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बाल-साहित्य

बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल-कहानियाँ, बाल गीत व कविताएँ प्रमुख हैं। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पंचतंत्र की कथाएँ बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हिंदी बाल-साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पंचतंत्र, हितोपदेश, अमर-कथाएँ व अकबर बीरबल के क़िस्से बच्चों के साहित्य में सम्मिलित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गई है। बाल साहित्य के अंतर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियां व बाल कविता सम्मिलित की गई हैं।

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फूलों का गीत  - निरंकार देव

 

 
साखियाँ - कबीर

जाति न पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।।1।।

आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक ।।2।।

माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि।
मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं ।।3।।

कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ।
उड़ि पड़ै जब आँखि मैं, खरी दुहेली होइ ।।4।।

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय ।।5।।

 
नया साल आया - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

नया साल आया
स्वागत में मौसम ने
नया गीत गाया
डाल-डाल झुकी हुई
महक उठे फूल-फूल
पवन संग पत्ते भी
देखो रहे झूल झूल
ईर्ष्या को त्याग दें
सबको अनुराग दें
सुख-दुख में साथ रहें
हाथों में हाथ में दें
आओ नए साल में
गीत नया गाएं
दया प्रेम करुणा को
जी भर अपनाएं ।।

 
मुर्गे जी महाराज - सुभाष मुनेश्वर | न्यूज़ीलैंड

सुबह उठे कि दिये बाँग
मुर्गे जी महाराज
आप जगे औरों को जगाये
कर ऊंची आवाज।

 
माँ कह एक कहानी - मैथिलीशरण गुप्त

"माँ, कह एक कहानी !"

"बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी ?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी ?
कह माँ, कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी ? माँ, कह एक कहानी ।"

"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी ।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ, यही कहानी ।"

"वर्ण-वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिन्दु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी ।"
"लहराता था पानी! हाँ, हाँ, यही कहानी ।"

"गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्ष की कानी !"
"हुई पक्ष की हानी ? करुणा-भरी कहानी !"

"चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया ।
इतने में आखेटक आया, लक्ष्य-सिद्धि का मानी ।"
"लक्ष्य-सिद्धि का मानी! कोमल-कठिन कहानी ।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी ।
तब उसने, जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी ।"
"हठ करने की ठनी! अब बढ़ चली कहानी ।"

"हुआ विवाद सदय-निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गई बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी ।"
"सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी ।"

"राहुल, तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका ?"
"माँ, मेरी क्या बानी ? मैं सुन रहा कहानी ।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य न उसे उबारे ?
रक्षक पर भक्षक को वारे न्याय दया का दानी ।"

"न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी ।"

 
लोभी दरजी | बाल-कहानी - गिजुभाई

 

 
बेईमान - अरविन्द

गाँव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था। 

 
राजा का महल | बाल-कविता  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

नहीं किसी को पता कहाँ मेरे राजा का राजमहल!
अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल?
इसकी दीवारें चाँदी की, छत सोने की धात की,
पैड़ी-पैड़ी सुंदर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की।
इसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घरबार,
सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार।
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में:
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में!

 
ची-ची | बाल कहानी  - वंदना शर्मा

एक था चूहा। नाम था उसका ची-ची। एक दिन वो सुबह की सैर को जा रहा था। उसे एक पेड़ के नीचे कुछ चमकीला-सा दिखाई दिया। ची-ची दौड़कर पहुंचा वहां, देखा एक सुन्दर लाल कपडा था। जो बहुत चमक रहा था। वह ख़ुशी से उछल पड़ा,"अरे वाह कितना सुन्दर कपडा है। इसकी तो मैं टोपी सिलवाऊंगा। शादी में जाऊंगा। सेल्फी लूंगा। गरम -गरम रसगुल्ले खाऊंगा। वॉओ! कितना मज़ा आएगा! युम्मी-यम्मी ! ऐसा सोचकर उसने लाल कपड़े को उठाया और उलट-पलटकर देखने लगा। टोपी सिलाने के लिए चाहिए, एक दर्जी।

 

 

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