ग़ज़लें
ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्पणी के माध्यम से पृथक से प्रश्न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्त में निम्नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्ला, मक्ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्यथा गैर मुरद्दफ़।Article Under This Catagory
| घर से निकले .... - निदा फ़ाज़ली |
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घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे |
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| अहमद फ़राज़ की दो ग़ज़लें - अहमद फ़राज़ |
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नज़र की धूप में साये घुले हैं शब की तरह |
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| माँ | ग़ज़ल - निदा फ़ाज़ली |
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बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ |
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| अभी ज़मीर में... | ग़ज़ल - जावेद अख़्तर |
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अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है |
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| ये सारा जिस्म झुककर - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar |
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ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा |
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| अब के सावन में - गोपालदास ‘नीरज’ |
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अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई |
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| दिन को भी इतना अंधेरा - ज़फ़र गोरखपुरी |
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दिन को भी इतना अंधेरा है मिरे कमरे में |
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| चेहरा जो किसी शख्स का... - नरोत्तम शर्मा |
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चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को |
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| सामने आईने के जाओगे - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा' |
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सामने आईने के जाओगे? |
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