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हास्य काव्य

भारतीय काव्य में रसों की संख्या नौ ही मानी गई है जिनमें से हास्य रस (Hasya Ras) प्रमुख रस है जैसे जिह्वा के आस्वाद के छह रस प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार हृदय के आस्वाद के नौ रस प्रसिद्ध हैं - श्रृंगार रस (रति भाव), हास्य रस (हास), करुण रस (शोक), रौद्र रस (क्रोध), वीर रस (उत्साह), भयानक रस (भय), वीभत्स रस (घृणा, जुगुप्सा), अद्भुत रस (आश्चर्य), शांत रस (निर्वेद)।

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कवि हूँ प्रयोगशील - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

गलत न समझो, मैं कवि हूँ प्रयोगशील,
खादी में रेशम की गांठ जोड़ता हूं मैं।
कल्पना कड़ी-से-कड़ी, उपमा सड़ी से सड़ी,
मिल जाए पड़ी, उसे नहीं छोड़ता हूँ मैं।
स्वर को सिकोड़ता, मरोड़ता हूँ मीटर को
बचना जी, रचना की गति मोड़ता हूं मैं।
करने को क्रिया-कर्म कविता अभागिनी का,
पेन तोड़ता हूं मैं, दवात फोड़ता हूँ मैं ॥

 
व्यंग्य कोई कांटा नहीं  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

हास्य केले का छिलका नहीं-
सड़क पर फेंक दो और आदमी फिसल जाए,
व्यंग्य बदतमीजों के मुंह का फिकरा नहीं-
कस दो और संवेदना छिल जाए।
हास्य किसी फूहड़ के जूड़े में
रखा हुआ टमाटर नहीं,
वह तो बिहारी की नायिका की
नाक का हीरा है।
मगर वे इसे क्या समझेंगे
जो साहित्य का खोमचा लगाते हैं
और हास्य जिनके लिए जलजीरा है !

 
हिन्दी-भक्त  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

सुनो एक कविगोष्ठी का, अद्भुत सम्वाद ।
कलाकार द्वय भिडे गए, चलने लगा विवाद ।।
चलने लगी विवाद, एक थे कविवर 'घायल' ।
दूजे श्री 'तलवार', नई कविता के कायल ।।
कह 'काका' कवि, पर्त काव्य के खोल रहे थे।
कविता और अकविता को, वे तोल रहे थे ।।

 

 

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