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मार्च-अप्रैल 2021

मार्च-अप्रैल 2021

इस अंक में कहानियाँ, लोककथाएँ, पौराणिक कथाएँ, कविताएँगीतदोहेग़ज़लेंआलेखव्यंग्यलघु-कथाएं व बाल-साहित्य पढ़िए

23 मार्च को भारत में 'शहीदी दिवस' होती है। 'शहीदी दिवस'  पर पढ़िए इतिहास के पन्नों से विशेष सामग्री

कथा-कहानियों में पढ़िए, लघु-कथा के अंतर्गत पढ़िए, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की दुर्लभ लघुकथा, 'नदियां और समुद्र', पूनम चंद्रलेखा की, 'अंतिम दर्शन', सुनील शर्मा की, 'खंभे पर बेल', दिलीप कुमार की, 'साझा घाव'।

कहानियों में प्रेमचंद की, 'मनुष्य का परम धर्म', लियो टोल्स्टोय की, 'हम से सयाने बालक', फणीश्वरनाथ रेणु की, 'ठेस', अज्ञेय की 'कोठरी की बात' और गणेशशंकर विद्यार्थी की, 'जेल-जीवन की झलक'। इनके अतिरिक्त समकालीन कहानीकारों में अभिमन्यु अनत की, 'इतिहास का वर्तमान' और डॉ वंदना मुकेश की पुरस्कृत कहानी 'सरोज रानियाँ' पढ़िए। इस कहानी को विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस की अंतरराष्ट्रीय कहानी-लेखन प्रतियोगिता में यूरोप वर्ग के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार मिला है।

हास्य कथा में पढ़िए, क्रिश्न चन्दर की, 'जामुन का पेड़'। 

लोककथाएँ हमारे साहित्य का अहम् हिस्सा हैं, इस बार लोककथाओं में 'आग का आविष्कारक' व इसके अतिरिक्त 'चन्दबरदाई और पृथ्वीराज चौहान' प्रकाशित की हैं। होली आ रही है तो 'होली की पौराणिक कथाएँ भी पढ़िए और बच्चों को सुनाइए-पढ़ाइए।

गीत, ग़ज़ल, कविता, हास्य काव्य, दोहे, रुबाइयाँ और हाइकु तो आपको भाते ही हैं। काव्य, आप चाव से पढ़ते रहे हैं, इस बार 'रोचक' के अंतर्गत शब्द-चित्र काव्य देखकर रस लीजिए।

बाल साहित्य में बच्चों की कहानियाँ पढ़िए। 'शेख चिल्ली की चिट्ठी' बच्चों को गुदगुदाएगी, तो मंगलेश डबराल की, 'बच्चों के लिए चिट्ठी' नई सोच पैदा करेगी। बच्चों की कविताओं में पदुमलाल बख्शी की बाल कविता, 'बुढ़िया', आनंद विश्वास की 'मामू की शादी में' मनोरंजक हैं, तो दयाशंकर की 'तितली' सबके मन को हरने वाली है। तोनियो मुकर्जी की 'हमको फिर छुट्टी' और रहमान की, 'मिठाईवाली बात' पढ़कर मारे हँसी के पेट पकड़कर बैठना पड़ जाए।

'रोचक' में इस बार डॉ प्रियंका जैन सी-डैक से अपनी 'कृत्रिम मेधा' से छुट्टी लेकर हमें उदयपुर (राजस्थान वाला उदयपुर नहीं, यह दूसरा उदयपुर है जो मध्य्प्र्देश में है) के 'उदयेश्वर नीलकंठेश्वर' की सैर करवा रही हैं। इस मंदिर का भ्रमण करते-करते आपको एक लोककथा भी पढ़ने को मिल जाएगी कि कैसे एक शिल्पकार स्वयं मूर्तरूप हो गया।

आप गंगा, जमुना, सरस्वती नदियों से तो परिचित हैं लेकिन कनाडा में एक बार पुस्तकों की नदी भी बह निकली थी। पढ़िए, 'सड़क पर बह निकली पुस्तक-गंगा'। यह कलाकारों का प्रदूषण के विरुद्ध अपना विरोध जताने का अनोखा तरीका था, उन्होंने सड़क रोकने के लिए सड़क पर दस हजार पुस्तकें बिछाकर सड़क को एक पुस्तक नदी में परिवर्तित कर दिया था।

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