हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।

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गीत

गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।

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श्रम का वंदन | जन-गीत - गिरीश पंकज

जिस समाज में श्रम का वंदन, केवल वही हमारा है।
आदर हो उन सब लोगों का, जिनने जगत सँवारा है।
होते न मजदूर जगत में, हम सिरजन ना कर पाते।
भवन, सड़क, तालाब, कुऍं कैसे इनको हम गढ़ पाते।
श्रमवीरों के बलबूते ही, अपना वैभव सारा है।
जिस समाज में श्रम का वंदन,केवल वही हमारा है।

 
तू, मत फिर मारा मारा - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

निविड़ निशा के अन्धकार में
जलता है ध्रुव तारा
अरे मूर्ख मन दिशा भूल कर
मत फिर मारा मारा--
तू, मत फिर मारा मारा।

 
संकल्प-गीत  - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

हम तरंगों से उलझकर पार जाना चाहते हैं।
कष्ट के बादल घिरें हम किंतु घबराते नहीं हैं
क्या पतंगे दीपज्वाला से लिपट जाते नहीं हैं?
फूल बनकर कंटकों में, मुस्कराते ही रहेंगे,
दुख उठाए हैं, उठाएंगे, उठाते ही रहेंगे।
पर्वतों को चीर कर गंगा बहाना चाहते हैं,
हम तरंगों से उलझकर पार जाना चाहते हैं।

 
दर्द के बोल - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

उसको मन की क्या कहता मैं?
अपना भी मन भरा हुआ था।
इसकी-उसकी, ऐसी-वैसी,
जाने क्या-क्या धरा हुआ था!
उसको मन की क्या कहता मैं, अपना भी मन भरा हुआ था!

 
माँ की याद बहुत आती है ! - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

माँ की याद बहुत आती है !

 
सोचो - राजीव कुमार सिंह

लाचारी का लाभ उठाने को लालायित रहते हैं।
सोचो यदि हम मानव हैं तो दानव किसको कहते हैं।