नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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यारो उम्र गुज़ार दी | ग़ज़ल - शांती स्वरूप मिश्र

यारो उम्र गुज़ार दी, अब समझने को बचा क्या है
सब कुछ तो कह चुके, अब कहने को बचा क्या है

 
कभी गिरमिट की आई गुलामी - जोगिन्द्र सिंह कंवल

उस समय फीज़ी में तख्तापलट का समय था। फीज़ी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार जोगिन्द्र सिंह कंवल फीज़ी की राजनैतिक दशा और फीज़ी के भविष्य को लेकर चिंतित थे, तभी तो उनकी कलम बोल उठी:

 
अवसर नहीं मिला - कमला प्रसाद मिश्र | Kamla Prasad Mishra

जो कुछ लिखना चाहा था
वह लिख न कभी मैं पाया
जो कुछ गाना चाहा था
वह गीत न मैं गा पाया। 

मुझको न मिला अवसर ही
अपने पथ पर चलने का
था दीप पड़ा झोली में
अवसर न मिला जलने का।

जो दीप न जल पाता है
वह क्या प्रकाश फैलाये
जिसको न मिला अवसर ही
वह गीत भला क्या गाये।

 
रामनरेश त्रिपाठी के नीति के दोहे  - रामनरेश त्रिपाठी

विद्या, साहस, धैर्य, बल, पटुता और चरित्र।
बुद्धिमान के ये छवौ, है स्वाभाविक मित्र ।।

 
रंगीन पतंगें - अब्बास रज़ा अल्वी

अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

 
अन्वेषण - रामनरेश त्रिपाठी

मैं ढूंढता तुझे था, जब कुंज और वन में।
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में॥

 
भारतीय | फीज़ी पर कविता - जोगिन्द्र सिंह कंवल

लम्बे सफर में हम भारतीयों को
कभी पत्थर कभी मिले बबूल

 
कुछ अनुभूतियाँ - डॉ पुष्पा भारद्वाज-वुड

दूर दूर तक फैला मिला आकाश
चारों ओर ऊँची पहाड़ियाँ
शांत नीरव वातावरण
दूर-दूर तक कोई कोलाहल न था।
शांति केवल शांति।

 
जीवन का अधिकार - सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant

जो है समर्थ, जो शक्तिमान,
जीवन का है अधिकार उसे।
उसकी लाठी का बैल विश्‍व,
पूजता सभ्‍य-संसार उसे!

 
जो समर में हो गए अमर - नरेंद्र शर्मा

जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रद्धा-गीत धन्यवाद में
जो समर में हो गए अमर ...

 
पहाड़े - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आपके और मेरे
पहाड़े भिन्न हैं।
आपके लिए--
दो दूनी
चार।

 
डॉ रामनिवास मानव की क्षणिकाएँ  - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav

सीमा पार से निरन्तर
घुसपैठ जारी है।
'वसुधैव कुटुम्बकम'
नीति यही तो हमारी है।

 
गुरुदक्षिणा  - जैनन प्रसाद

सायक बिकते हैं
धनुः विद्या भी बिकती है
पर बिकते नहीं हैं तो केवल
द्रोणचार्य जैसे गुरु।
लेकिन
सौभाग्य से अगर
मिल भी गए
और कृपालु हों वे
अर्जुन ही समझ लें तुम्हें
तो किंकर्तव्यविमूढ़ की भांति
तुम लक्ष्य अनुसंधान कर पाओगे?
भेद पाओगे! क्या?
वह आँख?
अगर इस दुष्कर कार्य में
सफलता मिल भी गई
तो मांग बैठेगा तुमसे !
गुरुदक्षिणा !
जो तुम दे नहीं पाओगे
क्योंकि तुम
एकलव्य नहीं हो।

 
सहेजे हैं शब्द  - प्रीता व्यास

शौकिया जैसे सहेजते हैं लोग
रंगीन, सुंदर, मृत तितलियाँ
सहेजे हैं वैसे ही मैंने
भाव भीगे, प्रेम पगे शब्द।

शब्द, जो कभी
चंपा के फूल की तरह
तुम्हारे होंठों से झरे थे।
शब्द, जो कभी
गुलाब की महक से
तुम्हारे पत्रों में बसे थे।

शब्द
जो बगीचे में उडती तितलियों से
थे कभी प्राणवंत
सहेज रखे हैं मैंने
वे सारे शब्द।

क्या हुआ जो मर गया प्यार
क्या हुआ जो मर गया रिश्ता
क्या हुआ जो असंभव है पुनर्जीवन इनका

मैंने सहेज रखे हैं शब्द
पूरी भव्यता के साथ
जैसे सहेजते हैं
मिस्र के लोग 'ममी'।

 
देश की मिट्टी - रेखा राजवंशी

बेटी ने
देश की मिट्टी उठाई
एक बोतल में रख
सील लगाई
सूटकेस में रख
साथ अपने लाई
जमी रहें जड़ें
अपनी जगह
विदेश में रहें
देश की तरह
मिट्टी की खुशबू
भर दे खुशहाली
देश से जाएँ
तो क्यों जाएँ ख़ाली
शायद यह बात
उसके मन में आई
देश की मिट्टी
वो साथ अपने लाई।

 
चलो चलें उस पार - अमरजीत कौर कंवल

चलों चलें उस पार
झर झर करते झरने हों जहाँ
बहती हो नदिया की धारा
जीवन के चंद पल हों अपने
कर लें हम प्रकृति से प्यार

 
नया सबेरा - बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष

नए साल का, नया सबेरा,
जब, अम्बर से धरती पर उतरे,
तब, शान्ति, प्रेम की पंखुरियाँ,
धरती के कण-कण पर बिखरें।

 
उत्प्रवासी - मोहन राणा

महाद्वीप एक से दूसरे तक ले जाते अपनी भाषा
दुनिया और किसी अज्ञात के बीच एक घर साथ
ले जाते आम और पीपल का गीत
ले जाते कोई ग्रीष्म कोई दोपहर
ले जाते सूटकेस में गठरी एक साथ,
बाँध लेते अजवाइन का पराँठा भी सफर के लिए
लेते जाते अपने पुरचनियों का एक सपना जीते
लंबी रात जिसकी और दिन उनींदा

 
दर्द के पैबंद | ग़ज़ल - रेखा राजवंशी

मखमली चादर के नीचे दर्द के पैबंद हैं
आपसी रिश्तों के पीछे भी कई अनुबंध हैं।

 
गिनती  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आपको नहीं लगता कि
गिनती अधूरी है?
'गिनती' में शून्य तो आप
गिनते ही नहीं। 
वैसे 'शून्य' के बिना
'गिनती' गिनती नहीं।

 
हिंदी - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हिंदी उनकी राजनीति है 
हिंदी इनका हथियार है
हिंदी कईयों का औज़ार है। 
हिंदी उनके लिए भाषण है
हिंदी इनके लिए जलसा है 
हिंदी कईयों का नारा है। 
जरा गिनो तो 
अनगनित
हिंदीवालों में से
कितनों को हिंदी से प्यार है?
जरा बताओ तो 
यह कैसा अनुराग है?

 
यथार्थ - रीता कौशल

आँखें बरबस भर आती हैं,
जब मन भूत के गलियारों में विचरता है।
सोच उलझ जाती है रिश्तों के ताने-बाने में,
एक नासूर सा इस दिल में उतरता है।

 
फीजी कितना प्यारा है - सुभाशनी लता कुमार

प्रशांत महासागर से घिरा
चमचमाती सफ़ेद रेतों से भरा
फीजी द्वीप हमारा
देखो, कितना प्यारा है!
सर्वत्र छाई हरयाली ही हरयाली
फल-फूलों से भरी डाली-डाली
फसलों से लहराते गन्ने के खेतों में
गुणगुनाती मैना प्यारी है
लोग यहाँ के कितने प्यारे
कभी ‘बुला', कभी ‘राम-राम'
कह स्वागत करते
हिल-मिलकर एक दूजे का
साथ निभाते
हँसते-खेलते समय बिताते
बहुभाषीय और बहुसांस्कृति का
नारा लगाते
सच में यह!
स्वर्ग बड़ा निराला है
जन्म हुआ इस भूमि पर
अन्न यही का खाएं हम
खेले इसकी गोद में हम
अब वतन यही हमारा है
फीजी द्वीप हमारा
देखो, कितना प्यारा है।

 
फ़क़ीराना ठाठ | गीत - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आ तुझको दिखाऊँ मैं अपने ठाठ फ़क़ीराना
फाकों से पेट भरना और फिर भी मुसकुराना। 
आ तुझको दिखाऊँ मैं--------

 
समंदर की उम्र - अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar

लहर ने
समंदर से
उसकी उम्र पूछी,
समंदर मुस्करा दिया।

 
अपने अलावा भी | कविता - मोहन राणा

ना लिखे भी ना सोचे भी
ना चीख पुकार के भी
नानाविध उपकरण और विधियाँ भी बेकार
उपाय यही इस मन से मोक्ष का

 
अकबर और तुलसीदास - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

अकबर और तुलसीदास,
दोनों ही प्रकट हुए एक समय,
एक देश,  कहता है इतिहास;

 
अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत  - गोपालदास ‘नीरज’

अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

 
वो था सुभाष, वो था सुभाष - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वो भी तो ख़ुश रह सकता था
महलों और चौबारों में।
उसको लेकिन क्या लेना था,
तख्तों-ताज-मीनारों से!
         वो था सुभाष, वो था सुभाष!

 
हाँ, तुम जुगनू को | ग़ज़ल  - रोहित कुमार हैप्पी

हाँ, तुम जुगनू को सूरज भी बता सकते हो
इस तरह कैसे उसका नाम मिटा सकते हो

 
अकारण  - राजीव वाधवा

गगन में टूटता तारा
कि जैसे हो कोई बेघर
चमन में झूलती डाली
मचलता जैसे हो सरवर

ज़माना इक जहां तेरा
इरादे टूटते बनते
रहेगा इक निशां मेरा
तमन्ना इसकी सब करते

 
चाहता हूँ चुप रहे - विजय कुमार सिंह

चाहता हूँ, चुप रहे कुछ भी न बोले,
पर मेरा मन तब भी मुझसे बोलता है।
गीत सुख के अब अधिक गाता नहीं है,
उस तरह होकर भी मुस्काता नहीं है।

 
आया कुछ पल - सोम नाथ गुप्ता

आया कुछ पल बिता के चला गया
बादल छींटे बरसा के चला गया

 
कवि और कविता  - मौसम कुमरावत

ज़रूरी नहीं,
पुस्तक थामे
मंच पर इतराने वाला,
हो एक श्रेष्ठ कवि।

 
मनुष्य बनाये रखना - विजय कुमार सिंह

हम खड़े होंगे कभी भीड़ में कभी हम अकेले
कभी हम मरुथल में होंगे कभी फूलों से सजे मेले।

 
दिनेश भारद्वाज की दो रचनाएँ  - दिनेश भारद्वाज

एक विचार

 
काग़ज़ फाड़ दिए - दीपक शर्मा

सींचे थे खून पसीनों से,
लिख पढ़ के साल महीनों से
रद्दी के जो ज़द हुए
निरर्थक जिनके शब्द हुe
पुरानी उपाधियां, प्रमाणपत्र
आज झाड़ दिए मैंने
काग़ज़ फाड़ दिए मैंने।

 
बोलो फिर कैसे मुस्काएं - विजय कनौजिया

जब पलकें हों गीली-गीली
फिर मन को कुछ भी न भाए
कितनी भी कोशिश कर लें पर
बोलो फिर कैसे मुस्काएं।

 
मेरे देश की आवाज़  - ज्योति स्वामी "रोशनी"

आज दिल की अपने बात कहने दे
तू मुझे सफेद रहने दे

 
मेरा दिल मोम सा - सुनीता शर्मा

खिड़की दरवाजे लोहे के बना
बोल्ट कर लिए हैं मैंने
कोई कण धूल-सा आंखों में
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल न जाए कहींl
बिस्तर पर भी चप्पल
उतारने से कतराती हूँ मैं
कोई फूल कांटा बनकर
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल ना जाए कहींl
अंगुलियों में भी सुई लेकर
कपड़े सिलने से घबराती हूँ मैं
कोई याद जख्म बन
ना छिल जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल ना जाए कहींl

 
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
शब्दकोश में प्रिये, और भी
बहुत गालियाँ मिल जाएँगी
जो चाहे सो कहो, मगर तुम
मरी उमर की डोर गहो तुम !
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !

 
लिखना बाकी है - हरिहर झा | Harihar Jha

शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

 
माना, गले से सबको - प्राण शर्मा

माना गले से सबको लगाता है आदमी
दिल में किसी-किसी को बिठाता है आदमी

 
मिलती हैं आजकल  - गुलशन मदान की गज़ल

मिलती हैं आजकल उन्हें ऊँचाइयां मियां
जिनसे बहुत ही दूर हैं अच्छाइयां मियां

मुझको वहाँ के लागे सब रोते हुए मिले
बजती थी कल तलक जहां शहनाइयां मियां

तारीकियों में साथ चलने की किसे कहें
चलती नहीं हैं साथ जब परछाइयां मियां

रख दो किताबें बांध कर तुलसी कबीर की
पढ़ता है कौन आजकल चौपाइयां मियां

उनकी सलीबो-दार ही ईनआम में मिले
करते रहे जो उम्र भर अच्छाइयां मियां

सागर की सतह से ही जो आए हैं लौट कर
उनका है दावा देखी हैं गहराइयां मियां

अब दूर ले चलो कहीं दुनियां की भीड़ में
'गुलशन' की भाती है फ़कत तन्हाइयां मियां।

 
भिखारी| हास्य कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

एक भिखारी दुखियारा
भूखा, प्यासा
भीख मांगता
फिरता मारा-मारा!

 

 

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