मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।

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घास में होता विटामिन

 (बाल-साहित्य ) 
 
रचनाकार:

 रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

घास में होता विटामिन
गाय, भेड़ें, घोड़े;
घास खाकर जीते, उनके
बावर्ची हैं थोड़े!

कहते है अनुकूल बाबू :
"आदत गलत लगा दी!
कुछ दिन खाओ घास, पेट खुद
हो जाएगा आदी--
व्यर्थ अनाज की खेती, कोई
खेत न जोते-गोड़े!"

घरनी गुहराती रह जाती,
वह निकल पड़ते हैं चरने,
ठुकराकर चल देते, जब वह
पैरों को लगती है धरने--
मानव-हित का जोश, भला वह
अपना हट क्यों छोड़ें!

दो दिन भी ना हुए थे, जब वह
छोड़ गए यह लोक ही,
बेधे हैं विज्ञान-ह्रदय को
अभी यह महाशोक ही :
जीते तो प्रमाण के पथ में
बचते कहीं न रोड़े!

- रबीन्द्रनाथ टैगोर
[रवीन्द्रनाथ का बाल साहित्य, अनुवाद : युगजीत नवलपुरी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली]

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