वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। - पीर मुहम्मद मूनिस।

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ग़ज़लें

ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

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यारो उम्र गुज़ार दी | ग़ज़ल - शांती स्वरूप मिश्र

यारो उम्र गुज़ार दी, अब समझने को बचा क्या है
सब कुछ तो कह चुके, अब कहने को बचा क्या है

 
दर्द के पैबंद | ग़ज़ल - रेखा राजवंशी

मखमली चादर के नीचे दर्द के पैबंद हैं
आपसी रिश्तों के पीछे भी कई अनुबंध हैं।

 
हाँ, तुम जुगनू को | ग़ज़ल  - रोहित कुमार हैप्पी

हाँ, तुम जुगनू को सूरज भी बता सकते हो
इस तरह कैसे उसका नाम मिटा सकते हो

 
आया कुछ पल - सोम नाथ गुप्ता

आया कुछ पल बिता के चला गया
बादल छींटे बरसा के चला गया

 
माना, गले से सबको - प्राण शर्मा

माना गले से सबको लगाता है आदमी
दिल में किसी-किसी को बिठाता है आदमी

 
मिलती हैं आजकल  - गुलशन मदान की गज़ल

मिलती हैं आजकल उन्हें ऊँचाइयां मियां
जिनसे बहुत ही दूर हैं अच्छाइयां मियां

मुझको वहाँ के लागे सब रोते हुए मिले
बजती थी कल तलक जहां शहनाइयां मियां

तारीकियों में साथ चलने की किसे कहें
चलती नहीं हैं साथ जब परछाइयां मियां

रख दो किताबें बांध कर तुलसी कबीर की
पढ़ता है कौन आजकल चौपाइयां मियां

उनकी सलीबो-दार ही ईनआम में मिले
करते रहे जो उम्र भर अच्छाइयां मियां

सागर की सतह से ही जो आए हैं लौट कर
उनका है दावा देखी हैं गहराइयां मियां

अब दूर ले चलो कहीं दुनियां की भीड़ में
'गुलशन' की भाती है फ़कत तन्हाइयां मियां।

 

 

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