समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर

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भारत प्यारा (काव्य)

Author: आशीष यादव

इस मिट्टी से उस मिट्टी तक जीवन सफर हमारा हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।
इसकी नदियां इसके झरने,
इसके मौसम के क्या कहने!
उत्तर में खड़ा हिमालय है,
दक्षिण में सागर की लहरें।
मेरी नजरों को बस जीवन भर यही नजारा हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।
फूलों का यह गुलशन है,
रंग बिरंगे फूल खिले हैं।
हवा बिखेरे खुशबू इसकी,
महकती हुई धूल उड़े है।
इसके गुलशन में बस हरदम यूं ही बहार हो।
हम रहें चाहे जहाँ भी पर दिल में भारत प्यारा हो।।

-आशीष यादव
ई-मेल: asheesh9386@gmail.com

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