हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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मेरा नया बचपन

बार-बार आती है मुझको
मधुर याद बचपन तेरी।
गया, ले गया तू जीवन की
सबसे मस्त खुशी मेरी।।

चिंता-रहित खेलना-खाना
वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है
बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था
...

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विजयादशमी

विजये ! तूने तो देखा है,
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म-भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुणा का धाम सखी !!

बनवासी असहाय और फिर
हुआ विधाता वाम सखी !
हरी गई सहचरी जानकी
वह व्याकुल घनश्याम सखी !।

कैसे जीत सका रावण को
...

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