हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

Find Us On:

English Hindi
मेरी बड़ाई (कथा-कहानी) 
   
Author:सुदर्शन | Sudershan

जिस दिन मैंने मोटरकार खरीदी और उसमें बैठकर गुज़रा, उस दिन मुझे ख्याल आया, "यह पैदल चलने वाले लोग बेहद छोटे हैं और मैं बहुत

और जब शाम को मैं और मेरी बड़ाई घर आते तो हम दोनों खुश होते जो लाता जैसे हमारे चेहरे सीढ़ियों के अँधेरे में चमकते हों।

और जब हम सोफे पर बैठे तो मेरी छोटी बच्ची एक कुर्सी घसीटकर पर ले आई और उसके ऊपर खड़ी होकर बोली, "मैं तुमसे बड़ी हूँ। तुम मुझसे छोटे हो।"

और मेरे दिल में यह बात चुभ गई और मैंने मुड़कर अपनी बड़ाई की बरु देखा, मगर वह बिजली के प्रकाश में गायब हो चुकी थी।

-सुदर्शन

[झरोखे, हिन्द किताब्स लिमिटेड, 1947]

Previous Page  | Index Page  |    Next Page
 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश