जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

कुंडलिया

कुंडलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। आदि में एक दोहा तत्पश्चात् रोला छंद जोड़कर इसमें कुल छह पद होते है। प्रत्येक पद में 24 मात्राएं होती हैं व आदि अंत का पद एक सा मिलता है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुंडलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुंडलिया समाप्त भी होती है।

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कलमकार पर कुंडलियाँ - राम औतार पंकज

कलमकार का है यही, गुण कर्त्तव्य पुनीत ।
सदा सृष्टि-कल्याण हित, रचे नीति के गीत ।।
रचे नीति के गीत, स्वस्थ मन-भ्रान्ति न लाये ।
जगा विश्व बन्धुत्व, न्याय हित क्रान्ति जगाये ।।
'पंकज' हो निष्पक्ष, पक्षधर सदाचार का।
पूजेगा पद-चिह्न, जगत उस कलमकार का।।

 

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