अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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मोहन खेल रहे है होरी - शिवदीन राम

मोहन खेल रहे हैं होरी ।
गुवाल बाल संग रंग अनेकों, धन्य धन्य यह होरी ।।
वो गुलाल राधे ले आई, मन मोहन पर ही बरसाई ।
नन्दलाल भी लाल होगये, लाल लाल वृज गौरी ।।
गुवाल सखा सब चंग बजावे, कृष्ण संग में नांचे गावें ।
ऐसी घूम मचाई कान्हा, मस्त मनोहर जोरी ।।
नन्द महर घर रंग रंगीला, रंग रंग से होगया पीला ।
बहुत सजीली राधे रानी, वे अहिरों की छोरी ।।
शोभा देख लुभाये शिवजी, सती सायानी के है पिवजी ।
शिवदीन लखी होरी ये रंग में, रंग दई चादर मोरी ।।

 
डिजिटल इंडिया  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वर्मा जी ने फेसबुक पर स्टेटस लिखा -
Enjoying in Dubai with family!
साथ में...पूरे परिवार का फोटो अपलोड किया था!

 
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा

 
परदे हटा के देखो - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,
ग़म हैं हँसी के अंदर, परदे हटा के देखो।

 
बहरे या गहरे  - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

अचानक तुम्हारे पीछे
कोई कुत्ता भोंके,
तो क्या तुम रह सकते हो
बिना चोंके?

 
रे रंग डारि दियो राधा पर - शिवदीन राम

रे रंग डारि दियो राधा पर, प्यारा प्रेमी कृष्ण गोपाल |
तन मन भीगा अंग-अंग भीगा, राधा हुई निहाल || रे...
गोप्या रंग रंगीली रंग में, ग्वाल सखा कान्हा के संग में |
चंग बजावे रसिया गावे, गांवें राग धमाल || रे....
श्यामा श्याम यमुन तट साजे, मधुर अनुपम बाजा बाजे |
रंग भरी पिचकारी मारे, हँसे सभी ब्रिजबाल || रे...
मोर मुकुट पीताम्बर वारा, निरखे गोप्यां रूप तिहारा |
राधा कृष्ण मनोहर जोरी, काटत जग जंजाल || रे...
शिवदीन रंगमय बादल छाया, मनमोहन प्रभू रंग रचाया |
गुण गावां, गावां गुण कृष्णा, मोहे बरषाने ले चाल || रे...

 
समंदर की उम्र - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

लहर ने
समंदर से
उसकी उम्र पूछी,
समंदर मुस्करा दिया।

 
तुम मेरी बेघरी पे... - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

तुम मेरी बेघरी पे बड़ा काम कर गए
कागज का शामियाना हथेली पर धर गए

 
अरी भागो री भागो री गोरी भागो - भारत दर्शन संकलन

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

बाके कमर में बंसी लटक रही
और मोर मुकुटिया चमक रही

संग लायो ढेर गुलाल,
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

इक हाथ पकड़ लई पिचकारी
सूरत कर लै पियरी कारी
इक हाथ में अबीर गुलाल

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
भर भर मारैगो रंग पिचकारी

चून कारैगो अगिया कारी
गोरे गालन मलैगो गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

यह पल आई मोहन टोरी
और घेर लई राधा गोरी
होरी खेलै करैं छेड़ छाड़
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।

 
आज की होली  - ललितकुमारसिंह 'नटवर'

अजी! आज होली है आओ सभी।
रंगो ख़ुद भी, सब को रंगाओ सभी॥

 
कल कहाँ थे कन्हाई  - भारत दर्शन संकलन

कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई
आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ
कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई।

 
अजब हवा है - कृष्णा कुमारी

अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना।

युगों -युगों से भीगी नहीं बसंती चोली
रही सदा -सदा ही सूनी -सूनी मेरी होली
पुलकन -सिहरन अंग-अंग भर जाना।

अजब हवा है, मन मौसम बहक उठे हैं
दावानल -सम अधर पलाशी दहक उठे हैं
बरसा कर रति-रंग, दंग कर जाना।

बरसों बाद प्रवासी प्रियतम घर आएंगे
मेरे विरही नयन लजाते शरमायेंगे
तू पलकों में मिलन भंग भर जाना ।

अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना ।

- कृष्णा कुमारी

ई-मेल: [email protected]

 
आज कैसी वीर, होली? - क्षेमचन्द्र 'सुमन'

है उषा की पुणय-वेला
वीर-जीवन एक मेला
चल पड़ी है वीर युवकों, की नवल यह आज टोली?
आज कैसी वीर, होली?

मातृ-बन्धन काटने को
ध्येय पावन छाँटने को
बाँटने को शत्रु-संगर में, अनोखी लाल रोली !
आज कैसी वीर होली?

जा रहे हैं क्यों सुभट ये
और भोले निष्कपट से
आज करने प्रियतमा से, जेल में निज प्रेम-होली!
आज कैसी वीर होली?

- क्षेमचन्द्र 'सुमन', १६ मई' ४३

[ साभार: बन्दी के गान ]

 
होली है आख़िर.. -  राजेन्द्र प्रसाद

होली है आख़िर मनाना पड़ेगा
मजबूर है दिल मिलाना पड़ेगा

सड़े डालडे की तली पूड़ियां हैं
वह कहते हैं अपने को खाना पड़ेगा

मूरत पर बारह बजे हैं मगर वो
कहते हैं ढोलक बजाना पड़ेगा

उड़ी चाय पी कर के होटल से मैना
मोहब्बत में दिल तो चुकाना पड़ेगा

बढ़ा लो बढ़ा लो अभी बाल अपने
औलाद होगी घटाना पड़ेगा

उन्हें चाय पर जब बुलाया गया
तो कहा आज ठर्रा पिलाना पड़ेगा

हो गया है मैंने उनका ‘मिनी' स्तर
उन्हें अब ‘मिनिस्टर' बनाना पड़ेगा


वह दिन नहीं दूर जबकि वतन में
होली में घर को जलाना पड़ेगा

- राजेन्द्र प्रसाद [गुदगुदी]

 
होली पद  - जुगलकिशोर मुख्तार

ज्ञान-गुलाल पास नहिं, श्रद्धा-रंग न समता-रोली है ।
नहीं प्रेम-पिचकारी कर में, केशव शांति न घोली है ।।
स्याद्वादी सुमृदंग बजे नहिं, नहीं मधुर रस बोली है ।
कैसे पागल बने हो चेतन ! कहते ‘होली होली है' ।।

 
किस रंग खेलूँ अबके होली - विवेक जोशी "जोश"

लाल देश पे क़ुर्बान हुआ
सूनी हुई एक माँ की झोली
किस रंग खेलूँ अबके होली...

 
जय जय जय अंग्रेजी रानी! - डॉ. रामप्रसाद मिश्र

जय जय जय अंग्रेजी रानी!
‘इंडिया दैट इज भारत' की भाषाएं भरतीं पानी ।
सेवारत हैं पिल्ले, मेनन, अयंगार, मिगलानी
तमिलनाडु से नागालैंड तक ने सेवा की ठानी।
तेरे भक्तों को हिंदी में मिलती नहीं रवानी
शब्दों की भिक्षा लेले उर्दू ने कीर्ति बखानी।
एंग्लो-इंडियन भाई कहते, तू भारत की वाणी
अड़गम- बड़गम-कड़गम कहते, तू महान् कल्याणी।
अंकल,आंटी, मम्मी, डैडी तक है व्यापक कहानी
पब्लिक स्कूलों से संसद तक तूने महिमा तानी।
अंग्रेजी में गाली देने तक में ठसक बढ़ानी
फिर भाषण में क्यों न लगे सब भक्तों को सिम्फानी ।
मैनर से बैनर, पिओन से लीडर तक लासानी
सभी दंडवत करते तुझको, तू समृद्धि-सुख-दानी।
जय जय जय अंग्रेजी रानी!
जय जय जय अंग्रेजी रानी!!

 
पेट महिमा - बालमुकुंद गुप्त

साधु पेट बड़ा जाना।
यह तो पागल किये जमाना।।
मात पिता दादा दादी घरवाली नानी नाना।
सारे बने पेट की खातिर बाकी फकत बहाना।।
पेट हमारा हुंडी पुर्जो पेट हि माल खजाना।
जबसे जन्मे सिवा पेट के और न कुछ पहचाना।।
लड्डू पेड़ा पूरी बरफ़ी रोटी साबूदाना।
सब जाता है इसी पेट में हलवा दाल मखाना ।।
बाहर धर्म्म भवन शिव मंदिर क्या ढूंढे दीवाना।
ढूंढो इसी पेट में प्यारो तब कुछ मिले ठिकाना।।

 
हास्य ही सहारा है - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

जिंदगी हो गई है तंगदस्त
और तनावों ने उसे
कर दिया है अस्तव्यस्त,
मस्ती की फ़हरिस्त
निरस्त हो गई है
और हमारी हस्ती
अपनों के धोखे में
पस्त हो गई है।
अब कोई ऐसा सिद्धहस्त
सलाहकार भी नहीं
जो हमारी त्रस्त जीवनशैली को
आश्वस्त कर सके
या हमारे सपनों का रखवाला
सरपरस्त बन सके।
ऐसे में मात्र एक ही सहारा है
हमारे जीवन की शुष्क धरा पर
केवल हास्य ही
उभरता हुआ चश्मा है, धारा है।
यही हमारे दुखों को देगा शिकस्त
और करेगा हमें विश्वस्त
कि आओ, हास्य-कविताएँ पढ़ो
और हो जाओ मदमस्त।

 
कानून मिला हमको  - प्रदीप चौबे

दिल्ली, बंबई, काशी, देहरादून मिला हमको,
बस्ती-बस्ती इंसानों का खून मिला हमको।

 
विचित्र विवशता! - मधुप पांडेय

‘उधर प्रशासन को
चुस्त बनाने के
अथक प्रयास हो रहे हैं
और इधर आप
टेबल पर सिर रखकर
आराम से सो रहे हैं!'
उत्तर मिला--
‘अब आप ही बताएं!
ऑफिस में ‘तकिया'
कहां से लाएं?'

 
लंच! प्रपंच!! - मधुप पांडेय

आगंतुक ने चिढ़कर
बड़े बाबू से कहा -
"अजीब प्रपंच है!
मैं जब भी आता हूं,
क्लर्क कहता है--
श्रीमान, अभी ‘लंच' है।
समझ नहीं पाता हूं
मेरे आने का समय
गलत या सही है।
क्या आपके यहां
लंच का कोई
निश्चित समय नहीं है?"
उत्तर मिला--" श्रीमान,
जब भी कोई आगंतुक
‘लंच' का प्रस्ताव लाता है।
हमारे ऑफिस में
तुरंत उसी समय
‘लंच' का समय हो जाता है!"

 
हुल्लड़ के दोहे  - हुल्लड़ मुरादाबादी

बुरे वक्त का इसलिए, हरगिज बुरा न मान
यही तो करवा गया, अपनों की पहचान

 
प्रयोगवाद - दिनेश कुमार गोयल

आलू!
उस पर एक और आलू,
फिर एक और आलू,
उस पर एक और आलू,
आलू, ऊपर आलू, उस पर आलू,
बोलो कृपालू
काव्य नहीं समझे
तो थैले से बैंगन भी निकालूं ?

 
नया ‘वाद’ - निशिकांत

एक साहित्य गोष्ठी में
जितने थे
सब किसी न किसी ‘वाद' के
वादी ‘थे'।
गोष्टी खत्म हुई
तो एक ने पूछा,
"जो सबसे ज्यादा बोले
वह कौन थे?"
दूसरे ने धीरे से कहा,
वह इलाहावादी थे !"

 
उन्हें आज ... - बेढब बनारसी

उन्हें आज आई है कैसी जवानी,
सभी कह रहे हैं उन्हीं की कहानी ।

 
ढोल, गंवार... - सुरेंद्र शर्मा

मैंने अपनी पत्नी से कहा --
"संत महात्मा कह गए हैं--
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु और नारी
ये सब ताड़न के अधिकारी!"
[इन सभी को पीटना चाहिए!]

 
विरह का गीत - कवि चोंच

तुम्हारी याद में खुद को बिसारे बैठे हैं।
तुम्हारी मेज पर टंगरी पसारे बैठे हैं ।

 
बेधड़क दोहावली  - बेधड़क

गुस्सा ऐसा कीजिए, जिससे होय कमाल ।
जामुन का मुखड़ा तुरत बने टमाटर लाल।।

 
हँसाइयाँ - बेधड़क बनारसी

उस खुदा का नहीं कानून समझते हैं वे
मुझको हँसने का ही मजमून समझते हैं वे।
‘बेधड़क' क्या करूं मैं उनको दिखाकर सूरत
मेरी फोटो को भी कार्टून समझते हैं वे।

 
होली के गीत  - भारत दर्शन संकलन

त्योहारों को आधार बनाकर गीत लेखन की परम्परा हमारे देश में अत्यन्त प्राचीन है। भारतवर्ष के प्रत्येक क्षेत्र में प्रारम्भ से ऐसे गीतों की रचना की जाती है जो विभिन्न त्योहारों के अवसर पर गाए जाते हैं।

 
अन्तस् पीड़ा का गहन जाल  - सागर

अधरों पर हास-------
सुख का परिहास।
हृदय मुखर, स्वर-आकुलित
प्रत्यक्ष शब्दविहीन कंठ
किस वेदना से है चूर-चूर
मेरी देह, मन, मेरी आत्मा
मुझे ज्ञात है, अनभिज्ञ है
ये जगत मेरा, मेरा निज, सखा।
कैसे कहूं, किस मुख कहूं
संताप का जो वितान है
पीड़ाकुलित मन प्राण है
मेरे प्रिय का प्रदान है
जिनने दिया यह क्लेश-धन
करता रहा संतप्त मन
उनके लिए मैं कौन हूँ
बस मैं हूँ अपने साथ
कुछ कहता नहीं, और मौन हूँ ।

 
भिखारी| हास्य कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

एक भिखारी दुखियारा
भूखा, प्यासा
भीख मांगता
फिरता मारा-मारा!

 

 

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