हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

गीत

गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।

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मौन ओढ़े हैं सभी | राजगोपाल सिंह का गीत - राजगोपाल सिंह

मौन ओढ़े हैं सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर
राख के नीचे दबी चिंगारियाँ होंगी ज़रूर

 
चाहता हूँ देश की.... - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

 
पीर  - डॉ सुधेश

हड्डियों में बस गई है पीर।

 
जवानी के क्षण में | गीत - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali

कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
कुछ जीने का आनन्द मिले
कुछ मरने का आनन्द मिले
दुनिया के सूने ऑगन में कुछ ऐसा खेल रचो साथी !

 
मन की आँखें खोल - सुदर्शन | Sudershan

बाबा, मन की आँखें खोल!
दुनिया क्या है खेल-तमाशा,
चार दिनों की झूठी आशा,
पल में तोला, पल में माशा,
ज्ञान-तराजू लेके हाथ में---
तोल सके तो तोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

झूठे हैं सब दुनियावाले,
तन के उजले मनके काले,
इनसे अपना आप बचा ले,
रीत कहाँ की प्रीत कहाँ की---
कैसा प्रेम-किलोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

 
सजनवा के गाँव चले  - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

सूरज उगे या शाम ढले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

 
माँ की याद बहुत आती है ! - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

माँ की याद बहुत आती है !

 

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