राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

Find Us On:

English Hindi
Loading
आज भी खड़ी वो... (काव्य)  Click To download this content
   
Author:सपना सिंह ( सोनश्री )

निराला की कविता, 'तोड़ती पत्थर' को सपना सिंह (सोनश्री) आज के परिवेश में कुछ इस तरह से देखती हैं:

 

आज भी खड़ी वो...

तोडती पत्थर,

दिखी थी आपको,

क्या पता था,

टूटेगा,

 और क्या क्या ?

कविवर,

 क्या कहूँ,

वो दिखी थी

रास्ते में आपको ,

आज,

 जो पढता हैं,

चला जाता हैं,

बस उसी रास्ते में ।

जिस कसक ने,

लेखनी चलाई थी,

 उस दिन की ,

वो कसक तो,

आज भी,

 करती हैं विवश।

अफ़सोस,

 पर आज भी ,

तोडती हैं पत्थर,

वो खड़ी,

 उसी रास्ते में  ।

पसीने से,

लथपथ रूप उसका,

आज दया नहीं,

लोभ पैदा करता हैं ।

वो तब भी ,

मजबूर थी,

आज भी,

हैं  बेबस,फरक,

 बस इतना हैं,

वो कल,

 दिखी थी आपको,

आज,

 दिखती हैं सबको।


   - सपना सिंह ( सोनश्री )

 

#

Poem by Sapana Singh


Previous Page  | Index Page  |    Next Page

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश