कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

Find Us On:

English Hindi
Loading
राधा प्रेम (काव्य) 
   
Author:सपना मांगलिक

मोर मुकट पीताम्बर पहने,जबसे घनश्याम दिखा
साँसों के मनके राधा ने, बस कान्हा नाम लिखा
राधा से जब पूँछी सखियाँ, कान्हा क्यों न आता
मैं उनमें वो मुझमे रहते, दूर कोई न जाता
द्वेत कहाँ राधा मोहन में, यों ह्रदय में समाया
जग क्या मैं खुद को भी भूली, तब ही उसको पाया।

वो पहनावे चूड़ी मोहे,बेंदी भाल लगावे
रोज श्याम अपनी राधा से, निधिवन मिलवे आवे
धन्य हुईं सखियाँ सुन बतियाँ,जाकी दुनिया सारी
उंगली पे नचे राधा की, वश में है गिरधारी
चंचल चितवन मीठी वाणी, बंशी होँठ पे टिका
रीझा ही कब धन दौलत पे, श्याम प्रेम दाम बिका
नेत्र सजल राधा से बोले, भाव विभोर मुरारी
अब मोहन से पहले राधा, पूजे दुनिया सारी।
[सार छंद]

- सपना मांगलिक

 

Previous Page   Next Page

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश