हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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बच्चों की कहानियां

बच्चों के लिए मंनोरंजक बाल कहानियां व कथाएं (Hindi Stories and Tales for Children) पढ़िए। इन पृष्ठों में स्तरीय बाल-साहित्य का संकलन किया गया है।

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मैंने झूठ बोला था | बाल कथा - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar

एक बालक था। नाम था उसका राम। उसके पिता बहुत बड़े पंडित थे। वह बहुत दिन जीवित नहीं रहे। उनके मरने के बाद राम की माँ अपने भाई के पास आकर रहने लगी। वह एकदम अनपढ़ थे। ऐसे ही पूजा-पाठ का ठोंग करके जीविका चलाते थे। वह झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते थे।
वे पेशवा के राज में रहते थे। पेशवा विद्वानों का आदर करते थे। उन्हें वे दक्षिणा देते थे। वे विद्यार्थी को भी दक्षिणा देते थे। वे चाहते थे कि उनके राज में शिक्षा का प्रसार हो।

एक दिन बहुत से विद्वान पंडित और विद्यार्थी दक्षिणा लेने महल में पहुँचे। बड़े आदर से सूबेदार ने उन्हें बैठाया। उन्हीं में राम और उसके मामा भी थे। लेकिन वे न तो एक अक्षर पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। राम बार-बार धीरे-धीरे मामा से कहता, ''मामा ! मैं तो घर जा रहा हूँ ।''

मामा हर बार डाँट देते, ''चुप रह ! जब से आया है टर-टर किए जा रहा है।''

राम कहता, ''नहीं मामा। मैं यहाँ नहीं बैठूँगा। मैं कहाँ पढ़ता हूँ। मैं झूठ नहीं बोलूँगा।''

राम जब नहीं माना तो मामा ने किचकिचाकर कहा, ''चुप नहीं रहेगा। झूठ नहीं बोलूँगा। हूँ ऊ...। जैसे सच बोलने का ठेका तेने ही तो ले रखा है। जानता है मैं दिन भर झूठ बोलता हूँ। कितनी बार झूठ बोलकर दक्षिणा ली। तू भी तो बार-बार झूठ बोलता है। नहीं बोलता ? सब इसी तरह कहते हैं। जो ये सब यहाँ खड़ें हैं ये सब क्या पढ़े हुए हैं।''

राम ने कहना चाहा, 'पर मामा...' लेकिन मामा ने उसे बोलने ही नहीं दिया। डपटकर बोला, ''अरे खड़ा भी रह। तेरे सत्य के लिए मैं घर आती लक्ष्मी नहीं लौटाऊँगा, समझे। पूरा एक रुपया मिलेगा एक चेराशाही बस, चुप खड़ा रह। बारी आने वाली है।''

तभी पेशवा के प्रतिनिधि आ पहुँचे। उनके बैठते ही सूबेदार ने विद्वानों की मंडली से कहा, ''कृपा करके आप एक-एक करके आते जाएँ और दक्षिणा लेते जाएँ। हाँ-हाँ, आप आइए, गंगाधर जी।''

गंगाधर जी आगे आए। सूबेदार ने उनका परिचय दिया, ''जी ये हैं श्रीमान गंगाधर शास्त्री। न्याय पढ़ाते हैं।''

पेशवा के प्रतिनिध ने उन्हें प्रणाम किया। दक्षिणा देते हुए बोले, ''कृपा कर यह छोटी-सी भेंट ग्रहण कीजिए और खूब पढ़ाइए।''

शास्त्री जी ने दक्षिणा लेकर पेशवा का जय-जयकार किया और उनकी कल्याण कामना करते हुए चले गए। फिर दूसरे आए, तीसरे आए। चौथे नम्बर पर राम के मामा थे। वे जब आगे बढ़े तो सूबेदार ने उन्हें ध्यान से देखा, कहा ''मैं आपको नहीं पहचान रहा आप कहाँ पढ़ाते हैं ?''

मामा अपना रटारटाया पाठ भूल चुके थे। 'मैं' 'मैं' करने लगे। प्रतिनिधि ने बेचैन होकर पूछा, ''आपका शुभ नाम क्या है ? क्या आप पढ़ाते हैं ? बताइए न।''

लेकिन मामा क्या बतावें ? इतना ही बोल पाए, ''मैं...मैं....जी मैं...जी मैं वहाँ।''

उनको इस तरह बौखलाते हुए देखकर सब लोग हँस पड़े। पेशवा के प्रतिनिधि ने कठोर होकर कहा, ''जान पड़ता है आप पढ़े-लिखे नहीं हैं। खेद है कि आजकल कुछ लोग इतने गिर गए हैं कि झूठ बोलकर दक्षिणा लेते हैं। आप ब्राह्मण हैं। आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। आपको राजकोष से दक्षिणा नहीं मिल सकती पर जो माँगने आया है उसे निराश लौटाना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए मैं आपको अपने पास से भीख देता हूँ। जाइए।''

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गिरगिट का सपना - मोहन राकेश | Mohan Rakesh

एक गिरगिट था। अच्‍छा, मोटा-ताजा। काफी हरे जंगल में रहता था। रहने के लिए एक घने पेड़ के नीचे अच्‍छी-सी जगह बना रखी थी उसने। खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। आसपास जीव-जन्‍तु बहुत मिल जाते थे। फिर भी वह उदास रहता था। उसका ख्‍याल था कि उसे कुछ और होना चाहिए था। और हर चीज, हर जीव का अपना एक रंग था। पर उसका अपना कोई एक रंग था ही नहीं। थोड़ी देर पहले नीले थे, अब हरे हो गए। हरे से बैंगनी। बैंगनी से कत्‍थई। कत्‍थई से स्‍याह। यह भी कोई जिन्‍दगी थी! यह ठीक था कि इससे बचाव बहुत होता था। हर देखनेवाले को धोखा दिया जा सकता था। खतरे के वक्‍त जान बचाई जा सकती थी। शिकार की सुविधा भी इसी से थी। पर यह भी क्‍या कि अपनी कोई एक पहचान ही नहीं! सुबह उठे, तो कच्‍चे भुट्टे की तरह पीले और रात को सोए तो भुने शकरकन्‍द की तरह काले! हर दो घण्‍टे में खुद अपने ही लिए अजनबी!
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फ़क़ीर का उपदेश - भारत-दर्शन संकलन

एक बार गाँव में एक बूढ़ा फ़क़ीर आया । उसने गाँव के बाहर अपना आसन जमाया । वह बड़ा होशियार फ़क़ीर था । वह लोगों को बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बतलाता था । थोड़े ही दिनों में वह मशहूर हो गया । सभी लोग उसके पास कुछ न कुछ पूछने को पहुँचते थे । वह सबको
अच्छी सीख देता था ।
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सुखी आदमी की कमीज़  - जॉन हे

एक बार एक राजा था। उसके पास सब कुछ था लेकिन वह सुखी नहीं था। वह समझ नहीं पाता था कि कैसे ख़ुश रहा जाए? उसे यह लगने लगा कि वह बीमार है जबकि वह बिलकुल स्वस्थ दिखता था।
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गधा और मेढक  - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

एक गधा लकड़ी का भारी बोझ लिए जा रहा था। वह एक दलदल में गिर गया। वहाँ मेढकों के बीच जा लगा। रेंकता और चिल्‍लाता हुआ वह उस तरह साँसें भरने लगा, जैसे दूसरे ही क्षण मर जाएगा।
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दूध का दाँत - संगीता बैनीवाल

कुछ यादें बचपन की कभी नही भूलती हैं । जब कभी उसी प्रकार की परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं तो हमारी यादें बिन बुलाए मेहमान की तरह अा टपकती हैं।
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ताजपुर जंगल में आतंकी - राजेश मेहरा

ताजपुर जंगल में शाम का समय था। हल्की हल्की सर्द हवा बह रही थी।आसमान में बादल थे ऐसा लग रहा था जैसे बरसात होगी। सब जानवर अपना खाना खा कर तेजी से अपने अपने घरों की तरफ जा रहे थे। बीनू बाज भी आसमान के रास्ते अपने घोसले की तरफ जा रहा था। आज वह अपने घोसले से बहुत दूर आ गया था इसलिए वह जल्दी से उड़ कर अपने घर पहुंचना चाहता था। अचानक उसकी निगाह नीचे एक पहाड़ी की ओट में पड़ी, उसने देखा की चार भेड़िये अपने मुहँ पर कपडा बांधे और अपने आप को दुसरे जानवरों से बचाते व् छुपाते हुए ताजपुर जंगल की तरफ बढ़ रहे थे।बीनू बाज को उनकी इस हरकत पर कुछ शक हुआ। उसने एक बार तो सोचा मरने दो मुझे क्या लेकिन उसने सुन रखा था की उसके जंगल पर आने वाले नए साल के मोके पर कुछ आतंकी हमला कर सकते है, तो उसने उन चारो भेड़ियों की हरकत के बारे में पता लगाने का निश्चय किया। वह धीरे से नीचे आया और एक पेड़ पर छुप कर बैठ गया। अब बीनू बाज तो उन चारो भेडियों को देख सकता था लेकिन वो चारो उसको नही देख सकते थे।
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परीक्षा - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand



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