यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद।

Find Us On:

English Hindi
Loading

हास्य काव्य

भारतीय काव्य में रसों की संख्या नौ ही मानी गई है जिनमें से हास्य रस (Hasya Ras) प्रमुख रस है जैसे जिह्वा के आस्वाद के छह रस प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार हृदय के आस्वाद के नौ रस प्रसिद्ध हैं - श्रृंगार रस (रति भाव), हास्य रस (हास), करुण रस (शोक), रौद्र रस (क्रोध), वीर रस (उत्साह), भयानक रस (भय), वीभत्स रस (घृणा, जुगुप्सा), अद्भुत रस (आश्चर्य), शांत रस (निर्वेद)।

Article Under This Catagory

डिजिटल इंडिया  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वर्मा जी ने फेसबुक पर स्टेटस लिखा -
Enjoying in Dubai with family!
साथ में...पूरे परिवार का फोटो अपलोड किया था!

 
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा

 
बहरे या गहरे  - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

अचानक तुम्हारे पीछे
कोई कुत्ता भोंके,
तो क्या तुम रह सकते हो
बिना चोंके?

 
समंदर की उम्र - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

लहर ने
समंदर से
उसकी उम्र पूछी,
समंदर मुस्करा दिया।

 
जय जय जय अंग्रेजी रानी! - डॉ. रामप्रसाद मिश्र

जय जय जय अंग्रेजी रानी!
‘इंडिया दैट इज भारत' की भाषाएं भरतीं पानी ।
सेवारत हैं पिल्ले, मेनन, अयंगार, मिगलानी
तमिलनाडु से नागालैंड तक ने सेवा की ठानी।
तेरे भक्तों को हिंदी में मिलती नहीं रवानी
शब्दों की भिक्षा लेले उर्दू ने कीर्ति बखानी।
एंग्लो-इंडियन भाई कहते, तू भारत की वाणी
अड़गम- बड़गम-कड़गम कहते, तू महान् कल्याणी।
अंकल,आंटी, मम्मी, डैडी तक है व्यापक कहानी
पब्लिक स्कूलों से संसद तक तूने महिमा तानी।
अंग्रेजी में गाली देने तक में ठसक बढ़ानी
फिर भाषण में क्यों न लगे सब भक्तों को सिम्फानी ।
मैनर से बैनर, पिओन से लीडर तक लासानी
सभी दंडवत करते तुझको, तू समृद्धि-सुख-दानी।
जय जय जय अंग्रेजी रानी!
जय जय जय अंग्रेजी रानी!!

 
पेट महिमा - बालमुकुंद गुप्त

साधु पेट बड़ा जाना।
यह तो पागल किये जमाना।।
मात पिता दादा दादी घरवाली नानी नाना।
सारे बने पेट की खातिर बाकी फकत बहाना।।
पेट हमारा हुंडी पुर्जो पेट हि माल खजाना।
जबसे जन्मे सिवा पेट के और न कुछ पहचाना।।
लड्डू पेड़ा पूरी बरफ़ी रोटी साबूदाना।
सब जाता है इसी पेट में हलवा दाल मखाना ।।
बाहर धर्म्म भवन शिव मंदिर क्या ढूंढे दीवाना।
ढूंढो इसी पेट में प्यारो तब कुछ मिले ठिकाना।।

 
हास्य ही सहारा है - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

जिंदगी हो गई है तंगदस्त
और तनावों ने उसे
कर दिया है अस्तव्यस्त,
मस्ती की फ़हरिस्त
निरस्त हो गई है
और हमारी हस्ती
अपनों के धोखे में
पस्त हो गई है।
अब कोई ऐसा सिद्धहस्त
सलाहकार भी नहीं
जो हमारी त्रस्त जीवनशैली को
आश्वस्त कर सके
या हमारे सपनों का रखवाला
सरपरस्त बन सके।
ऐसे में मात्र एक ही सहारा है
हमारे जीवन की शुष्क धरा पर
केवल हास्य ही
उभरता हुआ चश्मा है, धारा है।
यही हमारे दुखों को देगा शिकस्त
और करेगा हमें विश्वस्त
कि आओ, हास्य-कविताएँ पढ़ो
और हो जाओ मदमस्त।

 
कानून मिला हमको  - प्रदीप चौबे

दिल्ली, बंबई, काशी, देहरादून मिला हमको,
बस्ती-बस्ती इंसानों का खून मिला हमको।

 
विचित्र विवशता! - मधुप पांडेय

‘उधर प्रशासन को
चुस्त बनाने के
अथक प्रयास हो रहे हैं
और इधर आप
टेबल पर सिर रखकर
आराम से सो रहे हैं!'
उत्तर मिला--
‘अब आप ही बताएं!
ऑफिस में ‘तकिया'
कहां से लाएं?'

 
लंच! प्रपंच!! - मधुप पांडेय

आगंतुक ने चिढ़कर
बड़े बाबू से कहा -
"अजीब प्रपंच है!
मैं जब भी आता हूं,
क्लर्क कहता है--
श्रीमान, अभी ‘लंच' है।
समझ नहीं पाता हूं
मेरे आने का समय
गलत या सही है।
क्या आपके यहां
लंच का कोई
निश्चित समय नहीं है?"
उत्तर मिला--" श्रीमान,
जब भी कोई आगंतुक
‘लंच' का प्रस्ताव लाता है।
हमारे ऑफिस में
तुरंत उसी समय
‘लंच' का समय हो जाता है!"

 
हुल्लड़ के दोहे  - हुल्लड़ मुरादाबादी

बुरे वक्त का इसलिए, हरगिज बुरा न मान
यही तो करवा गया, अपनों की पहचान

 
प्रयोगवाद - दिनेश कुमार गोयल

आलू!
उस पर एक और आलू,
फिर एक और आलू,
उस पर एक और आलू,
आलू, ऊपर आलू, उस पर आलू,
बोलो कृपालू
काव्य नहीं समझे
तो थैले से बैंगन भी निकालूं ?

 
नया ‘वाद’ - निशिकांत

एक साहित्य गोष्ठी में
जितने थे
सब किसी न किसी ‘वाद' के
वादी ‘थे'।
गोष्टी खत्म हुई
तो एक ने पूछा,
"जो सबसे ज्यादा बोले
वह कौन थे?"
दूसरे ने धीरे से कहा,
वह इलाहावादी थे !"

 
उन्हें आज ... - बेढब बनारसी

उन्हें आज आई है कैसी जवानी,
सभी कह रहे हैं उन्हीं की कहानी ।

 
ढोल, गंवार... - सुरेंद्र शर्मा

मैंने अपनी पत्नी से कहा --
"संत महात्मा कह गए हैं--
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु और नारी
ये सब ताड़न के अधिकारी!"
[इन सभी को पीटना चाहिए!]

 
विरह का गीत - कवि चोंच

तुम्हारी याद में खुद को बिसारे बैठे हैं।
तुम्हारी मेज पर टंगरी पसारे बैठे हैं ।

 
बेधड़क दोहावली  - बेधड़क

गुस्सा ऐसा कीजिए, जिससे होय कमाल ।
जामुन का मुखड़ा तुरत बने टमाटर लाल।।

 
हँसाइयाँ - बेधड़क बनारसी

उस खुदा का नहीं कानून समझते हैं वे
मुझको हँसने का ही मजमून समझते हैं वे।
‘बेधड़क' क्या करूं मैं उनको दिखाकर सूरत
मेरी फोटो को भी कार्टून समझते हैं वे।

 
भिखारी| हास्य कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

एक भिखारी दुखियारा
भूखा, प्यासा
भीख मांगता
फिरता मारा-मारा!

 

 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश