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पंचतंत्र की कहानियाँ

पंचतंत्र की कहानियों की रचना का इतिहास भी बडा ही रोचक हैं। लगभग 2000 वर्षों पूर्व भारत वर्ष के दक्षिणी हिस्से में महिलारोप्य नामक नगर में राजा अमरशक्ति का शासन था। उसके तीन पुत्र बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनंतशक्ति थे। राजा अमरशक्ति जितने उदार प्रशासक और कुशल नीतिज्ञ थे, उनके पुत्र उतने ही मूर्ख और अहंकारी थे। राजा ने उन्हें व्यवहारिक शिक्षा देने व्यवहारिक शिक्षा देने की बहुत कोशिश की परंतु किसी भी प्रकार से बात नहीं बनी। हारकर एक दिन राजा ने अपने मंत्रियों से मंत्रणा की। राजा अमरशक्ति के मंत्रिमंडल में कई कुशल, दूरदर्शी और योग्य मंत्री थे, उन्हीं में से एक मंत्री सुमति ने राजा को परामर्श दिया कि पंडित विष्णु शर्मा सर्वशास्त्रों के ज्ञाता और एक कुशल ब्राह्मण हैं, यदि राजकुमारों को शिक्षा देने और व्यवहारिक रुप से प्रक्षित करने का उत्तरदायित्व पंडित पंडित विष्णु शर्मा को सौंपा जाए तो उचित होगा, वे अल्प समय में ही राजकुमारों को शिक्षित करने की सामर्थ रखते हैं।

राजा अमरशक्ति ने पंडित विष्णु शर्मा से अनुरोध किया और पारितोषिक के रूप में उन्हें सौ गांव देने का वचन दिया। पंडित विष्णु शर्मा ने पारितोषिक को तो अस्वीकार कर दिया, परंतु राजकुमारों को शिक्षित करने के कार्य को एक चुनौती के रुप में स्वीकार किया। इस स्वीकॄति के साथ ही उन्होंने घोषणा की कि मैं यह असंभव कार्य मात्र छः महिनों में पूर्ण करुंगा, यदि मैं ऐसा न कर सका तो महाराज मुझे मॄत्युदंड दे सकते हैं। पंडित विष्णु शर्मा की यह भीष्म प्रतीज्ञा सुनकर महाराज अमरशक्ति निश्चिंत होकर अपने शासन-कार्य में व्यस्त हो गए और पंडित विष्नु शर्मा तीनों राजकुमारों को अपने आश्रम में ले आए।

पंडित विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को विविध प्रकार की नीतिशास्त्र से संबंधित कथाएं सुनाई। उन्होंने इन कथाओं में पात्रों के रुप में पशु-पक्षियों का वर्णन किया और अपने विचारों को उनके मुख से व्यक्त किया। पशु-पक्षियों को ही आधार बनाकर उन्होंने राजकुमारों को उचित-अनुचित आदि का ज्ञान दिया व व्यवहारिक रुप से प्रशिक्षित करना आंरम्भ किया । राजकुमारों की शिक्षा समाप्त होने के बाद पंडित विष्णु शर्मा ने इन कहानियों को पंचतंत्र की प्रेरक कहानियां के संग्रह के रुप में संकलित किया।

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संगठन में शक्ति - भारत-दर्शन संकलन

किसी जंगल में एक वृक्ष पर घोंसला बनाकर एक चिड़ा व चिड़िया का जोड़ा रहता था। चिड़िया ने अंडे दिये तो वह उसे सेह रही थी। इसी बीच धूप से परेशान एक मदमस्त हाथी उस वृक्ष की छाव में आ गया। अपने चंचल स्वभाव के कारण उसने पास की शाखा को तोड़ डाला। शाखा टूटते ही चिड़ियाँ के सभी अंडे टूट गए। घोसले का नामोनिशान नहीं रहा। असहाय चिड़िया विलाप करने लगी। चिड़िया को इस तरह दु:खी देखकर उसके साथी कठफोड़वा ने समझाते हुए कहा-- बुद्धिमान लोग विपत्ति के समय रोते-बिलखते नहीं, बल्कि धैर्य से काम लेते हैं।

 
मूर्ख मित्र - भारत-दर्शन संकलन

किसी राजा के राज्य में एक बहुत बलवान बंदर था। वह बड़े-बड़े योद्धाओं को मत देता था। राजा ने उसकी ख्याति सुनी तो उसे अपना अंगरक्षक रख लिया। वह बंदर राजा के सेवक के रुप में महल मे रहने लगा। धीरे-धीरे वह राजा का विश्वास-पात्र बन गया। बंदर बहुत स्वामीभक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था ।

 

 

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