
काव्य
जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।Article Under This Catagory
| जनतंत्र का जन्म - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar |
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सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, |
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छ्प्पै |
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| सत्य की महिमा - कबीर की वाणी - कबीरदास | Kabirdas |
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साँच बराबर तप नहीं, झूँठ बराबर पाप। |
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बच्चा बोला देख कर मस्जिद आली-शान । |
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| माँ | ग़ज़ल - निदा फ़ाज़ली |
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बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ |
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जब |
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| कुछ झूठ बोलना सीखो कविता! - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas |
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कविते! |
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| घर से निकले .... - निदा फ़ाज़ली |
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घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे |
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| जूठे पत्ते - बालकृष्ण शर्मा नवीन | Balkrishan Sharma Navin |
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क्या देखा है तुमने नर को, नर के आगे हाथ पसारे? |
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| मिट्टी की महिमा - शिवमंगल सिंह सुमन |
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निर्मम कुम्हार की थापी से |
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| सबको लड़ने ही पड़े : दोहे - ज़हीर कुरैशी |
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बहुत बुरों के बीच से, करना पड़ा चुनाव । |
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| अहमद फ़राज़ की दो ग़ज़लें - अहमद फ़राज़ |
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नज़र की धूप में साये घुले हैं शब की तरह |
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| कुछ लिखोगे - मिताली खोड़ियार |
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कुछ लिखोगे |
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| ठण्डी का बिगुल - सुशील कुमार वर्मा |
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शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के, |
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| अभी ज़मीर में... | ग़ज़ल - जावेद अख़्तर |
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अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है |
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| गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ - गिरिधर कविराय |
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गुन के गाहक सहस नर, बिनु गुन लहै न कोय |
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| आज के दोहे - रोहित कुमार 'हैप्पी' |
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हमने चुप्पी तान ली, नहीं करेंगे जंग । |
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| फैशन | हास्य कविता - कवि चोंच |
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कोट, बूट, पतलून बिना सब शान हमारी जाती है, |
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ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा |
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विदुर से नीति नहीं |
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अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई |
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भारतीय रेल की |
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राम बनने की प्रेरणा |
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| महंगाई - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi |
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जन-गण मन के देवता, अब तो आंखें खोल |
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वो भी तो ख़ुश रह सकता था |
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| मोल करेगा क्या तू मेरा? - भगवद्दत ‘शिशु' |
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मोल करेगा क्या तू मेरा? |
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धूल और धन में जब समता, |
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| दिन को भी इतना अंधेरा - ज़फ़र गोरखपुरी |
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दिन को भी इतना अंधेरा है मिरे कमरे में |
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चेहरा जो किसी शख्स का दिखता है सभी को |
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मेंहदी से तस्वीर खींच ली किसकी मधुर! हथेली पर । |
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| बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala' |
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सामने आईने के जाओगे? |
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| भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !! - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas |
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यदि दर्द पेट में होता हो |
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