देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

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राजेश ’ललित’ की दो क्षणिकाएँ  (काव्य)

Author: राजेश ’ललित’

ख़्वाब

थे हमारे भी !
कुछ ख़्वाब,
पर नींद नहीं आई;
पलकों से बाहर ही
रहे ख़्वाब !
मचलते हुए
जाना है हमको भी
पलकों के पीछे।

-राजेश 'ललित'
ई-मेल: fearlessr56@gmail.com

 

#

आज नहीं

जाना था हमको भी
उसी महफ़िल में--
तन्हा थे जो आये भी;
नहीं गये फिर हम भी:
तन्हाईयों की भीड़ में,
कि खो न जाएँ कहीं,
सोचा, आज नहीं फिर कभी।

--राजेश 'ललित'
 ई-मेल: fearlessr56@gmail.com

 

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