भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
 
नहीं कुछ भी बताना चाहता है | ग़ज़ल (काव्य)       
Author:डॉ शम्भुनाथ तिवारी

नहीं कुछ भी बताना चाहता है
भला वह क्या छुपाना चाहता है

तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की
वही ख़ुद मुस्कुराना चाहता है

किया है ख़ाक़ जिसने चमन को वो
मुक़म्मल आशियाना चाहता है

हथेली पर सजाकर एक क़तरा
समंदर वह बनाना चाहता है

ज़माना काश, हो उसके सरीखा
यही दिल से दीवाना चाहता है

ज़रा सी बात है बस रौशनी की
मगर वह घर जलाना चाहता है

ज़ुबाँ से कुछ न बोलूँ जुल्म सहकर
यही मुझसे ज़माना चाहता है

लगीं कहने यहाँ खामोशियाँ भी
ज़ुबाँ तक कुछ तो आना चाहता है

 

- डॉ. शम्भुनाथ तिवारी
  प्रोफेसर
  हिंदी विभाग,
  अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,
  अलीगढ़ (भारत)
  संपर्क-09457436464
  ई-मेल: sn.tiwari09@gmail.com

Back
 
 
Post Comment
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश