हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।
ऐसे सूरज आता है (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:श्रीप्रसाद

पूरब का दरवाज़ा खोल
धीरे-धीरे सूरज गोल
लाल रंग बिखरता है
ऐसे सूरज आता है।

गाती हैं चिड़ियाँ सारी
खिलती हैं कलियाँ प्यारी
दिन सीढ़ी पर चढ़ता है।
ऐसे सूरज बढ़ता है।

लगते हैं कामों में सब
सुस्ती कहीं न रहती तब
धरती-गगन दमकता है।
ऐसे तेज़ चमकता है !

गरमी कम हो जाती है
धूप थकी सी आती है
सूरज आगे चलता है
ऐसे सूरज ढलता है।

- श्रीप्रसाद

 

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें