देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

Find Us On:

English Hindi
Loading

प्रतीक्षा

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 स्वरांगी साने

बेटी आने वाली है
यह सोच कर
उसकी आँखें सुपर बाजार हो जाती हैं
और वो सुपर वुमन।
पूरे मोहल्ले को खबर कर देती है
कहती है- दिन ही कितने बचे हैं, कितने काम हैं

कुछ उसके सामने
कुछ पीठ पीछे हँसते हैं
कि बेटी न हुई
शहज़ादी हो गई
पर उसके लिए तो
ब्याहता बेटी भी
किसी परी से कम नहीं होती।

आ जाती है बेटी
तो वो चक्कर घिन्नी हो जाती है।
याद कर-कर के बनाती है
बेटी की पसंद की चीज़ें

बेटी सुस्ताती है
इस कमरे से
उस कमरे में
पुराने दिनों की तरह
पूरे घर को बिखेर देती है
लेकिन वो कुछ नहीं कहती
जानती है बेटी के जाते ही
पूरा घर खाली हो जाएगा।

तब तक इस फैलाव में वो
दोनों का विस्तार देखती है।

बेटी के जाने के दिन आते ही
वो नसीहतें देने लगती है
डाँट-फटकार भी
कि कितना फैला दिया है
अब कैसे समेटेगी?

साथ में देती जाती है खुद ही कुछ-कुछ
ये भी रख ले, और ये भी
बेटी तुनकती रहती है
क्यों बढ़ा रही हो सामान मेरा

वो कुछ नहीं कहती
कैसे कह दे
कि
बेटी तो जाते हुए उसकी आंखें ही ले जा रही है
और छोड़े जा रही कोरी प्रतीक्षा।

- स्वरांगी साने
  ई-मेल: swaraangisane@gmail.com

Back

 

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश