यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
जी रहे हैं लोग कैसे | ग़ज़ल (काव्य)    Print this  
Author:उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में,
नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में।

बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा ?
आदमी नंगा खड़ा है सभ्यता के आवरण में ।

घोर कलियुग है कि दोनों राम-रावण एक-से हैं,
लक्ष्मणों का हाथ रहता आजकल सीता-हरण में ।

दंभ के माथे मुकुट है, साधना की माँग सूनी,
कोयलें सिर धुन रही हैं, बैठ कौवों की शरण में ।

शब्द नारे बन चुके हैं, अर्थ घोर अनर्थ करते,
'संधि' कम 'विग्रह' अधिक है जिन्दगी के व्याकरण में ।

आधुनिक युगबोध ने साहित्य का है रूप बदला,
गद्य केवल छप रहा है, गीत के हर संस्करण में ।

जल रहे ईर्ष्या से जुगनू देख यौवन चाँदनी का,
ढूंढते हैं दोष बगुले 'हंस' के हर आचरण में ।


- उदयभानु 'हंस' राजकवि हरियाणा
साभार-दर्द की बांसुरी [ग़ज़ल संग्रह]

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