वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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सृष्टि का खिलना (कथा-कहानी) 
   
Author:संजय भारद्वाज

प्रात: घूमने निकला। दो-चार दिन एक दिशा में जाने के बाद, नवीनता की दृष्टि से भिन्न दिशा में जाता हूँ। आज निकट के जॉगर्स पार्क के साथ की सड़क से निकला। पार्क में व्यायाम के नए उपकरण लगे हैं। अनेक स्त्री-पुरुष व्यायाम कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि व्यायाम करने वालों में स्त्रियों का प्रतिशत अच्छा था। देखा कि अधिकांश स्त्रियाँ, चाहे वे किसी भी आयु समूह की हों, व्यायाम से पहले या बाद में झूला अवश्य झूल रही थीं।

चिंतन का चक्र चला कि ऐसा क्या है जो स्त्रियों को झूला इतना प्रिय है? झूला भी ऐसा कि ऊँचा..और ऊँचा.., हवा में अपने अस्तित्व का आनंद अनुभव करना!...क्या हमने उनके पंख बाँध दिए हैं या कुछ-कुछ मामलों में काट ही दिए हैं?

सोचा, स्त्रियाँ उड़ती हैं हल्का महसूस करने के लिए, मानसिक विरेचन के लिए। यह कैथारसिस शायद उन्हें खुद के मुक्त होने का अनुभव कराता है। उन्हें सत्ता नहीं चाहिए, ‘स्व-ता' चाहिए। ‘स्व-ता' अर्थात अपने निर्णय खुद लेने, अपने ढंग से अपना आनंद उठाने की सत्ता।

प्रशंसा की भी एक सत्ता होती है जिसे पाने की चाहत स्त्री-पुरुष दोनों में भीतर तक पैठी होती है। पुरुष को अपने ऑफिस या वर्कप्लेस से, जहाँ वह आठ घंटे काम करता है, छोटा-सा एक ‘लेटर ऑफ एप्रिसिएशन' भी मिल जाए तो उसे फ्रेम कर घर में टाँगता है। अधिकांशत: अपने चौबीस घंटे घर को देने वाली स्त्री, इस प्रशंसा से बहुत हद तक वंचित है। उन्हें प्रशंसा चाहिए, केवल रूप की नहीं, उनकी कार्यशैली, वैचारिकता, सामंजस्य, समन्वय, धैर्य.., सबकी।

मुझे तो लगता है असंगठित क्षेत्र की श्रमिक है स्त्री, पूरी तौर पर अवलंबित। इस अवलंबन को स्वावलंबन में, मकान के पिलर में बदलने के लिए अपने घर को झूले में बदलिए। उड़ने दीजिए उन्हें निर्बाध। कामकाजी हैं या होममेकर, दोनों स्थिति में घर उनसे है, पति, बच्चे, समाज, धर्म, यहाँ तक कि ईश्वर भी उनके भरोसे ही जीवित है। सृष्टि हैं वे।

स्त्रियों को झूले की मनचाही पेंगें भरने दीजिए। नियमित न सही, यदा-कदा हौले से झुलाइये भी। उन्हें अच्छा लगेगा। उन्हें अच्छा लगेगा तो सृष्टि खिल उठेगी..और खिली हुई सृष्टि किसे अच्छी नहीं लगती!

- संजय भारद्वाज
  (प्रात: 7:51 बजे, 10 मई 2018 )

 

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