वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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आओ ! आओ ! भारतवासी । (काव्य)

Author: बाबू जगन्नाथ बी० ए०

आओ !  आओ ! भारतवासी ।
क्या बंगाली ! क्या मदरासी ! ॥

क्या पंजाबी ! क्या गुजराती ! ।
क्या सिंधी ! क्या पर्वतवासी ! ॥

हम हैं एकहि देश के वासी ।
एकहि बोली बोलैं खासी ॥

हिन्दी को सब मिलि अपनावै ।
वाहीको सब सीस नवावैं ॥

हिन्दी मेरी प्यारी प्यारी ।
नख सिख से लगती उँजियारी ॥

सुन्दर डोल सुडौल सुहाई ।
अंग अंग सुन्दरता छाई ॥

सिर में बेनी गुथी बनाई।
ओढ़नि तापर परम सुहाई ॥

पायन में पैजनिया भाई ।
सिर पर मुरछल चँवर ढुराई ॥

ऐसी हिन्दी महरानी की ।
देव नगर की सुख दानी को ॥

सरल स्वभाव दया खानी को ।
सत्यव्रती अखिला मानी की ॥

आओ हम सब मिलिके सारैं ।
तिलक हिन्द का और जुहारैं ॥

करैं पूरती भंडारे की।
दै दै तिन भेट यथा सक्ती ।

सम्मिलनी करके हिन्दी की ।
कह डालैं है जो कुछ जी की ॥

करि डालैं त्रुटि दूर सबै मिलि।
जामें हिन्दी राज्य चलै चलि ॥

राज काज में याहि चलावैं ।
सिक्कन पर भी याहि खुदावैं ॥

देिग दिगन्त में यश फैलावैं।
हिन्दी की जय ध्वजा उड़ावैं ॥

- बाबू जगन्नाथ बी० ए०

[ प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन १० अक्टूबर १९१० को बाबू जगन्नाथ बी० ए० द्वारा लिखा गया गीत जो सम्मेलन में स्कूल के विद्यार्थियों ने गाया था ]

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