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प्रेमचंद : घर में (विविध)

Author: शिवरानी देवी प्रेमचन्द

प्रेमचन्द की पत्नी शिवरानी द्वारा लिखी, 'प्रेमचंद : घर में' पुस्तक में शिवरानी ने प्रेमचन्द के बचपन का उल्लेख किया है। यहाँ उसी अंश को प्रकाशित किया जा रहा है।

बचपन

प्रेमचन्द का जन्म बनारस से चार मील दूर लमही गांव में सावन बदी 10, संवत् 1937 (31 जुलाई, सन् 1880) शनिवार को हुआ था। पिता का नाम अजायबराय था, माता का नाम आनन्दी देवी। आप कायस्थ दूसरे श्रीवास्तव थे। आपके तीन बहने थीं। उनमें दो तो मर गईं, तीसरी बहुत दिनों तक जीवित रही। उस बहन से आप 8 वर्ष छोटे थे। तीन लड़कियों की पीठ पर होने से आप तेतर कहलाते थे। माता हमेशा की मरीज़ थीं। आपके दो नाम और थे-पिता का रखा हुआ नाम धनपतराय, चाचा का रखा हुआ नाम मुंशी नवाबराय। माता-पिता दोनों को संग्रहणी की बीमारी थी। पैदा होने के दो-तीन साल बाद आपको जिला बांदा जाना पड़ा।

आपकी पढ़ाई पांचवें वर्ष में शुरू हुई। पहले मौलवी साहब से उर्दू पढ़ते थे। उन मौलवी साहब के दरवाजे पर सब लड़कों के साथ पढ़ने जाते थे। आप पढ़ने में बहुत तेज थे। लड़कपन में आप बहुत दुर्बल थे। आपकी विनोदप्रियता का परिचय लड़कपन से ही मिलता है। एक बार की बात है-कई लड़के मिलकर नाई नाई का खेल खेल रहे थे। आपने एक लड़के की हजामत बनाते हुए बांस की कमानी से उसका कान ही काट लिया। उस लड़के की मां झल्लाई हुई आपकी मां से उलाहना देने आई। आपने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, खिड़की के पास दबक गये। मां ने दबकते हुए देख लिया था, पकड़कर चार झापड़ दिये।

मां-‘उस लड़के के कान तूने क्यों काटे?'

‘मैंने उसके कान नहीं काटे, बल्कि बाल बनाए हैं।'

‘उसके कान से तो खून बह रहा है और तू कह रहा है कि मैंने बाल बनाये हैं।'

‘सभी तो इस तरह खेल रहे थे।'

‘अब ऐसा न खेलना।'

‘अब कभी न खेलूंगा।'

एक और घटना है। चाचा ने सन बेचा और उसके रुपये लाकर उन्होंने ताक पर रख दिये। आपने अपने चचेरे भाई से सलाह की, जो उम्र में आपसे बड़े थे। दोनों ने मिलकर एक रुपया ले लिया। आप रुपया उठा तो लाये; मगर उसे खर्च करना नहीं आता था। चचेरे भाई ने उस रुपये को भुनाकर बारह आने मौलवी साहब की फीस दी। और बाकी चार आनों में से अमरूद, रेवड़ी वगैरह लेकर दोनों भाइयों ने खायी।

चाचा साहब ढूंढ़ते हुए वहां पहुंचे और बोले-‘तुम लोग रुपया चुरा लाये हो ?''

आपके चचेरे भाई ने कहा-‘हां एक रुपया भैया लाये हैं।'

चाचा साहब गरजे-‘वह रुपया कहां है ?'

‘मौलवी साहब को फीस दी है।'

चाचा साहब दोनों लड़कों को लेकर मौलवी साहब के पास पहुंचे और बोले-‘इन लड़कों ने आपको पैसे दिये हैं ?'

‘हां, बारह आने दिए हैं।

‘उन्हें मुझे दीजिए।'

चाचा साहब ने फिर उनसे पूछा-‘चार आने कहां हैं ?'

‘उसका अमरूद लिया।'

इस बात का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपने बचपन के बारे में खुद सुनाया था-चाचा अपने लड़के को पीटते हुए घर लाये। मेरी शक्ल अजीब हो गई थी। मैं डरता-डरता घर आया। मां एक लड़के को पिटता देखकर मुझे भी पीटने लगीं। चाची ने दौड़कर मुझे छुड़ाया। मुझे ही क्यों छुड़ाया, अपने बच्चे को क्यों नहीं छुड़ाया, मैं नहीं जान सका। शायद मेरी दुर्बलतावश उन्हें दया आ गई हो।

अंधेरा के पुल का चमरौधा जूता मैंने बहुत दिनों तक पहना है। जब तक मेरे पिताजी जीवित रहे तब तक उन्होंने मेरे लिए बारह आने से ज्यादा का जूता कभी नहीं खरीदा, और चार आने गज़ से ज्यादा का कपड़ा कभी नहीं खरीदा। मैं सम्मिलित परिवार में था, इसलिए मैं अपने को अलग नहीं समझता था। मैं अपने चचेरे भाइयों को मिलाकर पांच भाई था। जब मुझसे कोई पूछता तो मैं यही बतलाता कि हम पांच भाई हैं। मैं गुल्ली-डण्डा बहुत खेलता था।

जब मैं आठ साल का था, तभी मेरी मां बीमार पड़ीं। छः महीने तक वे बीमार रहीं। मैं उनके सिरहाने बैठा पंखा झलता था। मेरे चेचेरे, जो मुझसे बड़े थे, दवा के प्रबन्ध में रहते थे। मेरी बहन ससुराल में थी। उनका गौना हो गया था। मां के सिरहाने एक बोतल शक्कर से भरी रहती थी। मां के सो जाने पर मैं उसे खा लेता था। मां के मरने के आठ-दस रोज पहले मेरी बहन आई। घर से मेरी दादी भी आ गईं। जब मेरी मां मरने लगीं तो मेरा, मेरी बहन का तथा बड़े भाई का हाथ मेरे पिता के हाथ में देकर बोलीं-‘ये तीनों बच्चे तुम्हारे हैं।'

बहन, पिता तथा बड़े भाई सभी रो रहे थे। पर मैं कुछ भी न समझ रहा था। मां के मरने के कुछ दिन बाद बहन अपने घर चली गई। दादी, भैया और पिताजी रह गये। दो-तीन महीने बाद दादी भी बीमार होकर लमही चली आईं। मैं और भैया रह गए। भैया दूध में शक्कर डालकर मुझे खूब खिलाते थे; पर मां का वह प्यार कहां ! मैं एकांत में बैठकर खूब रोता था।

पांच-छः महीनों के बाद मेरे पिता भी बीमार पड़े। वे लमही आये। मैं भी आया। मेरा काम मौलवी साहब के यहां पढ़ना, गुल्ली-डण्डा खेलना, ईख तोड़कर चूसना और मटर की फली तोड़कर खाना-चलने लगा।

पिताजी जब बहन के यहां जाते तो अपने साथ मुझे अवश्य ले जाते। मैं अपनी दादी से कहानियां खूब सुनता। दादी और भैया में झगड़ा भी हो जाता। मैं दादी से अपनी तरफ मुंह करने को कहता, भैया अपनी तरफ। दादी मुझे अधिक मानती थीं।

फिर मेरे पिता की बदली जीमनपुर हुई। वहां पिताजी के साथ मैं, और दादी गये। भैया इंदौर गये।

कुछ दिनों बाद चाची आईं। यह शादी दादी को अच्छी नहीं लगी। चाची के साथ उनके भाई विजयबहादुर भी आये। चाची आते ही मालकिन बनीं। चाची विजयबहादुर को बहुत मानती थीं, मुझे कम। पिता जी डाकखाने से जो भी चीज खाने के लिए लाते, चाची की इच्छा रहती कि वे उन्हें खुद खायें। वे उनकी लाई हुई चीजों को पिता के सामने रखतीं तो पिताजी बोलते-मैं ये चीज़ें बच्चों के लिए लाता हूं। जब चाची न मानतीं तो पिता जी झल्लाकर बाहर चले जाते।

'किसी तरह एक साल बीता। बहन अपने घर गई। दादी भी घर आईं और मर गईं।'

'पिताजी ने जो मकान ले रखा था, उसका किराया डेढ़ रुपए था। निहायत गन्दा मकान था। उसी के दरवाज़े पर एक कोठरी थी, वही मुझे सोने के लिए मिली। मैं विनोद के लिए बगल में एक तमाखूवाले के मकान चला जाया करता। मेरी उम्र उस समय 12 साल की थी।'

साभार - प्रेमचन्द घर में [1944]
सरस्वती प्रेस, बनारस

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