कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

Find Us On:

English Hindi

सयाना (काव्य)

Author: गोलोक विहारी राय

आदि काल से बस यूँ ही, चला आ रहा खेल।
बनने और बनाने की, चलती रेलम पेल।।
चलती रेलम पेल, दाँव जब जिसका चलता।
कहते उसको बुद्धिमान, वही सभी को छलता।।
कहे भोला भुलक्कड़, जिस पर हँसे जमाना।
कोई मूरख कहता उसको, कहता कोई दीवाना।।

मूर्ख यहाँ कोई नहीं, बनते सब होशियार।
एक दूसरे से अधिक, अकल सभी में यार।।
अकल सभी में यार, एक से एक सयाना।
बात बात में सब करे, एक से एक बहाना।।
कहे भोला भुल्लकड़, प्रभु बस इतना बतला देना।
मूर्ख कहे यदि दुनिया, खुद पर हँसना सिखला देना।।

- गोलोक विहारी राय

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश