शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

Find Us On:

Hindi English
Loading

बाल-साहित्य

बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल-कहानियाँ, बाल गीत व कविताएँ प्रमुख हैं। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पंचतंत्र की कथाएँ बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हिंदी बाल-साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पंचतंत्र, हितोपदेश, अमर-कथाएँ व अकबर बीरबल के क़िस्से बच्चों के साहित्य में सम्मिलित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गई है। बाल साहित्य के अंतर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियां व बाल कविता सम्मिलित की गई हैं।

Article Under This Catagory

होली आई रे | बाल कविता - प्रकाश मनु | Prakash Manu

चिट्ठी में है मन का प्यार
चिट्ठी  है घर का अखबार
इस में सुख-दुख की हैं बातें
प्यार भरी इस में सौग़ातें
कितने दिन कितनी ही रातें
तय कर आई मीलों पार।

...

 
नाग और चीटियां - विष्णु शर्मा

एक घने जंगल में एक बड़ा-सा नाग रहता था। वह चिड़ियों के अंडे, मेढ़क तथा छिपकलियों जैसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं को खाकर अपना पेट भरता था। रातभर वह अपने भोजन की तलाश में रहता और दिन निकलने पर अपने बिल में जाकर सो रहता। धीरे-धीरे वह मोटा होता गया। वह इतना मोटा हो गया कि बिल के अंदर-बाहर आना-जाना भी दूभर हो गया।
...

 
व्यापारी और नक़लची बंदर  - अज्ञात


...

 
डा रामनिवास मानव की बाल-कविताएं - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

डा रामनिवास मानव की बाल-कविताएं
...

 
होली | बाल कविता - गीत माला

होली आई, होली आई,
रंग उड़ाती होली आई।

नन्हें-मुन्नों को भाति होली आई,

अबीर-गुलाल से खेलो होली भाई।

मतवालों की टोली चिल्लाती आई,

इन्हें गुज़िया खिलाओ भाई,

होली आई, होली आई।

...

 
सूरज दादा कहाँ गए तुम - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

सूरज  दादा  कहाँ   गए  तुम,
...

 
बगीचा - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

मेरे घर में बना बगीचा,
हरी घास ज्यों बिछा गलीचा।

गेंदा, चम्पा और चमेली,
लगे मालती कितनी प्यारी।
मनीप्लान्ट आसोपालव से,
सुन्दर लगती मेरी क्यारी।

छुई-मुई की अदा अलग है,
छूते ही नखरे दिखलाती।
रजनीगंधा की बेल निराली,
जहाँ जगह मिलती चढ़ जाती।

तुलसी का गमला है न्यारा,
सब रोगों को दूर भगाता।
मम्मी हर दिन अर्ध्य चढ़ाती,
दो पत्ते तो मैं भी खाता।

दिन में सूरज, रात को चन्दा,
हर रोज़ मेरी बगिया आते।
सूरज से ऊर्जा मिलती है,
शीतलता मामा दे जाते।

रोज़ सबेरे हरी घास पर,
मैं नंगे पाँव टहलता हूँ।
योगा प्राणायाम और फिर,
हल्की जोगिंग करता हूँ।

दादा जी आसन सिखलाते,
और ध्यान भी करवाते हैं।
प्राणायाम, योग वो करते,
और मुझे भी बतलाते हैं।

और शाम को चिड़िया-बल्ला,
कभी-कभी तो कैरम होती।
लूडो, सांप-सीढ़ी भी होती,
या दादा जी से गप-सप होती।

फूल कभी मैं नहीं तोड़ता,
देख-भाल मैं खुद ही करता।
मेरा बगीचा मुझको भाता,
इसको साफ सदा मैं रखता।

जग भी तो है एक बगीचा,
हरा-भरा इसको करना है।
पर्यावरण सन्तुलित कर,
धरती को हमें बचाना है।
...

 
होली | बाल कविता - गुलशन मदान


...

 
गर धरती पर इतना प्यारा  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

गर धरती पर इतना प्यारा,
बच्चों का संसार न होता !
...

 

 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश
Hindi Story | Hindi Kahani