देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

Find Us On:

English Hindi
Loading

गीत

गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।

Article Under This Catagory

श्रमिक का गीत  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

रहा हाड़ ना मास मेरा
जानू हूँ इतिहास तेरा।

हम धरती पर तंग हुए
देवलोक में वास तेरा।
          जानू हूँ इतिहास तेरा॥
 
खाऊँ, ओड़ूँ, इसे बिछौऊं
किया बड़ा विश्वास तेरा।
           जानू हूँ इतिहास तेरा॥

जो चाहे तू वो मैं बोलूँ
ना बंधुआ, ना दास तेरा।
           जानू हूँ इतिहास तेरा॥

'रोहित' सुन ले बात ध्यान से
वरना होगा नास तेरा।
        जानू हूँ इतिहास तेरा॥

 
धर्म निभा - रोहित कुमार 'हैप्पी'

कवि कलम का धर्म निभा
कलम छोड़ या सच बतला।

 
पथ की बाधाओं के आगे | गीत - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

पथ की बाधाओं के आगे घुटने टेक दिए
अभी तो आधा पथ चले!
तुम्हें नाव से कहीं अधिक था बाहों पर विश्वास,
क्यों जल के बुलबुले देखकर गति हो गई उदास,
ज्वार मिलेंगे बड़े भंयकर कुछ आगे चलकर--
अभी तो तट के तले तले!
सीमाओं से बाँध नहीं पाता कोई मन को,
सभी दिशाओं में मुड़ना पड़ता है जीवन को,
हो सकता है रेखाओं पर चलना तुम्हें पड़े
अभी तो गलियों से निकले!
शीश पटकने से कम दुख का भार नहीं होगा,
आँसू से पीड़ा का उपसंहार नहीं होगा,
संभव है यौवन ही पानी बनकर बह जाए
अभी तो नयन-नयन पिघले!

 
मजदूर की पुकार  - अज्ञात

हम मजदूरों को गाँव हमारे भेज दो सरकार
सुना पड़ा घर द्वार
मजबूरी में हम सब मजदूरी करते हैं
घरबार छोड़ करके शहारों में भटकते हैं

 
अभिशापित जीवन - डॉ॰ गोविन्द 'गजब'

साथ छोड़ दे साँस, न जाने कब थम जाए दिल की धड़कन।
बोझ उठाये कंधों पर, जीते कितना अभिशापित जीवन॥