल तकिये के सहारे से स्‍वस्‍थ-चित्त बैठा हुआ महलों की सुनहरी कलसियां लगी हुई संगमरमर की गुम्जियों के पीछे से उदय होता हुआ पूर्णिमा का चांद देख रहा था और निर्जन एकांत होने के कारण मन ही मन में सोचता कि अहो! मैंने अपने कुल को ऐसा प्रकाश किया जैसे सूर्य से इन कमलों का विकास होता है, क्‍या मनुष्‍य और क्‍या जीव-जंतु मैंने अपना सारा जन्‍म इन्‍हीं के भला करने में गंवाया और व्रत-उपवास करते-करते अपने फूल से शरीर को कांटा बनाया। जितना मैंने दान दिया उतना तो कभी किसी के ध्‍यान में भी न आया होगा, जिन-जिन तीर्थों की मैंने यात्रा की वहां कभी पंछी ने पर भी न मारा होगा, मुझसे बढ़कर इब इस संसार में और कौन पुण्‍यात्‍मा है और आगे भी कौन हुआ होगा। जो मैं ही कृतकार्य नहीं तो फिर कौन हो सकता है? मुझे अपने ईश्‍वर पर दावा है, वह मुझे अवश्‍य अच्‍छी गति देगा। ऐसा कैसे हो सकता है कि मुझे भी कुछ दोष लगे। इसी अर्से में चोबदार पुकारा चौधरी इंद्रत्त निगाह रूबरू श्री महाराज सलामत। भोज ने आंख उठाई, दीवान ने साष्‍टांग दंडवत् की फिर सम्‍मुख आ हाथ जोड़ यों निवेदन किया, पृथ्‍वीनाथ, वह कूंएं सड़क पर, जिनके वास्‍ते आपने हुक्‍म दिया था, बनकर तैयार हो गए और आम के बाग भी सब जगह लग गए। जो पानी पीता है, आपको असीस देता और जो उन पेड़ों की छाया में विश्राम करता है, आपकी बढ़ती दौलत मनाता है। राजा अति प्रसन्‍न हुआ और कहा कि सुन, मेरी अमलदारी भर में जहां-जहां सड़क है, कोस-कोस पर कूंए खुदवा के सदवर्त बैठा दे और दुतरफा पेड़ भी जल्‍द लगवा दे। इसी अर्से में दानाध्‍यक्ष ने आकर आशीर्वाद दिया और निवेदन किया कि घर्मावतार, वह जो पांच हजार ब्राह्मण हर साल जाडों में रजाई पाते हैं सो डेवढ़ी पर हाजिर हैं। राजा ने कहा, अब पांच के बदले पचास हजार को मिला करे और रजाई की जगह शाल-दुशाला दिया जावे दानाध्‍यक्ष दुशालों के लाने के वास्‍ते तोशेखाने में गया। इमारत के दारोगा ने आकर मुजरा किया और खबर दी कि महाराज, वह बड़ा मंदिर जिसके जल्‍द बना देने के वास्‍ते सरकार से हुक्‍म हुआ है आज उसकी नेव खुद गई, पत्‍थर गढ़े जाते हैं और लुहार लोहा भी तैयार कर रहे हैं। महाराज ने तिउरियां बदलकर उस दारोगा को खूब घुरका और कहा कि मूर्ख, वहां पत्‍थर और लोहे का क्‍या काम है ! बिल्‍कुल मंदिर संगमरमर और संगमूसा से बनाया जावे और लोहे बदल उसमें सब जगह सोना काम में आवे जिसमें भगवान भी उसे देखकर प्रसन्‍न हो जावे मेरा नाम इस संसार में अतुल कीर्ति पावे। यह सुनकर सारा दरबार पुकार उठा कि धन्‍य महाराज, धन्‍य, क्‍यों न हो, जब ऐसे हो तब तो ऐसे हो, आपने इस कलिकाल को सत्‍ययुग बना दिया मानो धर्म का उद्धार करने को इस जगत में अवतार लिया। आज आपसे बढ़कर और दूसरा कौन ईश्‍वर का प्‍यारा है। हमने तो पहले से ही आपको साक्षात धर्मराज विचारा है। व्‍यास जी ने कथा आरंभ की, भजन-कीर्तन होने लगा। चांद सिर पर चढ़ आया, घड़ियाली ने निवेदन किया कि महाराज रात आधी के निकट पहुंची। राजा की आंखों में नींद छा रही थी, व्‍यास जो कथा कहते थे पर राजा को ऊंघ आती थी। उठकर रनवास में गया, जड़ाऊ पलंग और फूलों की सेज पर सोई रानियां पैर दाबने लगीं राजा की आंख झपक गयी तो स्‍वप्‍न में क्‍या देखता है कि वह बड़ा संगमरमर का मंदिर बनकर बिल्‍कुल तैयार हो गया। जहां कहीं उस पर नक्‍काशी का काम किया है तो बारीकी और सफाई में हाथी दांत को भी मात कर दिया है, जहां कहीं पच्‍चीकारी का हुनर दिखलाया है तो जवाहिरों को पत्‍थरों में जड़कर तसवीर का नमूना बना दिया है, कहीं लालों के गुल्‍लालों पर नीलम की बुलबुलें बैठी हैं और ओस की जगह हीरों के लोलक लटकाए हैं, कहीं पुखराजों की डंडियों से पन्‍ने के पत्‍ते निकालकर मोतियों के भुटटे लगाए हैं, सोने की चोबों पर कमखाब के शामियाने और उनके नीचे बिल्‍लौर के हौजों में गुलाब और केवड़े के फुहारे छूट रहे हैं, मनों धूप जल रहा है, सैंकड़ों कपूर के दीपक बल रहे हैं। राजा देखते ही मारे घमंड के फूलकर मशक बन गया। कभी नीचे, कभी ऊपर, कभी दहने, कभी बायें निगाह करता और मन में सोचता कि क्‍या अब इतने पर भी मुझे कोई स्‍वर्ग में से रोकेगा या पवित्र पुण्‍यात्‍मा न कहेगा? मुझे अपने कर्मों का भरोसा है, दूसरे किसी से क्‍या काम पड़ेगा। इसी अर्से में वह राजा उस सपने के मंदिर में खड़ा-खड़ा क्‍या देखता है कि एक जोत-सी उसके सामने आसमान से उतरी चली आती है, उसका प्रकाश तो हजारों सूर्य से भी अधिक है परंतु जैसे सूरज को बादल घेर लेता है इस प्रकार उसने मुंह पर घूंघट डाल लिया है नहीं तो राजा की आंखें कब उस पर ठहर सकती थीं वरन् इस घूंघट पर भी मारे चकाचौंध के झपकी चली जाती थीं। राजा उसे देखते ही कांप उठा और लड़खड़ाती-सी जुबान से बोला कि हे महाराज, आप कौन हैं और मेरे पास किस प्रयोजन से आये हैं। उस दैवी पुरुष ने बादल की गरज के समान गंभीर उत्‍तर दिया कि मैं सत्‍य हूं, मैं अंधों की आखें खोलता हूं, मैं उनके आगे से धोखे की पट्टी हटाता हूं, मैं मृगतृष्‍णा के भटके हुओं का भ्रम मिटाता हूं और सपने के भूले हुओं को नींद से जगाता हूं, हे भोज, यदि कुछ हिम्‍मत रखता है तो आ, हमारे साथ आ और हमारे तेज के प्रभास से मनुष्‍यों के मन के मंदिरों का भेद ले, इस समय हम तेरे ही मन को जांच रहे हैं। राजा के जी पर एक अजब दहशत-सी छा गई। नीची निगाहें करके गर्दन खुजाने लगा। सत्‍य बोला, भोज, तू डरता है, तुझे अपने मन का हाल जानने में भी भय लगता है। भोज ने कहा कि नहीं इस बात से तो नहीं डरता क्‍योंकि जिसने अपने तईं नहीं जाना उसने फिर क्‍या जाना सिवाय इसके मैं तो आप चाहता हूं कि कोई मेरे मन की थाह लेवे और अच्‍छी तरह से जांचे। मारे व्रत और उपवासों के मैंने अपना फूल सा शरीर कांटा बनाया, ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते-देते सारा खजाना खाली कर डाला, कोई तीर्थ बाकी न रखा, कोई नदी या तालाब नहाने से न छोड़ा। ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसकी निगाह में मैं पवित्र पुण्‍यात्‍मा न ठहरूं। सत्‍य बोला, ठीक, पर भोज, यह तो बतला कि तू ईश्‍वर की निगाह में क्‍या है। क्‍या हवा में बिना धूप तृसरेणु कभी दिखलायी देते हैं? पर सूरज की किरण पड़ते ही कैसे अनगिनत चमकने लग जाते हैं, क्‍या कपड़े से छाने हुए मैले पानी में किसी को कीड़े मालूम पड़ते हैं पर जब खुर्दबीन शीशे को लगाकर देखो तो एक-एक बूंद में हजारों ही जीव सूझने लग जाते हैं। बस जो तू उस बात के जानने से जिसे अवश्‍य जानना चाहिए डरता नहीं तो आ, मेरे साथ आ, मैं तेरी आंखें खोलूंगा। निदान सत्‍य यह कहके राजा को मंदिर के उस बड़े ऊंचे दरवाजे पर चढ़ा ले गया कि जहां से सारा बाग दिखलाई देता था और फिर उससे यों कहने लगा कि भोज, मैं अभी तेरे पापकर्मों का कुछ भी चर्चा नहीं करता क्‍योंकि तूने अपने तईं निरा निष्‍पाप समझ रखा है पर यह तो बतला कि तूने पुण्‍यकर्म कौन-कौन से किये हैं कि जिनसे सर्व शक्तिमान जगदीश्‍वर संतुष्‍ट होगा। राजा यह सुनके अत्‍यंत प्रसन्‍न हुआ, यह तो मानो उसके मन की बात थी। पुण्‍यकर्म के नाम से उसके चित्‍त को कमल सा खिला दिया। उसे निश्‍चय था कि पाप तो मैंने चाहे किया हो चाहे न किया हो पर पुण्‍य मैंने इतना किया कि भारी से भारी पाप भी उसके पासंग में न ठहरेगा। राजा को वहां उस समय सपने में तीन पेड़ बड़े ऊंचे-ऊंचे अपनी आंख के सामने दिखायी दिये, फलों से इतने लदे हुए कि मारे बोझ के उनकी टहनियां धरती तक झुक गयी थीं। राजा उन्‍हें देखते ही हरा हो गया और बोला कि सत्‍य, यह ईश्‍वर की भक्ति और जीवों की दया अर्थात् ईश्‍वर और मनुष्‍य दोनों की प्रीति के पेड़ हैं। देख फलों के बोझ से धरती पर नपे जाते हैं। यह तीनों मेरे ही लगाये हैं। पहिले में तो यह सब लाल-लाल फल मेरे दान से लगे हैं। और दूसरे में वह पीले मेरे न्‍यास से और तीसरे में यह सब सफेद फल मेरे तप का प्रभाव दिखलाते हैं। मानो उस समय चारों ओर से यह ध्‍वनि राजा के कान में चली आती थी कि धन्‍य हो महाराज, धन्‍य हो, आज तुम सा पुण्‍यात्‍मा दूसरा कोई नहीं। तुम साक्षात धर्म के अवतार हो। इस लोक में भी तुमने बड़ा पद पाया है और उस लोक में भी तुम्‍हें इससे अधिक मिलेगा। तुम मनुष्‍य और ईश्‍वर दोनों की आंखों में निर्दोष और निष्‍पाप हो। सूर्य के मंडल में लोग कलंक बतलाते हैं पर तुम पर एक छींटा भी नहीं लगाते। सत्‍य बोला कि भोज, जब मैं इन पेड़ों के पास से आया था जिन्‍हें तू ईश्‍वर की भक्ति और जीवों की दया के बतलाता है तब तो उनमें फल-फूल कुछ भी नहीं था, निरे ठूंठ से खड़े थे, यह लाल, पीले और सफेद फल कहां से आ गये ! यह सचमुच उन पेड़ों में फल लगे हैं या तुझे फुसलाने और खुश करने को किसी ने उनकी टहनियों से लटका दिये हैं? चल उन पेड़ों के पास चलकर देखें तो सही मेरी समझ में तो यह लाल-लाल फल जिन्‍हें तू अपने दान के प्रभाव से लगे बतलाता है, यश और कीर्ति फैलाने की चाह अर्थात् प्रशंसा पाने की इच्‍छा ने इस पेड़ में लगाए हैं। निदान जो हो, सत्‍य ने उस पेड़ को छूने को हाथ बढ़ाया। राजा सपने में क्‍या देखता है कि वह सारे फल जैसे आसमान से ओले गिरते हैं, एक आन की आन में धरती पर गिर पड़े। धरती सारी लाल हो गयी। पेड़ों पर सिवाय पत्‍तों के और कुछ न रहा। सत्‍य ने कहा कि राजा, जैसे कोई किसी चीज को मोम से चिपकाता है उसी तरह तूने अपने भुलाने को, प्रशंसा पाने की इच्‍छा से यह फल इस पेड़ पर लगा दिये थे, सत्‍य के तेज से वहां मोम गल गया, पेड ठूंठ का ठूंठ रह गया। जो कुछ तूने दिया और किया सब दुनिया के दिखलाने और मनुष्‍यों से प्रशंसा पाने के लिये। केवल ईश्‍वर की भक्ति और जीवों की दया से तो कुछ भी नहीं दिया। यदि कुछ दिया हो या किया हो तो तू ही क्‍यों नहीं बतलाता। मूर्ख इसी के भरोसे पर तू फूला हुआ स्‍वर्ग में जाने को तैयार हुआ था ! भोज ने एक ठंडी सांस ली। उसने तो औरों को भूला समझा था पर वह सबसे अधिक भूला हुआ निकला। सत्‍य से उस पेड़ की तरफ हाथ बढ़ाया जो सोने की तरह चमकते पीले-पीले फलों से लदा हुआ था। सत्‍य का हाथ पास पहुंचते ही इसका भी वही हाल हो गया जो पहले का हुआ था। सत्‍य बोला कि राजा, इस पेड़ में ये फल तूने अपने भुलाने को। स्‍वर्ग को यथार्थ सिद्ध करने की इच्‍छा से लगा लिये थे। कहने वाले ने ठीक कहा है कि मनुष्‍य-मनुष्‍य के कर्मों से उसके मन की भावना का विचार करता है और ईश्‍वर मनुष्‍य के मन की भावना के अनुसार उसके कर्मों का हिसाब लेता है। तू अच्‍छी तरह जानता है कि यही न्याय तेरे राज्‍य की जड़ है। जो न्‍याय न करे तो फिर वह राज्‍य तेरे हाथ में क्‍योंकर रह सके। जिस राज्‍य में न्‍याय नहीं वह तो वे नींव का घर है, बुढि़या के दांतों की तरह हिलता है, अब गिरा तब गिरा। मूर्ख, तू ही क्‍यों नहीं बतलाता कि यह तेरा न्‍याय स्‍वार्थ सिद्ध करने और सांसारिक सुख पाने की इच्‍छा से है अथवा ईश्‍वर की, भक्ति और जीवों की दया से। भोज की पेशानी पर पसीना हो आया, आंखें नीची कर लीं जवाब कुछ न बन पड़ा। तीसरे पेड़ की पारी आयी। सत्‍य का हाथ लगते ही उसकी भी वही हालत हुई। राजा अत्‍यंत लज्जित हुआ। सत्‍य ने कहा कि मूर्ख, यह तेरे तप के फल कदापि नहीं इनको तो इस पेड़ पर तेरे अहंकार ने लगा रखा था। वह कौन सा व्रत वा तीर्थयात्रा है जो तूने निहंकार केवल ईश्‍वर की भक्ति और जीवों की दया से किया हो ! तूने यह तप इसी वास्‍ते किया कि जिसमें तू अपने तईं औरों से अच्‍छा और बढ़ के विचारे। ऐसे ही तप पर गोबर-गनेश, तू स्‍वर्ग मिलने की उमेद रखता है पर यह तो बतला कि मंदिर की उन मुंडेरों पर वे जानवर से क्‍या दिखलायी देते हैं? कैसे सुंदर और प्‍यारे मालूम होते हैं ! पर तो उनके पन्‍ने के हैं और गर्दन फीरोजे की, दुम में सारे किस्‍म के जवाहिर जड़ दिये हैं। राजा के जी में घमंड की चिड़िया ने फिर फुरफुरी ली मानो बुझते हुए दिये की तरह जगमगा उठा। जल्‍दी से जवाब दिया कि हे सत्‍य, यह जो कुछ तू मंदिर की मुंडेरों पर देखता है मेरे संध्‍या-वंदन का प्रभाव है। मैंने जो रातों जाग-जागकर और माथा रगड़ते-रगड़ते इस मंदिर की देहली को घिसाकर ईश्‍वर की स्‍तुति-वंदना और विनती प्रार्थना की है वही अब चिडियों की तरह पंख फैलाकर आकाश को जाती है मानों ईश्‍वर के सामने पहुंचकर अब मुझे स्‍वर्ग का राजा बनाती हैं। सत्‍य ने कहा कि राजा, दीनबंधु करुणासागर श्री जगन्‍नाथ जगदीश्‍वर अपने भक्‍तों की विनती सदा सुनता रहता है और जो मनुष्‍य शुद्ध हृदय और निष्‍कपट होकर नम्रता और श्रद्धा के साथ अपने दुष्‍कर्मों का पश्‍चाताप अथवा उनके क्षमा होने का टुक भी निवेदन करता है वह उसका निवेदन उसी दम सूर्य-चांद को बेधकर पार हो जाता है। फिर क्‍या कारण कि यह सब आप अब तक मंदिर की मुडेर ही पर बैठे रहे। आ चल देखें तो सही हम लोगों के पास जाने पर आकाश तो उड़ जाते हैं या उसी जगह पर परकट-कबूतरों की तरह फड़फड़ाया करते हैं। भोज डरा लेकिन सत्‍य का साथ न छोड़ा। ज‍ब मुंडेर पर पहुंचा तो क्‍या देखता है कि वह सारे जानवर जो दूर से ऐसे सुदंर दिखायी देते थे, मरे हुए पड़े हैं, पंख नुचे-खुचे और बहुतों बिल्‍कुल सड़े हुए यहां तक कि मारे बदबू के राजा का सिर भिन्‍ना उठा। दो एक में जिनमें कुछ दम बाकी था जो उड़ने का इरादा भी किया तो उनके पंख पारे की तरह भारी हो गये और उन्‍हें उसी ठौर दबा रक्‍खा, तड़फा जरूर किये पर उड़ने जरा भी न दिया। सत्‍य बोला, भोज, बस यही तरे पुण्‍यकर्म हैं। इन्‍हीं स्‍तुति-वंदना और विनती-प्रार्थना के भरोसे पर तू स्‍वर्ग में जाना चाहता है! सूरत तो इनकी बहुत अच्‍छी है पर जान बिल्‍कुल नहीं। तूने जो कुछ किया केवल लोगों के दिखलाने को, जी से कुछ भी नहीं। जो तू एक बार भी जी से पुकारा होता कि दीनबंधु दीनानाथ दीन-हितकारी, मुझ पापी महा अपराधी डूबते हुए को बचा और कृपा-दृष्टि कर तो वह तेरी पुकार तीर की तरह तारों से पास पहुंची होती। राजा ने सिर नीचा कर लिया, उत्‍तर कुछ न बन आया। सत्‍य ने कहा कि भोज, अब आ फिर इस मंदिर के अंदर चलें और वहां तेरे मन के मंदिर को जांचे। यद्यपि मनुष्‍य के मन के मंदिर में ऐसे-ऐसे अंधेरे तहखाने और तलघर पड़े हुए हैं कि उनको सिवाय सर्वदर्शी घट-घट अंतर्यामी सकल जगत-स्‍वामी और कोई भी नहीं देख अथवा जांच सकता तो भी तेरा परिश्रम व्‍यर्थ न जावेगा। राजा उस सत्‍य के पीछे खिंचा-खिंचा फिर मंदिर के अंदर घुसा पर अब तू उसका हाल ही कुछ से कुछ हो गया। सचमुच सपने का खेल सा दिखायी दिया चांदी की सारी चमक जाती रही, सोने की बिल्‍कुल दमक उड़ गई, दोनों में लौ की तरह मोर्चा लगा हुआ और जहां-तहां से मुलम्‍मा उड़ गया था, भीतर ईंट पत्‍थर कैसा दिखलायी देता था, जवाहिरों की जगह केवल काले-काले दाग रह गये थे और संगमरमर की चट्टानों में हाथ-हाथ भर गहरे गढ्ढे पड़ गये। राजा यह देखकर भैंचक-सा रह गया। औसान जाते रहे, हक्‍का-बक्‍का बन गया धीमी आवाज से पूछा कि यह टिड्डी दल की तरह इतने दाग इस मंदिर में कहां से आये? जिधर मैं निगाह उठाता हूं सिवाय काले-काले दागों के और कुछ भी नहीं दिखलायी देता, ऐसा तो छीपी छींट भी नहीं छापेगा और न शीतला बिगड़ा किसी का चेहरा देख पड़ेगा। सत्‍य बोला कि राजा, ये दाग जो तुझे मंदिर में दिखलायी देते हैं वे दुर्वचन हैं जो दिन-रात तेरे मुख से निकला किये हैं। याद तो कर तूने क्रोध में आकर कैसी कड़ी-कड़ी बातें लोगों को सुनायी हैं। क्‍या खेल में और क्‍या आना अथवा दूसरे का चित्त प्रसन्‍न करने को, क्‍या रुपया बचाने अथवा अधिक लाभ पाने को और दूसरे का देश अपने हाथ में लाने अथवा किसी बराबर वाले से अपना मतलब निकालने और दुश्‍मनों को नीचा दिखलाने को कितना झूठ बोला है! अपने ऐब छिपाने और दूसरों की आंखों में अच्‍छा मालूम होने अथवा झूठी तारीफ पाने के लिए कैसी-कैसी शेखियां हांकी हैं! अपने को औरों से अच्‍छा, औरों को अपने से बुरा दिखलाने को कहां तक बातें बनायी हैं तो अब कुछ भी याद नहीं रहा, बिल्‍कुल एकबारगी भूल गया पर वहां वह तेरे मुंह से निकलते ही बही में दर्ज हुआ। तू इन दागों को गिनने में असमर्थ है पर उस घटघट निवासी अनंत अविनाशी को एक-एक बात जो तेरे मुंह से निकली है याद हैं और याद रहेंगी। उसके निकट भूत और भविष्‍य दोनों वर्तमान सा है। भोज ने सिर न उठाया पर उस दबी जुबान से इतना मुंह से और निकाला कि दाग पर ये हाथ-हाथ भर गढ़े क्‍योंकर पड़ गये, सोने-चांदी में मोर्चा लग कर ये ईंट पत्‍थर कहां से दिखलायी देने लगे! सत्‍य ने कहा कि राजा, क्‍या तूने कभी किसी को कोई लगती हुई बात नहीं कही अथवा बोली-ठोली नहीं मारी? अरे नादान, यह बोली-ठोली तो गोली से अधिक काम कर जाती है। तू तो इन गढ़ों ही को देखकर रोता है पर तेरे ताने तो बहुतों की छातियों से पार हो गये। जब अहंकार का मोर्चा लगा तो फिर यह दिखलावे का मुलम्‍मा कब तक ठहर सकता है, स्‍वार्थ और अश्रद्धा का ईंट-पत्‍थर प्रकट हो आया। राजा को इस अर्से में चिमगादड़ों ने बहुत तंग कर रखा था, मारे बू के सिर फटा जाता था, भनगे और पतंगों से सारा मकान भर गया था। राजा को बीच-बीच में पंख वाले सांप और बिच्‍छू भी दिखलायी देते थे। राजा घबराकर चिल्‍ला उठा कि यह मैं किस आफत में पड़ा! इन कमबख्‍तों को यहां किसने आने दिया? सत्‍य बोला, राजा, सिवाय तेरे इनको यहां कौन आने देगा! तू ही तो इन सबको लाया है। यह सब तेरे काम की बुरी वासना है। तूने समझा था कि जैसे समुद्र में लहरें उठा और मिटा करती हैं उसी तरह मनुष्‍य के मन में भी संकल्‍प की मौज उठकर मिट जाती है। पर रे मूढ़, याद रख कि आदमी के चित्त में ऐसा सोच-विचार कोई नहीं आता तो जगतकर्ता प्राणदाता परमेश्‍वर के साम्‍हने प्रतयक्ष नहीं हो जाता। यह चमगादड़ और भनगे और सांप-बिच्‍छू और कीड़े-मकोड़े जो तुझे दिखलाई देते हैं, संकल्‍प-विकल्‍प हैं जो दिन-रात तेरे अंत:करण में उठा किये और उन्‍हीं चमगादड़ और भनगे और सांप-बिच्‍छू और कीड़े-मकोड़ों की तरह तेरे हृदय के प्रकाश में उड़ते रहे। क्या कभी तेरे जी में किसी राजा की ओर से कुछ द्वेष नहीं रहा था? उसके मुल्‍क-माल पर लोभ नहीं आया था? अपनी बड़ाई का अभिमान नहीं हुआ या दूसरे की सुंदर स्‍त्री देखकर उस पर दिल न चला। राजा ने एक बड़ी लंबी ठंडी सांस ली और अत्‍यंत निराश होके वह बात कही कि इस संसार में ऐसा कोई मनुष्‍य नहीं है जो कह सके कि मेरा हृदय शुद्ध और मन में कुछ भी पाप नहीं। इस संसार में निष्‍पाप रहना बड़ा कठिन है। जो पुण्‍य करना चाहते हैं उनमें भी पाप निकल आता है। इस संसार में पाप से रहित कोई भी नहीं। ईश्‍वर के साम्‍हने पवित्र पुण्‍यात्‍मा कोई भी नहीं। सारा मंदिर वरन सारी धरती, आकाश गूंज उठा, कोई भी नहीं, कोई भी नहीं। सत्‍य ने जो आंख उठाकर उस मंदिर की एक दीवार की तरफ देखा तो वह उसी संगमर्मर से आयना बन गया। राजा से कहा कि अब टुक इस आइने का भी तमाशा देख और जो कर्तव्‍य कर्मों के न करने से तुझे पाप लगे हैं उनका भी हिसाब ले। राजा उस आइने में क्‍या देखता है, जिस प्रकार बरसात की बढ़ी हुई किसी नदी के जल के प्रवाह में बहे जाते हैं उस प्रकार अनगिनत सूरतें एक ओर से निकलती और दूसरी ओर अलोप होती चली जाती हैं। कभी तो राजा को वे सब भूखे और नंगे आइने में दिखलायी देते जिन्‍हें राजा खाने-पहरने को दे सकता था पर न देकर दान का रुपया उन्‍हीं हट्टे-कट्टे मोटे-मुसटंड खाते-पीते हुओं को देता रहा जो उसकी खुशामद करते थे या किसी की सिफारिश ले आते थे या उसके कारदारों को घूंस देकर मिला लेते थे या सवारी के समय मांगते-मांगते और शोर-गुल मचाते-मचाते उसे तंग कर डालते थे या दरबार में आकर उसे लज्‍जा के भंवर में गिरा देते थे या झूठा छापा-तिलक लगाकर उसे मकूर के जाल में फंसा लेते थे या जन्‍मपत्र में भले-बुरे ग्रह बतला कर कुछ धमकी भी दिखला देते थे या सुंदर कवित्त और श्‍लोक पढ़कर उसके चित्त को लुभाते थे, कभी वे दीन-दुखी दिखलाई देते जिन पर राजा के कारदार जुल्‍म किया करते थे और उसने कुछ भी उसकी तहकीकात और उपाय न की, कभी उन बीमारों को देखता जिनका चंगा करा देना राजा के इख्तियार में था, कभी वे व्‍यथा के जले और विपत्ति के मारे दिखलाई देते जिनका जी राज के दो बात कहने से ठंडा और संतुष्‍ट हो सकता था, कभी अपने लड़के और लड़कियों को देखता जिन्‍हें वह पढ़ा-लिखा कर अच्‍छी-अच्‍छी बातें सिखा कर बड़े-बड़े पापों से बचा सकता था, कभी उन गांव और इलाकों को देखता जिनमें कूप तालाब खुदवाने और किसानों को मदद देने और उन्‍हें खेती-बारी की नई-नई तरकीबें बतलाने से हजारों गरीबों का भला कर सकता था, उन टूटे हुए पुल और रास्‍तों को देखता जिन्‍हें दुरुस्‍त करने से वह लाखों मुसाफिरों को आराम पहुंच सकता था। राजा से अधिक देखा न जा सका। थोड़ी ही देर में घबरा कर हाथों से अपनी आंखों को ढाप लिया। वह अपने घमंड में उन सब कामों को तो सदा याद रखता था और उनका चर्चा किया करता जिन्‍हें वह अपनी समझ में पुण्‍य के निमित्त किए हुए समझा था पर उन कर्तव्‍य कामों का कभी टुक सोच न किया जिन्‍हें अपनी उन्‍मत्तता से अचेत होकर छोड़ दिया था। सत्‍य बोली, राजा, अभी से क्‍यों घबरा गया, आ इधर आ, इस दूसरे आइने में मैं तुझे अब उन पापों को दिखलाता हूं जो तूने अपनी उमर में किए हैं। राजा ने हाथ जोड़े और पुकारा कि इस महाराज, बस कीजिए, जो कुछ देखा उसी में मैं तो मिट्टी हो गया, कुछ भी बाकी न रहा, अब आगे क्षमा कीजिए। पर यह तो बतलाइये कि आपने यहां आकर मेरे शर्बत में क्‍यों जहर घोला और पकी-पकाई खीर में सांप का विष उगला और आपने मेरे आनंद को इस मंदिर में आके नाश में मिलाया जिसे मैंने सर्वशक्तिमान् भगवान् के अर्पण किया है, चाहे जैसा वह बुरा और अशुद्ध क्‍यों न हो पर मैंने तो उसी के निमित्त बनाया है। सत्‍य ने कहा, ठीक पर यह तो बतला कि भगवान इस मंदिर में बैठा है? यदि तूने भगवान को इस मंदिर में बैठाया होता तो फिर वह अशुद्ध क्‍यों रहता। जरा आंख उठाकर उस मूर्ति को तो देख जिसे तू जन्‍म-भर पूजता रहा है। राजा ने आंख उठाई तो क्‍या देखता है कि वहां उस बड़ी ऊंची वेदी पर उसी की मूर्ति पत्‍थर की गढ़ी हुई रखी है और अभिमान की पगड़ी बांधे हुए है। सत्‍य ने कहा कि मूर्ख, तूने जो काम किए केवल अपनी प्रतिष्‍ठा के लिए। इसी प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त होने की सदा तेरी भावना रही और इसी प्रतिष्‍ठा के लिये तूने अपनी आप पूजा की। रे मूर्ख, सकल जगत्स्‍वामी घटघट अंतर्यामी क्‍या ऐसे मन रूपी मंदिर में भी अपना सिंहासन बिछने देता है तो अभिमान और प्रतिष्‍ठा-प्राप्ति की इच्‍छा इत्‍यादि से भरा है। ये तो उसकी जली पड़ने योग्‍य हैं। सत्‍य का इतना कहना था कि सारी पृथ्‍वी एकबारगी कांप उठी मानो उसी दम टुकड़ा-टुकड़ा होना चाहती थी। आकाश में ऐसा शब्‍द हुआ कि जैसा प्रलय काल का मेघ गरजा। मंदिर की दीवार चारों ओर से अड़अड़ा गिर पड़ी मानों उस पापी राजा को दबा लेना चाहती थी और उस अहंकार की मूर्ति पर ऐसी एक बिजली गिरी कि वह धरती पर औधें मुंह आ पड़ी। 'त्राहि त्राहि मां, मैं डूबा' कहके भोज जो चिल्‍लाया, आंख उसकी खुल गई और सपना बना हो गया। इस अर्से में रात बीत कर आस्‍मान के किनारों पर लाली दौड़ हुई थी। चिड़िया चहचहा रही थी। एक ओर से शीतल मंद सुगंध पवन चली थी दूसरी ओर से बीन और मृदंग की ध्‍वनि। बंदीजन राजा का जस गाने हर्कारे हर तरफ काम को दौड़े, कमल खिले, कुमुद कुम्‍हालाये। राजा पलंग से पर जीभारी, माथ थामें हुए। न हवा अच्‍छी लगती थी न गाने बजाने की सुध-बुध थी। उठते ही पहले यह हुक्‍म दिया कि इस नगर में जो अच्‍छे पंडित हों जल्‍द उसको मेरे पास लाओ, मैंने एक सपना देखा है कि जिसके आगे अब या सारा राग सपना मालूम होता है। उस सपने के स्‍मरण से ही मेरे रोंगटे खड़े हुए होते हैं। राजा के मुख से हुक्‍म निकलने की देर थी, चोपदार ने तीन पंडितों को उस समय वशिष्‍ठ, याज्ञवलक्‍य और बृहस्‍पति के समान प्रख्‍यात थे, बात-की-बात में राजा के सामने ला खड़ा किया। राजा का मुंह पीला पड़ गया था। माथे पर पसीना हो आया था, पूछा कि वह कौन-सा उपाय है जिससे यह पापी मनुष्‍य ईश्‍वर के कोप से छुटकारा पावे। उनमें से एक बड़े बूढ़े पंडित ने आशीर्वाद देकर निवेदन किया कि धर्मराज धर्मावतार, यह भय तो आपके शत्रुओं को होना चाहिए, आपसे पवित्र पुण्‍यात्‍मा के जी में ऐसा संदेह क्‍यों उत्‍पन्‍न हुआ? आप अपने पुण्‍य के प्रभाव का जामा पहन के बे-खटके परमेश्‍वर के साम्‍हने जाइए, न तो वह कहीं से फटा-फटा है और न किसी जगह से मैला-कुचैला हुआ है। राजा क्रोध करके बोला कि अस अधिक अपनी वाणी को परिश्रम न दीजिए और इसी दम अपने घर की राह लीजिए। क्‍या आप फिर उस पर्दे को डालना चाहते हैं जो सत्‍य ने मेरे साम्‍हने से हटाया और बुद्धि की आंखों को बंद करना चाहते हैं जिन्‍हें सत्‍य ने खोला! उस पवित्र परमात्‍मा के साम्‍हने अन्‍याय कभी नहीं ठहर सकता। मेरे पुण्‍य का जामा उसके आगे निरा चीथड़ा है। यदि वह मेरे कामनों पर निगाह करेगा तो नाश हो जाऊंगा, मेरा कहीं पता भी न लगेगा। इसी में दूसरा पंडित बोल उठा कि महाराज, परब्रह्म परमात्‍मा जो आनंद-स्‍वरूप है, उसकी दया के सागर का कब किसी ने वारापार पाया है! वह क्‍या हमारे इन छोटे-छोटे कामों पर निगाह किया करता है! एक कृपा-दृष्टि से सारा बेड़ा पार लगा देता है। राजा ने आंखें दिखला के कहा कि महाराज, आप भी अपने घर को सिधारिये, आपने ईश्‍वर को ऐसा अन्‍यायी ठहरा दिया कि वह किसी पापी को सजा नहीं देता है, सब धान बाईस पसेरी तोलता है मानो हरभोंगपुर का राज करता है। इसी संसार में क्‍यों नहीं देख लेते, जो आम बोता है वह आम खाता है और जो बबूल लगाता है वह कांटे चुनता है, तो क्‍या उस लोक में जो जैसा करेगा सर्वदर्शी घटघट अंतर्यामी से उसका बदला वैसा ही न पावेगा? सारी सृष्टि पुकारे कहती है और हमारा अंत:करण भी इस बात पर गवाही देता है कि ईश्‍वर अन्‍याय नहीं करेगा। जो जैसा करेगा वैसा ही उससे उसका बदला पावेगा। अब तीसरा पंडित आगे बढ़ा यों जुबान खोली कि महाराजाधिराज, परमेश्‍वर के यहां से हम लोगों को वैसा ही बदला मिलेगा कि जैसा हम लोग काम करते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। आप यथार्थ फरमाते हैं परमेश्‍वर अन्‍याय कभी नहीं करेगा पर यह इतने प्रायश्चित्त और होम और यज्ञ और जप-तप तीर्थयात्रा किस लिए बनाए गए हैं? यह इसीलिए हैं कि जिसमें परमेश्‍वर हम लोगों का अपराध क्षमा करे और वैकुंठ में अपने पास रहने को ठौर देवे। राजा ने कहा, देवताजी, कल तो मैं आपकी सब बात मान सकता था लेकिन अब तो मुझे इन कामों में भी ऐसा कोई नहीं दिखलाई देता जिसके करने से यह पापी मनुष्‍य पवित्र पुण्‍यात्‍मा हो जावे। वह कौन-सा जप-तप, तीर्थयात्रा, होम-यज्ञ और प्रायशिचत है जिसके करने से हृदय शुद्ध हो और अभिमान न आ जावे। आदमी को फुसला लेना तो सहज है पर उस घटघट के अंतर्यामी को कोई क्‍योंकर फुसलावे! जब मनुष्‍य का मन ही पाप से भरा हुआ है तो फिर उससे पुण्‍यकर्म कोई कहां बन आवे। पहल आप उस स्‍वप्‍न को सुनिये जो रात को देखा है तब फिर पीछे वह उपाय बतलाइये जिससे पापी मनुष्‍य ईश्‍वर के कोप से छुटकारा पाता है।

 
लाल बहादुर शास्त्री -राणा प्रताप सिंह गन्नौरी | कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

लालों में वह लाल बहादुर,
भारत माता का वह प्यारा।
कष्ट अनेकों सहकर जिसने,
निज जीवन का रूप संवारा।

 
इन्दुमती - किशोरीलाल गोस्वामी

इन्दुमती अपने बूढ़े पिता के साथ विन्ध्याचल के घने जंगल में रहती थी। जब से उसके पिता वहाँ पर कुटी बनाकर रहने लगे, तब से वह बराबर उन्हीं के साथ रही; न जंगल के बाहर निकली, न किसी दूसरे का मुँह देख सकी। उसकी अवस्था चार-पाँच वर्ष की थी जबकि उसकी माता का परलोकवास हुआ और जब उसके पिता उसे लेकर वनवासी हुए। जब से वह समझने योग्य हुई तब से नाना प्रकार के वनैले पशु-पक्षियों, वृक्षावलियों और गंगा की धारा के अतिरिक्त यह नहीं जानती थी कि संसार वा संसारी सुख क्या है और उसमें कैसे-कैसे विचित्र पदार्थ भरे पड़े हैं। फूलों को बीन-बीन कर माला बनाना, हरिणों के संग कलोल करना, दिन-भर वन-वन घूमना और पक्षियों का गाना सुनना; बस यही उसका काम था। वह यह भी नहीं जानती थी कि मेरे बूढ़े पिता के अतिरिक्त और भी कोई मनुष्य संसार में है।

 
दुलाईवाली  - बंगमहिला

काशी जी के दशाश्‍वमेध घाट पर स्‍नान करके एक मनुष्‍य बड़ी व्‍यग्रता के साथ गोदौलिया की तरफ आ रहा था। एक हाथ में एक मैली-सी तौलिया में लपेटी हुई भीगी धोती और दूसरे में सुरती की गोलियों की कई डिबियाँ और सुँघनी की एक पुड़िया थी। उस समय दिन के ग्‍यारह बजे थे, गोदौलिया की बायीं तरफ जो गली है, उसके भीतर एक और गली में थोड़ी दूर पर, एक टूटे-से पुराने मकान में वह जा घुसा। मकान के पहले खण्‍ड में बहुत अँधेरा था; पर उपर की जगह मनुष्‍य के वासोपयोगी थी। नवागत मनुष्‍य धड़धड़ाता हुआ ऊपर चढ़ गया। वहाँ एक कोठरी में उसने हाथ की चीजें रख दीं। और, 'सीता! सीता!' कहकर पुकारने लगा।

 
ग्यारह वर्ष का समय  - रामचंद्र शुक्ल

दिन-भर बैठे-बैठे मेरे सिर में पीड़ा उत्‍पन्‍न हुई : मैं अपने स्‍थान से उठा और अपने एक नए एकांतवासी मित्र के यहाँ मैंने जाना विचारा। जाकर मैंने देखा तो वे ध्‍यान-मग्‍न सिर नीचा किए हुए कुछ सोच रहे थे। मुझे देखकर कुछ आश्‍चर्य नहीं हुआ; क्‍योंकि यह कोई नई बात नहीं थी। उन्‍हें थोड़े ही दिन पूरब से इस देश मे आए हुआ है। नगर में उनसे मेरे सिवा और किसी से विशेष जान-पहिचान नहीं है; और न वह विशेषत: किसी से मिलते-जुलते ही हैं। केवल मुझसे मेरे भाग्‍य से, वे मित्र-भाव रखते हैं। उदास तो वे हर समय रहा करते हैं। कई बेर उनसे मैंने इस उदासीनता का कारण पूछा भी; किंतु मैंने देखा कि उसके प्रकट करने में उन्‍हें एक प्रकार का दु:ख-सा होता है; इसी कारण मैं विशेष पूछताछ नहीं करता।

 
जामुन का पेड़ - कृश्न चंदर

रात को बड़े जोर का अंधड़ चला। सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पडा। सुबह जब माली ने देखा तो उसे मालूम हुआ कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है।

 
देशभक्ति का पारितोषिक - प्रवीण जैन

चोर एक घर में घुसा। उस समय वहाँ टेलीविज़न चल रहा था। टेलीविज़न पर राष्ट्रीय गान आरंभ हो गया। चोर सावधान की मुद्रा में वहीं सावधान खड़ा हो गया। गृहस्वामी ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। न्यायाधीश महोदय ने देशभक्ति के पारितोषिक स्वरूप चोर को इज्जत सहित बरी कर दिया और गृहस्वामी को राष्ट्रीय गान का अपमान करने पर सज़ा सुना दी।

 
मेरी पहली रचना  - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शरर, पं० रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व० हजरत रियाज़ ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा' के नाम से किया था। उस जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच' के सम्पादक स्व० मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद ‘धोखा' या ‘तिलस्मी फ़ानूस' के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं और पं० रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था; मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दूकान से अँग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लडक़ों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलस्मी होशरुबा' के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रन्थ के १७ भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररायल के आकार के दो-दो हज़ार पृष्ठों से कम न होगा। और इन 17 भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रन्थ की रचना की, उसकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने 60 वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।

 
दयामय की दया | लोककथा  - लियो टाल्स्टाय

किसी समय एक मनुष्य ऐसा पापी था कि अपने 70 वर्ष के जीवन में उसने एक भी अच्छा काम नहीं किया था। नित्य पाप करता था, लेकिन मरते समय उसके मन में ग्लानि हुई और रो-रोकर कहने लगा - हे भगवान्! मुझ पापी का बेड़ा पार कैसे होगा? आप भक्त-वत्सल, कृपा और दया के समुद्र हो, क्या मुझ जैसे पापी को क्षमा न करोगे?

 
खिचड़ी भाषा - भारत-दर्शन संकलन

एक बार एक विद्यार्थी ने पंडित नेहरू से 'आटोग्राफ ' मांगा । पंडित जी ने अंग्रेजी में हस्ताक्षर करके उसे पुस्तिका लौटा दी । फिर विद्यार्थी ने पुस्तिका पर एक शुभकामना संदेश लिखने के लिए प्रार्थना की तो चाचा नेहरू ने वह भी पूरीकर दी ।

 
मुट्ठी - राजीव वाधवा

बहुत पुरानी बात है। किसी देश में एक सूफी फ़क़ीर रहता था। वह बहुत प्रसिद्ध था। लोग दूर-दूर से उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आते थे। जो फ़क़ीर कह देता, वह भविष्य में सच घटित हो जाता था।

 

 

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