हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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कहानियां

कहानियों के अंतर्गत यहां आप हिंदी की नई-पुरानी कहानियां पढ़ पाएंगे जिनमें कथाएं व लोक-कथाएं भी सम्मिलित रहेंगी। पढ़िए मुंशी प्रेमचंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वरनाथ रेणु, सुदर्शन, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, यशपाल, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मालियो टोल्स्टोय की कहानियां

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चीन की दीवार - फ्रैंज काफ्का

उत्तर के अंतिम मोड़ पर चीन की दीवार का निर्माण पूरा हो गया था। दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिरम की दीवारों के दोनों भाग यहीं आकर मिल गए थे। टुकड़ों में निर्माण का यह सिद्धान्त- छोटे स्तमरों पर पूर्वी और पश्चिंमी दोनों ही श्रम-सेनाओं द्वारा अपनाया गया था। यह इस प्रकार किया गया थाः करीब बीस मजदूरों का एक समूह बनाकर एक निश्चि्त लम्बाहई की दीवार बनाने का काम दे दिया जाता है, जैसे पाँच सौ गज लम्बीव दीवार। इसी प्रकार एक दूसरे समूह को इतनी ही लम्बादई पर काम में लगा दिया जाता जिनका काम पहिले समूह के किए काम के अंत में आकर समाप्तज हो जाता था। लेकिन दोनों दीवारों के मिलने के बाद उनसे उस स्थाोन से आगे काम नहीं कराया जाता था, जैसे मान लो हजार गज दीवार जहाँ पूरी हुई, वहाँ से नहीं वरन्‌ मजदूरों के इन दोनों समूहों को पास के किसी दूसरे इलाके में दीवार बनाने लगा दिया जाता था। स्वारभाविक है इस प्रकार दीवार के बीच में बड़े-बड़े हिस्सेि बनने से छूटते गए, जिन्हें बाद में छोटे-छोटे टुकड़ों में बनाया जाता रहा, यहाँ तक कि दीवार के निर्माण की सरकारी घोषणा के बाद भी इन खाली स्थाानों पर दीवार बनती रही थी। सच तो यह है कि कुछ लोगों की राय में तो बहुत से ऐसे भागों को कभी पूरा ही नहीं किया गया।

 
बदबू - सुशांत सुप्रिय

रेल-यात्राओं का भी अपना ही मज़ा है । एक ही डिब्बे में पूरे भारत की सैर हो जाती है । 'आमार सोनार बांग्ला' वाले बाबू मोशाय से लेकर 'बल्ले-बल्ले' वाले सरदारजी तक, 'वणक्कम्' वाले तमिल भाई से लेकर 'केम छो ' वाले गुजराती सेठ तक -- सभी से रेलगाड़ी के उसी डिब्बे में मुलाक़ात हो जाती है । यहाँ तरह-तरह के लोग मिल जाते हैं । विचित्र क़िस्म के अनुभव हो जाते हैं ।

 
पत्रकार - विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक

दोपहर का समय था । 'लाउड स्पीकर' नामक अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र के दफ्तर में काफी चहल-पहल थी। यह एक प्रमुख तथा लोकप्रिय पत्र था।
प्रधान सम्पादक अपने कमरे में मेज के सामने विराजमान थे। इनकी बयस पचास के लगभग थी।
इनके सम्मुख दो सहकारी सम्पादक उपस्थित थे। तीनों व्यक्ति मौन बैठे थे-मानो किसी एक ही बात पर तीनों विचार कर रहे थे। सहसा प्रधान सम्पादक बोल उठे-"रुपये का कोई विचार नहीं। रुपया चाहे जितना खर्च हो जाए; परन्तु केस का विवरण सब से पहले हमारे पत्र में प्रकाशित होना चाहिए।"
"यह बात सर्वथा रिपोर्टर के कौशल पर निर्भर है।"
"निःसंदेह! यदि रिपोर्टर कुशल न हुआ तो रुपया खर्च करके भी कोई लाभ न होगा।" दूसरा सम्पादक बोला।
"खैर यह मानी हुई बात है कि बिना अच्छा रिपोर्टर हुए काम नहीं हो सकता। अपने यहाँ का कौन सा रिपोर्टर इस कार्य के योग्य है।"
"मेरे ख्याल से तो मि॰ सिनहा इस कार्य को कर लेंगे।"
"मेरा भी ख्याल ऐसा ही है।"
"मैंने मि० सिनहा को बुलाया तो है।"
"अभी तो वह आए नहीं हैं।"
"मैंने कह दिया है कि जिस समय आवें मेरे पास भेज देना।" यह कहकर सम्पादक ने घन्टी बजाई।
तुरन्त एक चपरासी अन्दर आया सम्पादक ने उससे कहा-"मि॰ सिनहा आये हैं? देखो तो!"
चपरासी चला गया। कुछ क्षण पश्चात आकर बोला-"अभी तो नहीं आये।
"आते होंगे!" कहकर सम्पादक महोदय पुनः सहकारियों से बात करने लगे। कुछ देर पश्चात् एक व्यक्ति सम्पादक के कमरे में प्रविष्ट हुआ। यह व्यक्ति यथेष्ट ह्रष्ट-पुष्ट था। वयस 25, 26 के लगभग गौरवर्ण, क्लीनशेव्ड, देखने में सुन्दर जवान था। उसे देखते ही सम्पादक महोदय ने कहा-"आइये मि० सिनहा! मैं आपकी प्रतीक्षा ही कर रहा था।"
मि० सिनहा मुस्कराते हुए एक कुर्सी पर बैठ गये और बोले--"कहिये, क्या आज्ञा है?"
"भाई बात यह है कि 'कला भवन का उद्घाटन हो रहा है। उसमें महाराज की स्पीच होगी। वह स्पीच सबसे पहले हमारे पत्र में प्रकाशित होनी चाहिए।"
मि. सिनहा ने कहा-"सो तो होना ही चाहिए।"
"परन्तु इस कार्य को करेगा कौन? आप कर सकेंगे?"
मि. सिनहा विचार में पड़ गये। सम्पादक महोदय बोले--"खर्च की चिन्ता मत कीजिएगा।"
मि. सिनहा बोले- "प्रयत्न करूँगा। सफलता का वादा नहीं करता।"
"सफलता का वादा तो कोई नहीं कर सकता। परन्तु अच्छे से अच्छा प्रयत्न करने का वादा किया जा सकता है।"
"वह मैं निश्चय ही करूंगा। अभी काफी समय है। "
"हाँ दस दिन हैं।"
तो यदि मुझे आज से ही इस कार्य के लिए मुक्त कर दिया जाए तो अधिक अच्छा रहेगा।"
"हाँ, हाँ ! आज से आप मुक्त हैं और जितना रुपया उचित समझे ले लें।"
"अच्छी बात है। मैं आज रात को ही प्रस्थान करूंगा। रात में कोई ट्रेन जाती है?"
"हाँ, जाती है।"
"तो बस उसी से प्रस्थान करूँगा।'

 
हाथी की फाँसी - गणेशशंकर विद्यार्थी | Ganesh Shankar Vidyarthi

कुछ दिन से नवाब साहब के मुसाहिबों को कुछ हाथ मारने का नया अवसर नही मिला था। नवाब साहब थे पुराने ढंग के रईस। राज्‍य तो बाप-दादे खो चुके थे, अच्‍छा वसीका मिलता था। उनकी ‘इशरत मंजिल' कोठी अब भी किसी साधारण राजमहल से कम न थी। नदी-किनारे वह विशाल अट्टालिका चाँदनी रात में ऐसी शोभा देती थी, मानो ताजमहल का एक टुकड़ा उस स्‍थल पर लाकर खड़ा कर दिया गया हो। बाहर से उसकी शोभा जैसी थी, भीतर से भी वह वैसी ही थी। नवाब साहब को आराइश का बहुत खयाल रहता था। उस पर बहुत रुपया खर्च करते थे और या फिर खर्च करते चारों ओर मुसाहिबों की बातों पर। उम्र ढल चुकी थी, जवानी के शौक न थे, किंतु इन शौकों पर जो खर्च होता, उसे कहीं अधिक यारों की बेसिर-पैर की बातों पर आए दिन हो जाया करता था। नित्‍य नए किस्‍से उनके सामने खड़े रहते थे। पिछला किस्‍सा यहाँ कह देना बेज़ा न होगा। यारों ने कुछ सलाह की और दूसरे दिन सवेरे कोर्निश और आदाब के और मिज़ाजपुर्सी के बाद लगे वे नवाब साहब की तारीफ में ज़मीन और आसमान के कुलाबे एक करने। यासीन मियाँ ने एक बात की, तो सैयद नज़मुद्दीन ने उस पर हाशिया चढ़ाया। हाफिज़जी ने उस पर और भी रंग तेज़ किया। अंत में मुन्‍ने मिर्जा ने नवाब साहब की दीनपरस्‍ती पर सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘खुदावंद, कल रात को मैंने जो सपना देखा, उससे तो यही जी चाहता है कि हुजूर के कदमों पर निसार हो जाऊँ और जिंदगी-भर इन पाक-कदमों को छोड़कर कहीं जाने का नाम न लूँ।''

 
सुखमय जीवन - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

परीक्षा देने के पीछे और उसके फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर 'कहावती आठ हफ्ते' में कितने दिन घटते हैं, यह गिनते हैं। कभी-कभी उन आठ हफ्तों पर कितने दिन चढ़ गए, यह भी गिनना पड़ता है। खाने बैठे है और डाकिए के पैर की आहट आई - कलेजा मुँह को आया। मुहल्ले में तार का चपरासी आया कि हाथ-पाँव काँपने लगे। न जागते चैन, न सोते-सुपने में भी यह दिखता है कि परीक्षक साहब एक आठ हफ्ते की लंबी छुरी ले कर छाती पर बैठे हुए हैं।