शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

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गीत

गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।

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जो समर में हो गए अमर - नरेंद्र शर्मा

जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रद्धा-गीत धन्यवाद में
जो समर में हो गए अमर ...

 
फ़क़ीराना ठाठ | गीत - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आ तुझको दिखाऊँ मैं अपने ठाठ फ़क़ीराना
फाकों से पेट भरना और फिर भी मुसकुराना। 
आ तुझको दिखाऊँ मैं--------

 
अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत  - गोपालदास ‘नीरज’

अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

 
चाहता हूँ चुप रहे - विजय कुमार सिंह

चाहता हूँ, चुप रहे कुछ भी न बोले,
पर मेरा मन तब भी मुझसे बोलता है।
गीत सुख के अब अधिक गाता नहीं है,
उस तरह होकर भी मुस्काता नहीं है।

 

 

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