जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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साहित्य - प्रताप नारायण मिश्र

जहाँ न हित-उपदेश कुछ, सो कैसा साहित्य?
हो प्रकाश से रहित तो, कौन कहे आदित्य?

 
प्रेम के कई चेहरे - सुषम बेदी

वाटिका की तापसी सीता का
नकटी शूर्पणखा का
चिर बिरहन गोपिका का
जुए में हारी द्रौपदी का
यम को ललकारती
सावित्री का।

 
दोहे और सोरठे  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

है इत लाल कपोल ब्रत कठिन प्रेम की चाल।
मुख सों आह न भाखिहैं निज सुख करो हलाल॥

 
हिन्दी-हत्या - अरुण जैमिनी

सरकारी कार्यालय में
नौकरी मांगने पहुँचा
तो अधिकारी ने पूछा-
"क्या किया है?"

 
चंद्रशेखर आज़ाद | गीत  - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

शत्रुओं के प्राण उन्हें देख सूख जाते थे 
ज़िस्म जाते काँप, मुँह पीले पड़ जाते थे
                   देश था गुलाम पर 'आज़ाद' वे कहाते थे।

 
आ जा सुर में सुर मिला - विजय कुमार सिंह | ऑस्ट्रेलिया

आ जा सुर में सुर मिला ले, यह मेरा ही गीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।
सुर में सुर मिल जाए इतना, सुर अकेला न रहे,
मैं भी मेरा न रहूँ और, तू भी तेरा न रहे,
धड़कनों के साथ सजता, राग का संगीत है,
एक मन एक प्राण बन जा, तू मेरा मनमीत है।

 
सुनीता शर्मा के हाइकु - डॉ सुनीता शर्मा | न्यूज़ीलैंड

भाव ही भाव
आजकल आ-भा-व
है कहीं कहां

 
संगीत पार्टी - सुषम बेदी

तबले पर कहरवा बज रहा था। सुनीता एक चुस्त-सा फिल्मी गीत गा रही थी। आवाज़ मधुर थी पर मँजाव नहीं था। सो बीच-बीच में कभी ताल की गलती हो जाती तो कभी सुर ठीक न लगता।

 
आदिम स्वप्न - रीता कौशल | ऑस्ट्रेलिया

तुम मन में, तुम धड़कन में
जीवन के इक इक पल में
मोहपाश में बँधे तुम्हारे
हमें थाम कर बनो हमारे।

 
सफाई  - डॉ पुष्पा भारद्वाज-वुड | न्यूज़ीलैंड

पूछा हमसे किसी ने
तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?
हमने भी इस प्रश्न पर कुछ गहराई से विचार किया।
नतीजा यही निकला कि
जब सफाई देने की ही नौबत आ गई
तो
फिर कहने या ना कहने से भी क्या फर्क पड़ता है?

 
अर्थहीन - रीता कौशल | ऑस्ट्रेलिया

कटु वचनों से आहत कर
पींग प्रेम की अर्थहीन है।
प्रेम समर्पण का नाम दूजा है
हक समझ पाना अर्थहीन है।

 
यहीं धरा रह जाए सब | भजन - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

प्राण पंछी उड़ जाए जब, यहीं धरा रह जाए सब
यही सिकंदर मिला धूल में
और बुद्ध को निर्वाण मिला।
प्राण पंछी उड़ जाए जब, यहीं धरा रह जाए सब।।

 
कोरोना हाइकु  - सत्या शर्मा 'कीर्ति'

कोरोना मार
अन्तर्भेदी चीत्कार
सभी लाचार

 
सुखी आदमी  - केदारनाथ सिंह | Kedarnath Singh

आज वह रोया
यह सोचते हुए कि रोना
कितना हास्यास्पद है
वह रोया

 
आदमी से अच्छा हूँ ....! - हलीम 'आईना'

भेड़िए के चंगुल में फंसे
मेमने  ने कहा--
'मुझ मासूम को खाने वाले
हिम्मत है तो
आदमी को खा!'

 
सोऽहम् | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

करके हम भी बी० ए० पास
           हैं अब जिलाधीश के दास ।
पाते हैं दो बार पचास
           बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥

 
सुनीति | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

निज गौरव को जान आत्मआदर का करना
निजता की की पहिचान, आत्मसंयम पर चलना
ये ही तीनो उच्च शक्ति, वैभव दिलवाते,
जीवन किन्तु न डाल शक्ति वैभव के खाते ।
(आ जाते ये सदा आप ही बिना बुलाए ।)
चतुराई की परख यहाँ-परिणाम न गिनकर,
जीवन को नि:शक चलाना सत्य धर्म पर,
जो जीवन का मन्त्र उसी हर निर्भय चलना,
उचित उचित है यही मान कर समुचित ही करना,
यो ही परमानंद भले लोगों ने पाए ।।

 
सफ़र में धूप तो होगी | ग़ज़ल - निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

 
बेधड़क दोहावली  - बेधड़क

गुस्सा ऐसा कीजिए, जिससे होय कमाल ।
जामुन का मुखड़ा तुरत बने टमाटर लाल।।

 
चलना हमारा काम है - शिवमंगल सिंह सुमन

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर-दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।

 
भारत की जय | कविता - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri

हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, क्रिस्ती, मुसलमान
पारसीक, यहूदी और ब्राह्मन
भारत के सब पुत्र, परस्पर रहो मित्र
रखो चित्ते गणना सामान
मिलो सब भारत संतान
एक तन एक प्राण
गाओ भारत का यशोगान

 
जाम होठों से फिसलते - शांती स्वरुप मिश्र

जाम होठों से फिसलते, देर नहीं लगती
किसी का वक़्त बिगड़ते, देर नहीं लगती

 
अहम की ओढ़ कर चादर - अमिताभ त्रिपाठी 'अमित'

अहम की ओढ़ कर चादर
फिरा करते हैं हम अक्सर

 
मेरे बच्चे तुझे भेजा था  - अलका जैन

मेरे बच्चे तुझे भेजा था पढ़ने के लिए,
वैसे ये ज़िन्दगी काफी नहीं लड़ने के लिए।
तेरे नारों में बहुत जोश, बहुत ताकत है,
पर समझ की, क्या ज़रुरत नहीं, बढ़ने के लिए?

 
खूनी पर्चा - वंशीधर शुक्ल

अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा,
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न किंचित पाऊंगा।
तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे,
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे,
खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे,
दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे,
अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा,
जब तक तुझको...।

 
उठ जाग मुसाफिर भोर भई - वंशीधर शुक्ल

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

 
प्रक्रिया - श्रीकांत वर्मा

मैं क्या कर रहा था
जब
सब जयकार कर रहे थे?
मैं भी जयकार कर रहा था -
डर रहा था
जिस तरह
सब डर रहे थे। 
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘अजीज मेरा दुश्मन है?'
मैं भी कह रहा था,
‘अजीज मेरा दुश्मन है।'
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘मुँह मत खोलो?'
मैं भी कह रहा था,
‘मुँह मत खोलो
बोला
जैसा सब बोलते हैं।'
खत्म हो चुकी है जयकार,
अजीज मारा जा चुका है,
मुँह बंद हो चुके हैं। 
हैरत में सब पूछ रहे हैं,
यह कैसे हुआ?
जिस तरह सब पूछ रहे हैं
उसी तरह मैं भी
यह कैसे हुआ?

 
प्रदूषण का नाम प्लास्टिक - कुमार जितेन्द्र "जीत"

धरा पर ढेर लग रहे हैं, प्लास्टिक से
कृत्रिम पहाड़ बन रहे हैं , प्लास्टिक से

 
कोमल मैंदीरत्ता की दो कवितायें  - कोमल मैंदीरत्ता

मेरी अपनी किताबों की दुनिया

 
काम बनता हुआ भी बिगड़े सब | ग़ज़ल - अंकुर शुक्ल 'अनंत'

काम बनता हुआ भी बिगड़े सब
अक़्ल पर पड़ गए हों पत्थर जब

 
ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना | ग़ज़ल - जावेद अख्तर

ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना
न सर पत्थर से टकराए तो कहना

 
ख़ुदा पर है यक़ीं जिसको | ग़ज़ल - निज़ाम फतेहपुरी

ख़ुदा पर है यक़ीं जिसको कभी दुख मे नहीं रोता
वही बढ़ता है आगे जो जवानी भर नहीं सोता

 
गठरी में ज़रूरत का ही सामान रखियेगा | ग़ज़ल  - ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"

गठरी में ज़रूरत का ही सामान रखियेगा,
तुम सफ़र ज़िन्दगी का आसान रखियेगा।

 
बात सच्ची कहो | ग़ज़ल - निज़ाम फतेहपुरी

बात सच्ची कहो पर अधूरी नहीं
लोग माने न माने ज़रूरी नहीं