शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

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ठिठुरता हुआ गणतंत्र  - हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।

 
छोटा बड़ा - प्रेमनारायण टंडन

एक विशाल वृक्ष की छाया से हटकर मैं खड़ा था और मेरे हाथ में एक सुंदर, छोटा आईना था ।

 
अपनी-अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं। हमें बैठते ही समझ में आ गया कि ये नहीं देंगे। वे भी शायद समझ गए कि ये टल जाएँगे। फिर भी हम दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही था। हमने प्रार्थना की तो वे बोले-आपको चंदे की पड़ी है, हम तो टैक्सों के मारे मर रहे हैं।

 
भारत व ऑस्ट्रेलिया पर गूगल डूडल - रोहित कुमार हैप्पी

26 जनवरी पर भारत व ऑस्ट्रेलिया पर गूगल डूडल

26 जनवरी 2019: आज गूगल ने अपना डूडल भारत व आस्ट्रेलिया को समर्पित किया है। भारत का आज गणतंत्र-दिवस है व ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय-दिवस है।

 
गांधीजी का अंतिम दिन - भारत-दर्शन संकलन | Collections

30 जनवरी 1948 का दिन गांधीजी के लिए हमेशा की तरह व्यस्तता से भरा था। प्रात: 3.30 को उठकर उन्होंने अपने साथियों मनु बेन, आभा बेन और बृजकृष्ण को उठाया। दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर 3.45 बजे प्रार्थना में लीन हुए। घने अंधकार और कँपकँपाने वाली ठंड के बीच उन्होंने कार्य शुरू किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दस्तावेज को पुन: पढ़कर उसमें उचित संशोधन कर कार्य पूर्ण किया।

 
अद्भुत संवाद - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

"ए, जरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो।"
"यह कूदेगा तो नहीं?"
"कूदेगा! भला कूदेगा क्यों? लो संभालो। "
"यह काटता है?"
"नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो।"
"क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं तब सम्हलता है?"
"नहीं !"
"फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं।"

 
गांधी को श्रद्धांजलि - भारत-दर्शन संकलन | Collections

30 जनवरी 1948 के सूर्यास्त के साथ पंडित नेहरु को लगा कि हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है। चारों ओर अंधकार व्याप्त है। लेकिन दूसरे ही क्षण सत्य प्रकट हुआ और नेहरु ने कहा "मेरा कहना गलत है, हजारों वर्षों के अंत होने तक यह प्रकाश दिखता ही रहेगा और अनगिनत लोगों को सांत्वना देता रहेगा।"

 
मगहर की दिव्यता एवं अलौकिकता  - डॉ० राधेश्याम द्विवेदी

उत्तर प्रदेश के बस्ती एवं गोरखपुर का सरयूपारी क्षेत्र महात्माओं, सिद्ध सन्तों, मयार्दा पुरूषोत्तम भगवान राम तथा भगवान बुद्ध के जन्म व कर्म स्थलों, महर्षि श्रृंगी, वशिष्ठ, कपिल, कनक, क्रकुन्छन्द, कबीर तथा तुलसी जैसे महान सन्तों-गुरूओं के आश्रमों से युक्त है। गोरखपुर से लगभग 30 कि.मी. पश्चिम, बस्ती से 43 कि.मी. पूर्व पहले गोरखपुर, फिर बस्ती तथा अब सन्त कबीर नगर जिले में आमी नदी के तट पर मगहर नामक एक दिव्य एवं अलौकिक कस्बा अवस्थिति है। इसके नाम के बारे में अलग अलग तरह की भ्रान्तियां एवं किवदन्तियां प्रचलित है। मेरे विचार से भाषाशास्त्र के शब्द व्युत्पत्ति को देखते हुए ''मामा का घर'' को मगहर के रूप में जाना जा सकता है । यह किस मामा से संबंधित है। यह शोध एवं खोज का विषय हो सकता है। यह भी हो सकता है कि भगवान बुद्ध या अन्य किसी इतिहास पुरूष के ननिहाल या मामा का घर इस क्षेत्र में होने के कारण इसको पहले मामा का घर और बाद में मगहर कहा जाने लगा हो।

कहा जाता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में इसी मार्ग से बौद्ध भिक्षु कपिलवस्तु, लुम्बनी तथा श्रावस्ती आदि पवित्र स्थलों को दर्शन हेतु जाते थे । चोर डाकुओं द्वारा इस सूनसान स्थान पर लोगों को लूट लिया जाता था। इस असुरक्षित स्थल को 'मार्ग हर' कहा जाता था। बाद में यही मगहर कहा जाने लगा। एक अन्य अनुश्रुति में कहा गया है कि कभी मगध के राजा अजातशत्रु ने बीमार होने पर यहाँ विश्राम किया था। इस घटना के घटित होने के कारण इसे मगधहर फिर मगहहर और बाद में मगहर कहा जाने लगा। कबीरपंथियों ने इस स्थान की अलग ही व्याख्या की है जो सर्वाधिक सार्थक प्रतीत होता है। 'मगहर' मार्ग + हर शब्द से बना है जिसका अर्थ 'ज्ञान का रास्ता' होता है।

 

 

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