हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (काव्य) 
   
Author:सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

वह आता -
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।


पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को - भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता -
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।


साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता-भाग्य-विधाता से क्या पाते?-
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।


चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।

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