वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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शास्त्री जी की खरीदारी (कथा-कहानी) 
   
Author:भारत-दर्शन संकलन | Collections

एक बार पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री एक कपड़े की एक दुकान में साड़ियाँ खरीदने गए। दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख प्रसन्न हो गया। उसने उनके आने को अपना सौभाग्य मान, उनकी आव-भगत करनी चाही।

शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चार-पांच साड़ियाँ चाहिए। दुकान वाला शास्त्री जी को एक से बढ़ कर एक साड़ियाँ दिखाने लगा। सभी कीमती साड़ियाँ थीं।

शास्त्री जी बोले- "भाई, मुझे इतनी महंगी साड़ियाँ नहीं चाहिए। कम कीमत वाली दिखाओ।"

इस पर दुकानदार ने बोला- आप इन्हें अपना ही समझिए, दाम की तो कोई बात ही नहीं है। यह तो हमरा सौभाग्य है कि आप पधारे।

शास्त्री जी उसका आशय समझ गए। उन्होंने कहा- "मैं तो दाम देकर ही लूंगा। मैं जो कह रहा हूं उस पर ध्यान दो और मुझे कम कीमत की साड़ियाँ ही दिखाओ और उनकी कीमत बताते जाओ।

तब दुकानदार ने शास्त्री जी को थोड़ी सस्ती साड़ियाँ दिखानी शुरू कीं।

शास्त्री जी ने कहा-"ये भी मेरे लिए महंगी ही हैं। और कम कीमत की दिखाओ।"

दुकानदार को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए। उन्होंने कहा- "दुकान में जो सबसे सस्ती साड़ियाँ हों, वो दिखाओ। मुझे वही चाहिए।"

अंतत: दुकानदार ने उनकी मनचाही सस्ती साड़ियाँ निकालीं और शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदा कर चले गए।

उनके जाने के पश्चात देर तक दुकान के कर्मचारी और वहां उपस्थित कुछ ग्राहक शास्त्री जी की सादगी की चर्चा करते रहे। सबके मन में शास्त्री जी के प्रति अपार श्रद्धा थी।

[ भारत-दर्शन संकलन ]

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