दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ

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गीत

गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।

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फाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नंद किशोर - घासीराम | Ghasiram

घेर लई सब गली रंगीली, छाय रही छबि छटा छबीली,
जिन ढोल मृदंग बजाये हैं बंसी की घनघोर। फाग खेलन...॥१॥

 
इक अनजाने देश में - विजय कुमार सिंह

इक अनजाने देश में जब भी, मैं चुप हो रह जाता हूँ,
अपना मन उल्लास से भरने, देश तुझे ही गाता हूँ|
शुभ्र हिमालय सर हो मेरा,
सीना बन जाता विंध्याचल|
नीलगिरी घुटने बन जाते,
पैर तले तब नीला सागर|
दाएँ में कच्छ को भर लेता, बाएँ मिजो भर जाता हूँ,
अपना मन उल्लास से भरने,देश तुझे ही गाता हूँ|
श्वासों में तब तेरा समीरण,
धमनी में तेरा ही नद्जल|
आँखों में आकाश हो तेरा,
कानों में गाती फिर कोयल|
रोम मेरे पादप जाते, वन बन कर सज जाता हूँ,
अपना मन उल्लास से भरने, देश तुझे ही गाता हूँ|
स्मृति में मैं सब भर लेता,
तेरी थाती महिमा गौरव|
संत तपस्वी त्यागी ज्ञानी,
जिनसे जग में तेरा सौरभ|
मैं अपने मन श्रद्धा भरकर, हरपल शीश नवाता हूँ,
अपना मन उल्लास से भरने,देश तुझे ही गाता हूँ|

 
श्यामा श्याम सलोनी सूरत को सिंगार बसंती है - घासीराम | Ghasiram


 
अरी भागो री भागो री गोरी भागो - भारत दर्शन संकलन

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

बाके कमर में बंसी लटक रही
और मोर मुकुटिया चमक रही

संग लायो ढेर गुलाल,
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

इक हाथ पकड़ लई पिचकारी
सूरत कर लै पियरी कारी
इक हाथ में अबीर गुलाल

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
भर भर मारैगो रंग पिचकारी

चून कारैगो अगिया कारी
गोरे गालन मलैगो गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

यह पल आई मोहन टोरी
और घेर लई राधा गोरी
होरी खेलै करैं छेड़ छाड़
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

 
आज की होली  - ललितकुमारसिंह 'नटवर'

अजी! आज होली है आओ सभी।
रंगो ख़ुद भी, सब को रंगाओ सभी॥

 
कल कहाँ थे कन्हाई  - भारत दर्शन संकलन

कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई
आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ
कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई।

 
अजब हवा है - कृष्णा कुमारी

अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना।

युगों -युगों से भीगी नहीं बसंती चोली
रही सदा -सदा ही सूनी -सूनी मेरी होली
पुलकन -सिहरन अंग-अंग भर जाना।

अजब हवा है, मन मौसम बहक उठे हैं
दावानल -सम अधर पलाशी दहक उठे हैं
बरसा कर रति-रंग, दंग कर जाना।

बरसों बाद प्रवासी प्रियतम घर आएंगे
मेरे विरही नयन लजाते शरमायेंगे
तू पलकों में मिलन भंग भर जाना ।

अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना ।

- कृष्णा कुमारी

ई-मेल: krishna.kumari.kamsin9@gmail.com

 
आज कैसी वीर, होली? - क्षेमचन्द्र 'सुमन'

है उषा की पुणय-वेला
वीर-जीवन एक मेला
चल पड़ी है वीर युवकों, की नवल यह आज टोली?
आज कैसी वीर, होली?

मातृ-बन्धन काटने को
ध्येय पावन छाँटने को
बाँटने को शत्रु-संगर में, अनोखी लाल रोली !
आज कैसी वीर होली?

जा रहे हैं क्यों सुभट ये
और भोले निष्कपट से
आज करने प्रियतमा से, जेल में निज प्रेम-होली!
आज कैसी वीर होली?

- क्षेमचन्द्र 'सुमन', १६ मई' ४३

[ साभार: बन्दी के गान ]

 
मुट्ठी भर रंग अम्बर में - रोहित कुमार 'हैप्पी'

मुट्ठी भर रंग अम्बर में किसने है दे मारा
आज तिरंगा दीखता है अम्बर मोहे सारा

 

 

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