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भगवान सबका एक है (कथा-कहानी)

Author: नीरा सक्सेना

पेरिस में इब्राहीम नाम का एक आदमी अपनी बीवी और बच्चों के साथ एक मोंपड़ी में रहता था। वह एक साधारण औकात का गृहस्थी था, पर था बड़ा धर्मात्मा और परोपकारी । उसका घर शहर से दस मील दूर था। उसकी झोपड़ी के पास से एक पतलीसी सड़क जाती थी। एक गाँव से दूसरे गाँव को यात्री इसी सड़क से होकर आते-जाते थे।

मार्ग में विश्राम करने की और कोई जगह न होने के कारण, यात्रियों को इब्राहीम का दरवाजा खटखटाना पड़ता था। इब्राहीम उनका उचित सत्कार करता। यात्री हाथ-मुँह धोकर जब इब्राहीम के परिवार के साथ खाने बैठते तो खाने से पहले इब्राहीम एक छोटी-सी प्रार्थना कहता और ईश्वर को उसकी कृपा के लिये धन्यवाद देता। बाद में अन्य सब व्यक्ति भी उस प्रार्थना को दुहराते।

यात्रियों का इस प्रकार सत्कार करने का क्रम कई साल तक चलता रहा । पर सदा सबके दिन एक से नहीं जाते। समय के फेर में पड़ कर इब्राहीम गरीब हो गया । तिस पर भी उसने यात्रियों को भोजन देना बन्द नहीं किया। वह और उसकी बीवी-बच्चे दिन में एक बार भोजन करते और एक बार का भोजन बचा कर यात्रियों के लिये रख छोड़ते थे। इस परोपकार से इब्राहीम को बड़ा संतोष होता, पर साथ ही साथ उसे कुछ गर्व हो गया और वह यह समझने लगा कि मैं बहुत बड़ा धर्मात्मा हूँ और मेरा धर्म ही सबसे ऊँचा है।

एक दोपहर को उसके दरवाजे पर एक थका-हारा बूढ़ा आया। वह बहुत ही कमजोर था। उसकी कमर कमान की तरह झुक गई थी और कमजोरी के कारण उसके कदम भी सीधे नही पड़ रहे थे। उसने इब्राहीम का दरवाजा खटखटाया। इब्राहीम उसे अन्दर ले गया और आग के पास जाकर बिठा दिया। कुछ देर विश्राम करके बूढ़ा बोला"बंटा, मैं बहुत दूर से आ रहा हूँ। मुझे बहुत भूख लग रही है।" इब्राहीम ने जल्दी से खाना तैयार करवाया और जब खाने का समय हुआ तो आपने नियम के अनुसार इब्राहीम ने दुआ की। उस दुआ को उसके बीवी-बच्चों ने उसके पीछे दुहराया । इब्राहीम ने देखा, वह बूढ़ा चुपचाप बैठा है । इस पर उसने बूढ़े से पूछा-"क्या तुम हमारे धर्म में विश्वास नहीं करते ? तुमने हमारे साथ दुआ क्यों नहीं की?"

बूढ़ा बाला-"हम लोग अग्नि की पूजा करते हैं।"

इतना सुन कर इब्राहीम गुस्से से लाल-पीला हो गया और उसने कहा-"अगर तुम हमारे खुदा में विश्वास नहीं करते और हमारे साथ दुआ नहीं करते, तो इसी समय हमारे घर से बाहर निकल जाओ।"

इब्राहीम ने उसे बिना भोजन दिये ही घर से बाहर निकाल दिया और दरवाजा लगा लिया, पर दरवाजा बन्द करते ही कमरे में अचानक रोशनी छा गई और एक देवदूत ने प्रकट होकर कहा-"इब्राहीम, यह तुमने क्या किया? वह गरीब बूढ़ा सौ वर्ष का है। भगवान् ने इतनी उम्र तक उसकी देखभाल की और एक तुम हो जो कि अपने को भगवान का भक्त समझते हो, तिस पर भी उसे एक दिन खाना नहीं दे सके, केवल इसीलिये कि उसका धर्म तुम्हारे धम से भिन्न है । संसार में धर्म भले ही अनेक हाँ पर भगवान् या खुदा सब प्राणियों का परम पिता है और सबके लिये वही एक ईश्वर है।"

यह कह कर वह देवदूत आँखों से ओझल हो गया । इब्राहीम को अपनी भूल मालूम हुई और वह भागा-भागा उस बूढ़े के पास पहुँचा और उसने उससे क्षमा माँगी। बूट ने उसे क्षमा करते हुए कहा-"बेटा, अब तो तुम समझ गये होगे कि भगवान् सबका एक है।"

यह सुन कर इब्राहीम को बड़ा आश्चर्य हुभा क्योंकि यही बात उससे फरिश्ते ने भी कही थी।

-नीरा सक्सेना

[देश विदेश की लोककथाएँ, पब्लिकेशन्स डिविजन, इंडिया]

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