राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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गुरु महिमा दोहे - भारत-दर्शन संकलन

गुरू महिमा पर दोहे

 
हिन्दी-हत्या - अरुण जैमिनी

सरकारी कार्यालय में
नौकरी मांगने पहुँचा
तो अधिकारी ने पूछा-
"क्या किया है?"

 
उतने सूर्यास्त के उतने आसमान - आलोक धन्वा

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सड़कों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रोशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे, जानी-पहचानी आवाज़ें
कभी लिखेंगे कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह।

 
ओम ह्रीं श्री लक्ष्म्यै नमः  - राजेश्वर वशिष्ठ

हमारे घर में पुस्तकें ही पुस्तकें थीं
चर्चा होती थी वेदों, पुराणों और शास्त्रों की
राम चरित मानस के साथ पढ़ी जाती थी
चरक संहिता और लघु पाराशरी
हम उन ग्रंथों को सम्भालने में ही लगे रहते थे!
घर में अक्सर खाली रहता था
अनाज का भंडार
पिता की जेबों में
शायद ही कभी दिखते थे हरे हरे नोट
पर हमें भूखा नहीं रहना पड़ा कभी
जब भी माँ शिकायत करती
कुछ न होने की
कोई न कोई निवासी
मुहुर्त या लग्न पूछने के बहाने
दे ही जाता सेर भर अनाज,
गुड़ और सवा रुपया
और पिता जी उन रुपयों को
संभाल कर रख देते
मंदिर के लाल कपड़े के नीचे,
लक्ष्मी के चरणों में!

 
बेटी-युग - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, बीता कलयुग कब का,
बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
बेटी-युग में खुशी-खुशी है,
पर मेहनत के साथ बसी है।
शुद्ध-कर्म निष्ठा का संगम,
सबके मन में दिव्य हँसी है।
नई सोच है, नई चेतना, बदला जीवन सबका,
बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
इस युग में ना परदा बुरका,
ना तलाक, ना गर्भ-परिक्षण।
बेटा बेटी, सब जन्मेंगे,
सबका होगा पूरा रक्षण।
बेटी की किलकारी सुनने, लालायित मन सबका।
बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
बेटी भार नहीं इस युग में,
बेटी है आधी आबादी।
बेटा है कुल का दीपक, तो,
बेटी है दो कुल की थाती।
बेटी तो शक्ति-स्वरूपा है, दिव्य-रूप है रब का।
बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
चौके चूल्हे वाली बेटी,
बेटी-युग में कहीं न होगी।
चाँद सितारों से आगे जा,
मंगल पर मंगलमय होगी।
प्रगति-पंथ पर दौड़ रहा है, प्राणी हर मज़हब का।
बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।

 
खौफ़ - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

जाने-पहचाने पेड़ से
फल के बजाय टपक पड़ता है बम
काक-भगोड़ा राक्षस से कहीं ज्यादा खतरनाक

 
जय जय जय अंग्रेजी रानी! - डॉ. रामप्रसाद मिश्र

जय जय जय अंग्रेजी रानी!
‘इंडिया दैट इज भारत' की भाषाएं भरतीं पानी ।
सेवारत हैं पिल्ले, मेनन, अयंगार, मिगलानी
तमिलनाडु से नागालैंड तक ने सेवा की ठानी।
तेरे भक्तों को हिंदी में मिलती नहीं रवानी
शब्दों की भिक्षा ले ले उर्दू ने कीर्ति बखानी।
एंग्लो-इंडियन भाई कहते, तू भारत की वाणी
अड़गम- बड़गम-कड़गम कहते, तू महान् कल्याणी।
अंकल,आंटी, मम्मी, डैडी तक है व्यापक कहानी
पब्लिक स्कूलों से संसद तक तूने महिमा तानी।
अंग्रेजी में गाली देने तक में ठसक बढ़ानी
फिर भाषण में क्यों न लगे सब भक्तों को सिम्फानी ।
मैनर से बैनर, पिओन से लीडर तक लासानी
सभी दंडवत करते तुझको, तू समृद्धि-सुख-दानी।
जय जय जय अंग्रेजी रानी!
जय जय जय अंग्रेजी रानी!!

 
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

 
रंज इस का नहीं कि हम टूटे | ग़ज़ल - सूर्यभानु गुप्त

रंज इस का नहीं कि हम टूटे
ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे

 
भारत प्यारा - आशीष यादव

इस मिट्टी से उस मिट्टी तक जीवन सफर हमारा हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।
इसकी नदियां इसके झरने,
इसके मौसम के क्या कहने!
उत्तर में खड़ा हिमालय है,
दक्षिण में सागर की लहरें।
मेरी नजरों को बस जीवन भर यही नजारा हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।
फूलों का यह गुलशन है,
रंग बिरंगे फूल खिले हैं।
हवा बिखेरे खुशबू इसकी,
महकती हुई धूल उड़े है।
इसके गुलशन में बस हरदम यूं ही बहार हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।

 
वो पहले वाली बात कहाँ? - मोहम्मद आरिफ

वो पहले वाली बात कहाँ?
जब पंछी झूम के गाते थे
फूल भरे उस अंचल में
मदमस्त भौंरे इतराते थे।

 
आओ ! आओ ! भारतवासी । गीत  - बाबू जगन्नाथ

आओ ! आओ ! भारतवासी। 
क्या बंगाली ! क्या मदरासी ! ॥

 
कुछ तो सोचा ही होगा - बालकवि बैरागी

कुछ तो सोचा ही होगा संसार बनाने वाले ने
वरना सोचो ये दुनिया जीने के लायक क्यों होती?
तुम रोज सवेरे उठते हो और रोज रात को सोते हो
जब भी कोई मिलता है, अपना ही रोना रोते हो,
ये रोना-धोना बंद करो, कुछ हँसना-गाना शुरू करो
बेशक मरने को आए हो, पर बिना जिये तो नहीं मरो।

 
हिंदी पर कवितांएं - भारत-दर्शन संकलन

इस पृष्ठ पर विभिन्न हिंसी कवियों की हिंदी पर लिखी कविताएं संकलित की गई हैं जिनमें डा० लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, श्रीनिवास, डॉ० इंद्रराज बैद 'अधीर',  श्रीमती रेवती, सुनीता बहल, बाबू जगन्नाथ, रघुवीर शरण, राकेश पाण्डेय, राजेश चेतन, जयप्रकाश शर्मा और रोहित कुमार हैप्पी की रचनायें सम्मिलित हैं।

 
न हारा है इश्क़-- - ख़ुमार बाराबंकवी

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है

 
बूढ़ा चेहरा  - कोमल मैंदीरत्ता

सालों से देखा
झुर्रियों के ताने-बाने में,
अनंत अनुभवों को समेटे,
बूढ़ों का वह धीर-गंभीर चेहरा।
जब छोटी थी मैं, तब भी
वैसा ही था,
और आज भी,
वैसा ही है।

 
दोस्ती - राकेश एल रॉबर्ट

दोस्ती इम्तिहान होती है
जो पास कर जाए,
वो दोस्ती महान होती है।
फरिश्तों से बढ़ कर होते है दोस्त,
जिनकी दोस्ती दोस्ती नहीं,
जान होती है।
मिट कर मिटा देती है, हस्ती दुश्मन की
दोस्ती तो, न रुकने वाला बाण होती है।

 
गोरख पांडे की दो कविताएं  - गोरख पांडे

तंत्र

 
आशा का गीत - गोरख पांडे

आएँगे, अच्छे दिन आएँगे
गर्दिश के दिन ये कट जाएँगे
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा
बच्चे सब दूध में नहाएँगे

 
मोह  - शैलेन्द्र कुमार शर्मा

पेड़ अगर जो मोह लगाते
फल डालियों पर सड़ जाते,
नदियां तेरा-मेरा जो करती
कभी नहीं सागर तक तरती।

 
कच्चे-पक्के मकान - सोमनाथ गुप्ता 'दीवाना रायकोटी'

कच्चे मकान थे सच्चे इंसान थे
दिलों में मोहब्बत, एक दूसरे की जान थे 
मिलजुल कर करते काम, ना कोई एहसान थी
बोलों के पक्के, इज़्ज़त में आगे 
बच्चों के लिए माँ-बाप ही उनकी पहचान थे
देसी खाना, देसी पहनना और मीठे पकवान थे
इज़्ज़त के रखवाले, हट्टे-कट्टे नौजवान थे
हर जरूरत हो जाती थी पूरी, चाहे कुछ कम सामान थे
फ़रेब लिपट गया है सीने से अब
खो गए परिवारों के नाम कहीं
होती नहीं जरूरतें पूरी
घर में भरा पड़ा ढेरों सामान है
माँ-बाप बैठे हैं दुबके घर के कोने में
बदल गया कितना इंसान है
हर किसी का हर किसी पर इक एहसान है
अब ना किसी की कोई पहचान है
बन गए 'दीवाना' पक्के अब मकान है।

 
दो छोटी कविताएँ - दिनेश भारद्वाज

दुनिया 

 
दीवाली के दीप जले - ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले

 
दो क्षणिकाएं  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

कवि 

 

 

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