मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।

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कविताएं

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हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज,
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन,
मैं हूँ केवल पतदल-आसन,
तुम सहज बिराजे महाराज।

 
हिन्दी भाषा - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh

छ्प्पै

 
इच्छाएं - शिवनारायण जौहरी विमल

दुबले पतंगी कागज़ का
उड़ता हुआ टुकड़ा नहीं
प्रसूती मन की
बलवती संतान हैं।

 
सोचेगी कभी भाषा - दिविक रमेश

जिसे रौंदा है जब चाहा तब
जिसका किया है दुरूपयोग, सबसे ज़्यादा।
जब चाहा तब
निकाल फेंका जिसे बाहर।
कितना तो जुतियाया है जिसे
प्रकोप में, प्रलोभ में
वह तुम्हीं हो न भाषा।

 
देश - शेरजंग गर्ग

ग्राम, नगर या कुछ लोगों का काम नहीं होता है देश
संसद, सड़कों, आयोगों का नाम नहीं होता है देश

 
हिंदी जन की बोली है - गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur

एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।

 
तुम' से 'आप' - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

तुम भी जल थे
हम भी जल थे
इतने घुले-मिले थे कि
एक-दूसरे से जलते न थे।
न तुम खल थे
न हम खल थे
इतने खुले-खिले थे कि
एक-दूसरे को खलते न थे।
अचानक तुम हमसे जलने लगे
तो हम तुम्हें खलने लगे।
तुम जल से भाप हो गए,
और 'तुम' से 'आप' हो गए।

 
कौरव कौन, कौन पांडव - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है।

 
झुक नहीं सकते | कविता - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अंतिम अस्त होती है।

 
भारतेंदु की कविता  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

 
कुछ उलटी सीधी बातें  - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh

जला सब तेल दीया बुझ गया है अब जलेगा क्या ।
बना जब पेड़ उकठा काठ तब फूले फलेगा क्या ॥1॥

 
हिन्दी - गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

अच्छी हिन्दी ! प्यारी हिन्दी !
हम तुझ पर बलिहारी ! हिन्दी !!

सुन्दर स्वच्छ सँवारी हिन्दी ।
सरल सुबोध सुधारी हिन्दी ।
हिन्दी की हितकारी हिन्दी ।
जीवन-ज्योति हमारी हिन्दी ।
अच्छी हिन्दी ! प्यारी हिन्दी !
हम तुझ पर बलिहारी हिन्दी !!

 
सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं  - सुशांत सुप्रिय

पड़ोसी

 
प्रेम रस - अंतरिक्ष सिंह

चाँदनी रात में
तुम्हारे साथ हूँ।
चाँदनी में घुल चुका,
मनोरम अहसास हूँ।

 
हिंदुस्तान की शान है हिन्दी - विकास कुमार

हिंदुस्तान की शान है हिन्दी, जन-जन की पहचान है हिन्दी।
यूं तो प्यारी हमको सारी भाषाएँ, पर हमारी जान है हिन्दी॥

 
कविता  - शिव प्रताप पाल

कविता किसी के ह्रदय का उदगार है
किसी के लिए ये काला आजार है
किसी के लिए यह केवल व्यापार है
किसी के लिए ये मियादी बुखार है

 
नारी - अर्चना

तू ही धरा, तू सर्वथा ।
तू बेटी है, तू ही आस्था।
तू नारी है, मन की व्यथा।
तू परंपरा, तू ही प्रथा।
तुझसे ही तेरे तपस से ही रहता सदा यहां अमन।
तेरे ही प्रेमाश्रुओं की शक्ति करती वसु को चमन।
तेरे सत्व की कथाओं को, करते यहाँ सब नमन।
फिर क्यों यहाँ, रहने देती है सदा मैला तेरा दामन।
तू माँ है, तू देवी, तू ही जगत अवतारी है।
मगर फिर भी क्यों तू वसुधा की दुखियारी है।
तेरे अमृत की बूंद से आते यहां जीवन वरदान हैं।
तेरे अश्रु की बूंद से ही यहाँ सागर में उफान हैं।
तू सीमा है चैतन्य की, जीवन की सहनशक्ति है ।
ना लगे तो राजगद्दी है और लग जाए तो भक्ति है।
तू वंदना, तू साधना, तू शास्त्रों का सार है।
तू चेतना, तू सभ्यता, तू वेदों का आधार है।
तू लहर है सागर की, तू उड़ती मीठी पवन है।
तू कोष है खुशियों का, इच्छाओं का शमन है।
तुझसे ही ये ब्रह्मांड है और तुझसे ही सृष्टि है।
तुझसे ही जीवन और तुझसे ही यहाँ वृष्टि है।
उठ खड़ी हो पूर्णशक्ति से।
फिर रोशन कर दे ये जहां।
जा प्राप्त कर ले अपने अधूरे स्वप्न को।
आ सुकाल में बदल दे इस अकाल को।
तू ही तो भंडार समस्त शक्तियों का।
प्राणी देह में भी संचार है तेरे लहू का।

 

 

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