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किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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दिल पे मुश्किल है.... - कुँअर बेचैन

दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना
जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना

 
करो हम को न शर्मिंदा.. - कुँअर बेचैन

करो हम को न शर्मिंदा बढ़ो आगे कहीं बाबा
हमारे पास आँसू के सिवा कुछ भी नहीं बाबा

 
स्वप्न सब राख की... - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

स्वप्न सब राख की ढेरियाँ हो गए,
कुछ जले, कुछ बुझे, फिर धुआँ हो गए।  

 
गति का कुसूर - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

क्या होता है कार में
पास की चीज़ें
पीछे दौड़ जाती हैं
तेज़ रफ़्तार में!

 
अकबर और तुलसीदास - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

अकबर और तुलसीदास,
दोनों ही प्रकट हुए एक समय,
एक देश,  कहता है इतिहास;

 
हलीम 'आईना' के दोहे  - हलीम 'आईना'

आज़ादी को लग चुका, घोटालों का रोग।
जिसके जैसे दांत हैं, कर ले वैसा भोग ॥

 
आदमी से अच्छा हूँ ....! - हलीम 'आईना'

भेड़िए के चंगुल में फंसे
मेमने  ने कहा--
'मुझ मासूम को खाने वाले
हिम्मत है तो
आदमी को खा!'

 
मुझको याद किया जाएगा - गोपालदास ‘नीरज’

आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।

 
बेच डाला जिस्म... - गिरीश पंकज

बेच डाला जिस्म और ईमान रोटी के लिए,
क्या से क्या होता गया इंसान रोटी के लिए।

 
झुकी कमान  - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

आए प्रचंड रिपु, शब्द सुना उन्हीं का,
भेजी सभी जगह एक झुकी कमान।
ज्यों युद्ध चिह्न समझे सब लोग धाये,
त्यों साथ थी कह रही यह व्योम वाणी॥
"सुना नहीं क्या रणशंखनाद ?
चलो पके खेत किसान! छोड़ो।
पक्षी उन्हें खांय, तुम्हें पड़ा क्या?
भाले भिड़ाओ, अब खड्ग खोलो।
हवा इन्हें साफ़ किया करैगी,-
लो शस्त्र, हो लाल न देश-छाती॥"

 
शादी मत करना - गौरीशंकर 'मधुकर'

अफसर ने अफसरी
छांटते हुए
ऑफिस के क्लर्क
को डांटते हुए कहा- बहुत हो गया
कितनी छुट्टियां
ले चुके हो?
दो बार विदाउट
पे हो चुके हो
कभी ससुराल जाना
कभी बच्चे को
स्कूल में भर्ती कराना
कभी मां बीमार
कभी साले की सगाई
कभी साली की गोद-भराई
न जाने कैसे-कैसे बहाने बनाते हो!
महीने में पंद्रह  दिन
ऑफिस आते हो
क्लर्क को
कोई फर्क नहीं पड़ा
बेशर्मी से
मुस्कुराकर बोल पड़ा
सर! एक बार
और छुट्टी दे दीजिए
आप तो दयालु हैं
कृपा कीजिए
आगे से
छुट्टी पर नहीं जाऊंगा
दरअसल सरकारी
नौकरी वालों को
शादी जल्दी हो जाती है
यहां आपका हुक्म चलता है
वो घर पर चलाती है 
यहां आपके अंडर में रहता हूं
वहां उसके अंडर में रहता है
इसलिए तो
मैं कुंवारों से कहता हूं
अपने हाथों
अपनी जिंदगी
तबाह मत करना
कोई कितना भी
लालच क्यों ना दे मगर
भूलकर भी जा
तुम शादी मत करना। 

 
उदयभानु ‘हंस' के हाइकु  - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

युवक जागो!
अपना देश छोड़
यूँ मत भागो!

 
कोई नहीं पराया - गोपालदास ‘नीरज’

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।

 
चेतावनी - हरिकृष्ण प्रेमी

है सरल आज़ाद होना,
पर कठिन आज़ाद रहना।  

 
दे, मैं करूँ वरण - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'


दे, मैं करूँ वरण
जननि, दुःखहरण पद-राग-रंजित मरण ।

 
दर्द की सारी लकीरों.... | ग़ज़ल  - विजय कुमार सिंघल

दर्द की सारी लकीरों को छुपाया जाएगा
उनकी ख़ातिर आज हर चेहरा सजाया जाएगा

 
इसको ख़ुदा बनाकर | ग़ज़ल - विजय कुमार सिंघल

इसको ख़ुदा बनाकर उसको खुदा बनाकर 
क्यों लोग चल रहे हैं बैसाखियां लगाकर

 
बड़ी नाज़ुक है डोरी | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

बड़ी नाज़ुक है डोरी साँस की यह 
कहीं टूटी तो बाकी क्या रहेगा

 
प्रेम देश का... | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

प्रेम देश का ढूंढ रहे हो गद्दारों के बीच
फूल खिलाना चाह रहे हो अंगारों के बीच

 
मैं सूने में मन बहलाता - शिवमंगल सिंह सुमन

मेरे उर में जो निहित व्यथा
कविता तो उसकी एक कथा
छंदों में रो-गाकर ही मैं, क्षण-भर को कुछ सुख पा जाता
मैं सूने में मन बहलाता।

 
अवध में राना भयो मरदाना - लोक-साहित्य

अवध में राना भयो मरदाना।
पहिल लड़ाई भई बकसर मां सेमरी के मैदाना।
हुवां से जाय पुरवामां जीत्यो तबै लाट घबराना।
नक्की मिले, मानसिंह मिलिगै जानै सुदर्शन काना।
छत्री बंश एकु ना मिलि है जानै सकल जहाना।
भाई बंधु औ कुटुम कबीला सबका करौ सलामा।
तुम तो जाय मिल्यो गोरन ते हमका है भगवाना।
हाथ मा भाला बगल सिरोही घोडा चलै मस्ताना।
कहैं दुलारे सुन मेरे प्यारे यों राना कियो पयाना ।।

 
कंकड चुनचुन  - कबीरदास | Kabirdas

कंकड चुनचुन महल उठाया
        लोग कहें घर मेरा। 
ना घर मेरा ना घर तेरा
        चिड़िया रैन बसेरा है॥

 
भारत माता - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

(राष्ट्रीय गीत)

 
लक्ष्य-भेद - मनमोहन झा की

बोलो बेटे अर्जुन!
सामने क्या देखते हो तुम?
संसद? सेक्रेटेरिएट? मंत्रालय? या मंच??
अर्जुन बोला तुरंत--
गुरुदेव! मुझे सिवा कुर्सी के कुछ भी नजर नहीं आता ।
पुलकित गुरु बोले द्रोण--
हे धनंजय! तुम मंत्री पद वरोगे
काम कुछ भी नहीं करोगे/ फिर भी
धन से घर भरोगे
केवल कुर्सी के लिए जिओगे ।
और कुर्सी के लिए ही मरोगे ।

 
हिंदुस्तान - मनमोहन झा की


धूर्तों का नारा
मूर्खों को चारा
सारे जहां से अच्छा
यह हिंदुस्तान हमारा ।

 
सयाना - गोलोक विहारी राय

आदि काल से बस यूँ ही, चला आ रहा खेल।
बनने और बनाने की, चलती रेलम पेल।।
चलती रेलम पेल, दाँव जब जिसका चलता।
कहते उसको बुद्धिमान, वही सभी को छलता।।
कहे भोला भुलक्कड़, जिस पर हँसे जमाना।
कोई मूरख कहता उसको, कहता कोई दीवाना।।

 
कमल - मयंक गुप्ता

दलदल के भीतर अपने अंशों को पिरोए हुए,
शायद वंशावली की धरोहर को संजोए हुए,
एक कमल दल तैरता रहता,
कभी इस छोर-कभी उस छोर।
नहीं था ज्ञान अपने होने का उसको,
समझ बैठा कीचड़ को घर ।

 
तुम बेटी हो - राधा सक्सेना

तुम मेरी बेटी जैसी हो, ये कहना बहुत आसान है
इन शब्दों का लेकिन अब यहां, कौन रखता मान है!
इसी एक झूठे भ्रम में खुश हो लेती है वो नादान है
कहने में क्या, कहते तो सभी बेटी को वरदान है।
कहने और करने में, फर्क बहुत बड़ा होता है
बेटियों को भार न समझना मुश्किल जरा होता है।
इस दुनिया में लोगों का, दिल कहां बड़ा होता है!
भेड़िया इंसान के रूप में हर मोड़ पर खड़ा होता है।
नन्ही सी जान के दुश्मन को कौन कहेगा इंसान है!
गर्भ से लेकर जवानी तक उस पर लटक रही तलवार है
प्यार बांटने वाली बेटी को क्यों नहीं मिलता प्यार है!
उसकी हर एक बात पर उठते हर रोज यहां सवाल है
न जाने कब जागेगी दुनिया सुनके उसकी चीख पुकार है।
उसकी इस व्यथा वेदना का कब होगा स्थाई समाधान है!
जो कोख में नहीं मरती वो हर रोज यहां मरती है
अपने अरमानों के संग हरपल थोड़ा-थोड़ा बिखरती है।
सुरक्षा की कसम खाके भी हम रक्षा नहीं कर पाते हैं
उसके हक के लिए बस खोखले नारे ही लगाते हैं
'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का चलता हर रोज अभियान है।

 
वो मजदूर कहलाता है - राधा सक्सेना

जो हमारे लिए घर बनाता है
घर नहीं हमारे उस सपने को साकार करता है
जिसे हम खुली आंखों से देखते हैं
खुद झोपड़ी में बेफिक्र होकर सोता है,
और कोई सपना नहीं देखता।

 
एक बार फिर... -  व्यग्र पाण्डे

वो
चला तो ठीक था
लोग कहते थे
इसमें
शक्ति है/बुद्धि है
और चातुर्य भी
ये जीत जायेगा
दौड़ अपनी,
पर क्या हुआ ?
गंतव्य से पहले ही
शायद
वो भटक गया
उसकी सब विशेषताएं
उड़ गई
सूखे पत्तों की तरह
या फिर
भूल गया वो
कि वह एक
विशेष कार्य को निकला था
वो अटक गया
राह की चकाचौंध में
और चटक गया
उसका लक्ष्य
शीशे की तरह...
दौड़ का समय
पूर्ण होने को है
अबकी बार
खरगोश सोया तो नहीं
अति आत्मविश्वास में
यहां वहां घूमता रहा
लगता है
एक बार फिर
कछु आ
जीत जायेगा
दौड़ अपनी ...

- व्यग्र पाण्डे
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी, स.मा.(राज.) 322201
ई-मेल: vishwambharvyagra@gmail.com

 
दूब - मंजू रानी

तुम ने कभी दूब को मरते देखा है
वह सदा जीवित रहती है।
अन्दर ही अन्दर अपनी जड़े फैलाती रहती है।
अनुकूल वातावरण में सब को पीछे छोड़
सारी धरा पर छा जाती है।
अपनी मिट्टी को अच्छे से जकड़े रहती है
इसलिए
हर मौसम सह जाती है।
सूखने के बाद भी
हरियाली
धरा पर फैला देती है।
ये दूब ही है
जो हर तूफान सह जाती है।
किसी भी रंग को हावी नहीं
होने देती है
इसलिए धरा को विपदाओं से
बचाती रहती है।
पर इंसा इस वहम में जीता है
कि उसने उसे कूचल दिया है
पर वह सदा जीवित रहती है
पर वह सदा जीवित रहती है।

 
चलो चलें - शशि द्विवेदी

चलो चलें कुछ नया करें,
नयी राह बना दें,
नया चलन चला दें,
कुछ कांटें निकाल दें,
कुछ फूल बिछा दें।।

 
रोहित ठाकुर की तीन कविताएं  - रोहित ठाकुर

चलता हुआ आदमी

 
यह टूटा आदमी -  शिव नारायण जौहरी 'विमल'

कुंठा के कांधे पर उजड़ी मुस्कान धरे
हर क्षण श्मशान के द्वार खड़ा आह भरे
यह टूटा आदमी है भीड़ में अकेला
बेचारा देख रहा तृष्णा का मेला।

 
1857  - शिव नारायण जौहरी 'विमल'

सत्तावन का युद्ध खून से
लिखी गई कहानी थी
वृद्ध युवा महिलाओं तक
में आई नई जवानी थी
आज़ादी के परवानों ने
मर मिटने की ठानी थी !

क्रांति संदेशे बाँट रहे थे
छदम वेश में वीर -जवान
नीचे सब बारूद बिछी थी
ऊपर हरा भरा उद्यान
मई अंत में क्रांतिवीर को
भूस में आग लगानी थी !

मंगल पांडे की बलि ने
संयम का प्याला तोड़ दिया
जगह-जगह चिंगारी फूटी
तोपों का मुँह मोड़ दिया
कलकत्ता से अंबाला तक
फूटी नई जवानी थी !

मेरठ कानपुर में तांडव
धू-धू जले फिरंगी घर
नर-मुंडों से पटे रास्ते
गूँजे 'जय भारत' के स्वर
दिल्ली को लेने की अब
इन रणवीरों ने ठानी थी !

तलवारों ने तोपें छीनी
प्यादों ने घोड़ों की रास
नंगे-भूखे भगे फिरंगी
जंगल में छिपने की आस
झाँसी में रणचंडी ने भी
अपनी भृकुटी तानी थी !

काशी इलाहाबाद अयोध्या
में रनभेरी गूँजी थी
फर्रूखाबाद, इटावा तक में
यह चिंगारी फूटी थी
गंगा-यमुना लाल हो गई
इतनी क्रुद्ध भवानी थी !

आज़ादी की जली मशालें
नगर, गाँव, गलियारों में
कलकत्ता से कानपुर तक
गोली चली बाज़ारों में
तांत्या, बाजीराव, कुंवर की
धाक शत्रु ने मानी थी !

दिल्ली पर चढ़ गये बांकुरे
शाह ज़फर सम्राट बने
सच से होने लगे देश
की आज़ादी के वे सपने
अँग्रेज़ों को घर जाने की
बस अब टिकिट कटानी थी !

लेकिन आख़िर वही हुआ
सर पत्थर से टकराने का
किंतु हार है मार्ग जीत
को वरमाला पहनाने का
बर्बरता को रौंध पैर से
माँ की मुक्ति करानी थी !

आज़ादी का महासमर यह
चला निरंतर नब्बे साल
बदली युध नीतियाँ लेकिन
हाथो में थी वही मशाल
पंद्रह अगस्त को भारत ने
लिखी नई कहानी थी
आज़ादी की हुई घोषणा
दुनिया ने सन्मानी थी !

- शिव नारायण जौहरी 'विमल'
  भोपाल (म. प्र.), भारत
  ई-मेल: madhupradh@gmail.com

 
आयुर्वेदिक देसी दोहे  - भारत-दर्शन संकलन

रस अनार की कली का, नाक बूंद दो डाल।
खून बहे जो नाक से, बंद होय तत्काल।।

 
सपना - स्वरांगी साने

खुली आँखों से
सपना देखती
सपने को टूटता देखती
खुद को अकेला देखती

 
पीहर - स्वरांगी साने

कविता में जाना
मेरे लिए पीहर जाने जैसा है।

 
प्याज़ - स्वरांगी साने

बहुत सारा
प्याज़ काटने बैठ जाती थी माँ।
कहती थी मसाला भूनना है।

 

 

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