भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
 
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें (काव्य)       
Author:दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें - इस पृष्ठ पर दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें संकलित की गई हैं। हमारा प्रयास है कि दुष्यंत कुमार की सभी उपलब्ध ग़ज़लें यहाँ सम्मिलित हों।

 

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हो गई है पीर पर्वत-सी | दुष्यंत कुमार
इस नदी की धार में | दुष्यंत कुमार
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार
आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख | ग़ज़ल
ये सारा जिस्म झुककर
तुम्हारे पाँव के नीचे----
ये जो शहतीर है | ग़ज़ल
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
कहाँ तो तय था चराग़ाँ
 
 
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