साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
सबके अपने-अपने ग़म (काव्य)    Print this  
Author:रेखा राजवंशी | ऑस्ट्रेलिया

सबके अपने-अपने ग़म
कुछ के ज़्यादा, कुछ के कम

दिल पे ऐसी गुज़री है
आँख भरीं, पलकें हैं नम

अब के भी तुम न आए
बीत गए कितने मौसम

तारा कोई टूटा है
फिर से है चश्मे पुरनम

कोई तो बादल बरसे
बन जाए दर्दे मरहम

कुछ ऐसी भी बात करो
मिल जाए लुत्फ़-ए-पैहम

दिल की दिल से राह बने
कुछ ऐसा भी हो आलम

- रेखा राजवंशी
  ऑस्ट्रेलिया

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश