हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

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मंदिर-दीप (काव्य) 
   
Author:सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।
जैसे चाहो, इसे जलाओ,
जैसे चाहो, इसे बुझायो,

इसमें क्या अधिकार हमारा?
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

जस करेगा, ज्योति करेगा,
जीवन-पथ का तिमिर हरेगा,

होगा पथ का एक सहारा!
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

बिना स्नेह यह जल न सकेगा,
अधिक दिवस यह चल न सकेगा,

भरे रहो इसमें मधुधारा,
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

- सोहनलाल द्विवेदी

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