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कविताएं

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साहित्य - प्रताप नारायण मिश्र

जहाँ न हित-उपदेश कुछ, सो कैसा साहित्य?
हो प्रकाश से रहित तो, कौन कहे आदित्य?

 
प्रेम के कई चेहरे - सुषम बेदी

वाटिका की तापसी सीता का
नकटी शूर्पणखा का
चिर बिरहन गोपिका का
जुए में हारी द्रौपदी का
यम को ललकारती
सावित्री का।

 
संगीत पार्टी - सुषम बेदी

तबले पर कहरवा बज रहा था। सुनीता एक चुस्त-सा फिल्मी गीत गा रही थी। आवाज़ मधुर थी पर मँजाव नहीं था। सो बीच-बीच में कभी ताल की गलती हो जाती तो कभी सुर ठीक न लगता।

 
आदिम स्वप्न - रीता कौशल | ऑस्ट्रेलिया

तुम मन में, तुम धड़कन में
जीवन के इक इक पल में
मोहपाश में बँधे तुम्हारे
हमें थाम कर बनो हमारे।

 
अर्थहीन - रीता कौशल | ऑस्ट्रेलिया

कटु वचनों से आहत कर
पींग प्रेम की अर्थहीन है।
प्रेम समर्पण का नाम दूजा है
हक समझ पाना अर्थहीन है।

 
सफाई  - डॉ पुष्पा भारद्वाज-वुड | न्यूज़ीलैंड

पूछा हमसे किसी ने
तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?
हमने भी इस प्रश्न पर कुछ गहराई से विचार किया।
नतीजा यही निकला कि
जब सफाई देने की ही नौबत आ गई
तो
फिर कहने या ना कहने से भी क्या फर्क पड़ता है?

 
सुखी आदमी  - केदारनाथ सिंह | Kedarnath Singh

आज वह रोया
यह सोचते हुए कि रोना
कितना हास्यास्पद है
वह रोया

 
सोऽहम् | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

करके हम भी बी० ए० पास
           हैं अब जिलाधीश के दास ।
पाते हैं दो बार पचास
           बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥

 
सुनीति | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

निज गौरव को जान आत्मआदर का करना
निजता की की पहिचान, आत्मसंयम पर चलना
ये ही तीनो उच्च शक्ति, वैभव दिलवाते,
जीवन किन्तु न डाल शक्ति वैभव के खाते ।
(आ जाते ये सदा आप ही बिना बुलाए ।)
चतुराई की परख यहाँ-परिणाम न गिनकर,
जीवन को नि:शक चलाना सत्य धर्म पर,
जो जीवन का मन्त्र उसी हर निर्भय चलना,
उचित उचित है यही मान कर समुचित ही करना,
यो ही परमानंद भले लोगों ने पाए ।।

 
भारत की जय | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, क्रिस्ती, मुसलमान
पारसीक, यहूदी और ब्राह्मन
भारत के सब पुत्र, परस्पर रहो मित्र
रखो चित्ते गणना सामान
मिलो सब भारत संतान
एक तन एक प्राण
गाओ भारत का यशोगान

 
खूनी पर्चा - वंशीधर शुक्ल

अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा,
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न किंचित पाऊंगा।
तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे,
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे,
खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे,
दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे,
अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा,
जब तक तुझको...।

 
प्रक्रिया - श्रीकांत वर्मा

मैं क्या कर रहा था
जब
सब जयकार कर रहे थे?
मैं भी जयकार कर रहा था -
डर रहा था
जिस तरह
सब डर रहे थे। 
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘अजीज मेरा दुश्मन है?'
मैं भी कह रहा था,
‘अजीज मेरा दुश्मन है।'
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘मुँह मत खोलो?'
मैं भी कह रहा था,
‘मुँह मत खोलो
बोला
जैसा सब बोलते हैं।'
खत्म हो चुकी है जयकार,
अजीज मारा जा चुका है,
मुँह बंद हो चुके हैं। 
हैरत में सब पूछ रहे हैं,
यह कैसे हुआ?
जिस तरह सब पूछ रहे हैं
उसी तरह मैं भी
यह कैसे हुआ?

 
प्रदूषण का नाम प्लास्टिक - कुमार जितेन्द्र "जीत"

धरा पर ढेर लग रहे हैं, प्लास्टिक से
कृत्रिम पहाड़ बन रहे हैं , प्लास्टिक से

 
कोमल मैंदीरत्ता की दो कवितायें  - कोमल मैंदीरत्ता

मेरी अपनी किताबों की दुनिया

 

 

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