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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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शहीर जलाली की दो ग़ज़लें  - शहीर जलाली

तन बेचते हैं, कभी मन बेचते हैं
दुल्हन बेचते हैं कभी बहन बेचते हैं

 
कैसा विकास - प्रभाकर माचवे

यह कैसा विकास
चारों और उगी है केवल
गाजर घास
गाजर घास।

 
कभी घर में नहीं... - बसंत कुमार शर्मा

कभी घर में नहीं मिलता, कभी बाहर नहीं मिलता
यहाँ पर अब बुजुर्गों को, कहीं आदर नहीं मिलता

तरक्की हो गयी थोड़ी, सभी कुछ भूल जाता है
हुआ है मतलबी बेटा, कभी हँसकर नहीं मिलता

कभी भी आँख का पानी, न मरने दीजियेगा बस
नदी जब सूख जाती है, उसे सागर नहीं मिलता

थके हैं अनवरत चलकर, जहाँ आराम कर लें कुछ
न जाने क्यों उन्हें वो मील का पत्थर नहीं मिलता

भुलाकर सब गिले-शिकवे, कोई त्यौहार मन जाए
जिसे वो कह सकें अपना, उन्हें वो घर नहीं मिलता

न दिन में नींद आती है, न मिलता चैन रातों को
कभी खटिया नहीं मिलती, कभी बिस्तर नहीं मिलता

न दौलत की कमी कोई,ई न शोहरत की कोई इच्छा
घड़ी भर पास जो बैठे, कोई सहचर नहीं मिलता

 
जीवन और संसार पर दोहे  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आँखों से बहने लगी, गंगा-जमुना साथ ।
माँ ने पूछा हाल जो, सर पर रख कर हाथ ।।

 
बग़ैर बात कोई | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

बग़ैर बात कोई किसका दुख बँटाता है
वो जानता है मुझे इसलिए रुलाता है

 
घर-सा पाओ चैन कहीं तो |ग़ज़ल  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

घर-सा पाओ चैन कहीं तो हमको भी बतलाना तुम
हमसा कोई और दिखे तो जरा हमें दिखलाना तुम

 
हिंदी की दुर्दशा | हिंदी की दुर्दशा | कुंडलियाँ  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य।
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य।।
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा।।
कहँ ‘ काका ' , जो ऐश कर रहे रजधानी में।
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में।।

 
वो कभी दर्द का... - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

वो कभी दर्द का चर्चा नहीं होने देता
अपने जख्मों का वो जलसा नहीं होने देता

 
मनोदशा - कैलाश कल्पित

वे बुनते हैं सन्नाटे को
मुझको बुनता है सन्नाटा
जीवन का व्यापार अजब है
सुख मिलता है, पाकर घाटा।

 
कबीर के कालजयी दोहे  - कबीरदास | Kabirdas

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय
जो सुख में सुमिरन करें, दुख काहे को होय

 
कबीर के पद  - कबीरदास | Kabirdas

हम तौ एक एक करि जांनां।
दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां ।।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समांनां।
एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा सांनां।।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।
माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबांनां।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवांनां।।

 
दादू दयाल की वाणी  - संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal

इसक अलाह की जाति है, इसक अलाह का अंग।
इसक अलाह औजूद है, इसक अलाह का रंग।।

 
हम आज भी तुम्हारे... - भारत भूषण

हम आज भी तुम्हारे तुम आज भी पराये,
सौ बार आँख रोई सौ बार याद आये ।
इतना ही याद है अब वह प्यार का ज़माना,
कुछ आँख छलछलाई कुछ ओंठ मुसकराये ।
मुसकान लुट गई है तुम सामने न आना,
डर है कि ज़िन्दगी से ये दर्द लुट न जाए ।

 
जबसे लिबासे-शब्द मिले - दीपशिखा सागर

जबसे लिबासे-शब्द मिले दर्द को मेरे
ग़ज़लें हुईं गमों का हैं त्यौहार क्या करूँ

 
बिरवा तुलसी जी का है - बृज राज किशोर 'राहगीर'

चारों ओर भले ही फैला, उजियारा बिजली का है।
ठाकुरजी के सम्मुख अब भी, दीपक देसी घी का है।

 
राजी खुशी लिख दो ज़रा -  भारत जैन

राजी खुशी लिख दो ज़रा कि ख़त इंतज़ार करे
बीते चैत्र अषाढ कि अब फागुन इंतज़ार करे

 
कभी मिलना - सलिल सरोज

कभी मिलना
उन गलियों में
जहाँ छुप्पन-छुपाई में
हमनें रात जगाई थी
जहाँ गुड्डे-गुड़ियों की शादी में
दोस्तों की बारात बुलाई थी
जहाँ स्कूल खत्म होते ही
अपनी हँसी-ठिठोली की
अनगिनत महफिलें सजाई थी
जहाँ पिकनिक मनाने के लिए
अपने ही घर से न जाने
कितनी ही चीज़ें चुराई थी
जहाँ हर खुशी हर ग़म में
दोस्तों से गले मिलने के लिए
धर्म और जात की दीवारें गिराई थी
कई दफे यूँ ही उदास हुए तो
दोस्तों ने वक़्त बे-वक़्त
जुगनू पकड़ के जश्न मनाई थी
जब गया कोई दोस्त
वो गली छोड़ के तो याद में
आँखों को महीनों रुलाई थी
गली अब भी वही है
पर वो वक़्त नहीं, वो दोस्त नहीं
हरे घास थे जहाँ
वहाँ बस काई उग आई है।

 
विवर्त -  गोलोक बिहारी राय

मुझे सोने से पहले, फिर एक बार उठ खड़ा होना है।
न हूँगा झंझावात, न उठ खड़ा हूँगा तूफ़ान बन के।
परिस्थितियों के विवर्त में, बन पड़ूँगा रूद्र सा।
मुझे सोने से पहले, फिर एक बार उठ खड़ा होना है ।।१।।

 
अधूरापन और माखौल - अमलेन्दु अस्थाना

हम पहले से ही कम थे,
तुमने हमें और अधूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी,
तुम्हारे शब्दवाण से यह अहसास और गहरा और गहरा हो गया,
हम हकलाते थे, एक आंख, एक पैर, चपटी नाक वाले थे,
हम काले थे, छोटे थे, मोटे थे,
हमारी बुनावट की कई अधूरी रेखाएं तुम्हारे ठहाकों के बीच सिमट गईं,
डबडबाई आंखें बंद कमरे में घंटों निहारती रहीं शीशा,
और तुम दिन-प्रतिदिन उड़ाते रहे हमारा माखौल,
अपने रंग-रूप, कद-काठी और बेडौल से चेहरे पर
लबालब प्यार लिए हम कई बार बढ़े तुम्हारी ओर
और हर बार तुम्हारे शब्दों ने लौटा दिया हमें,
सच कहूं, हमपर ठहाके लगाते हुए तुम्हे अंदाजा नहीं था,
तुम खुद कितना संक्षिप्त हो जाया करते थे,
हमने देखा, माखौल उड़ाते हुए संक्षिप्त और संक्षिप्त होते चले गए तुम
स्तब्ध हो गए जब तुमने देखा अपनी अधूरी रेखाओं से
तुम्हारे ठहाकों के बीच हमने खींच दी एक बड़ी परिधि,
रच दिया अपना आकाश, टांक दिया अपना सूरज,
जिसकी चकाचौंध में समा गए तुम,
तुम्हारी फूहड़ हंसी और तुम्हारे ठहाके।।

 
खेल - सूर्यजीत कुमार झा

आओ एक खेल खेलते हैं -
जोड़ना मैं रख लेता हूँ, तोड़ना तुम
याद करना मैं रख लेता हूँ, और भुलाना तुम
पुरानीं यादें मैं रख लेता हूँ, और नए अवसर तुम।

 
वो गरीब आदमी - हिमांशु श्रीवास्तव

सड़क पर पड़ा हुआ है वो गरीब आदमी
सिस्टम सा सड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

 
एक सुबह  - मंजू रानी

आसमान में छितराये वो बादल
पेड़ो के झुरमुट से आती वो आवाजें
चीं-चीं ,काँ-काँ ,टयूँ-टयूँ, पिहू-पिहू
इन सब को शांति से सुनती वो लतायें
हवा के झोखे से हिलती वो पत्तियाँ
सोते इंसानों को जगाती वो बोलियाँ
इस मधुर-संगीत को कैद करते वो संगीतकार
नाकामयाब से ढूंढ रहे अपने साज
पर पकड़ न पाये वो ताल।

 
नित्य करो तुम योग - शिवशंकर पटेल

उपभोग नहीं, उपयोग करो, नित्य करो तुम योग।
तन स्वस्थ, मन स्वच्छ, नहीं होगा कोई रोग ।।

 
कुछ हाइकु - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

1)
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।

 

 

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