भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।

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मज़दूर

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 गुलज़ार

कुछ ऐसे कारवां देखे हैं सैंतालिस में भी मैने
ये गांव भाग रहे हैं अपने वतन में
हम अपने गांव से भागे थे, जब निकले थे वतन को
हमें शरणार्थी कह के वतन ने रख लिया था
शरण दी थी
इन्हें इनकी रियासत की हदों पे रोक देते हैं
शरण देने में ख़तरा है
हमारे आगे-पीछे, तब भी एक क़ातिल अजल थी
वो मजहब पूछती थी
हमारे आगे-पीछे, अब भी एक क़ातिल अजल है
ना मजहब, नाम, जात, कुछ पूछती है
- मार देती है

ख़ुदा जाने-- ये बटवारा बड़ा है
या वो बटवारा बड़ा था

- गुलज़ार

 

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