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रजकुसुम कहानी संग्रह की समीक्षाएं  (विविध)

Author: डॉ. मधु भारद्वाज एवं नरेश गुलाटी

Rita Kaushal Ke Kahani Sangrah Ki Samiksha

समीक्षा : रजकुसुम (कहानी संग्रह)
समीक्षक : डॉ. मधु भारद्वाज
वरिष्ठ साहित्यकार व रिटायर्ड असिस्टेंट डाइरेक्टर-इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च-आगरा

जब रीता कौशल जी का कहानी संग्रह ‘रजकुसुम' मेरे हाथों में आया तो बस पढ़ती ही चली गई। उनकी कहानियाँ मन-मस्तिष्क को झिंझोड़ती ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क में अपने लिए एक कोना स्वयं ही तलाश कर अपने लिए जगह बना लेती हैं। साथ ही पाठक को सोचने पर विवश कर देती हैं और एक सामाजिक संदेश उन कहानियों में होता है। स्त्री के जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ावों को लेखिका ने बहुत ही सलीके से तराशा है। उनके पात्र अपने इर्द-गिर्द के ही महसूस होते हैं। कहानी का शीर्षक ‘रजकुसुम' अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। आवरण पृष्ठ की साज-सज्जा आकर्षक है। मानवीय संवेदनाओं और पुष्प को चित्रित करता आवरण पृष्ठ कहानी संग्रह के बारे में बड़ी खामोशी से बहुत कुछ कह जाता है, बस हमें ध्यान से देखने की जरूरत भर है उसे।

रीता कौशल जी का यह कहानी संग्रह ‘रजकुसुम' अपने आप में एक अद्भुत रचना है। जिस समाज में आज झूठ का ज्यादा बोलबाला है, उस समाज में लेखिका ने सच का दीया हाथ में लेकर समाज को एक नई दिशा दिखाने का सफल प्रयास किया है। एक दर्जन कहानी रूपी पंखुडियों में सिमटा ‘रजकुसुम' अपनी खुशबू से पाठकों को महकाता तो है ही, साथ ही स्त्री की वेदना को बखूबी बयां कर जाता है। 136 पृष्ठों का कहानी संग्रह अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहने में पूरी तरह सफल है। रीता कौशल जी द्वारा यह पुस्तक अपने परमपूज्य दादाजी एवं दादीजी को समर्पित की गई है। इस समर्पण से उनके अपने संस्कार परिलक्षित होते हैं कि वे समाज को संस्कारों की दिशा प्रदान कर रही हैं।

‘स्वदेश के परदेसी' एक मर्मस्पर्शी कहानी है। यह प्रगतिशील सोच का प्रतिनिधित्व करती है। अपने ही देश में आधुनिक पहनावे या शक्ल-ओ-सूरत को लेकर जो तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, उनका वर्णन लेखिका ने बड़ी खूबसूरती से किया है। लोगों की निम्न स्तरीय मानसिकता दर्शाती यह कहानी झकझोर कर रख देती है।

कहानी ‘किरदार' दिल को छू जाती है जिसकी नायिका को अहसास होता है कि उसने ताउम्र किरदार ही निभाए थे, रिश्ते नहीं। कहानी ‘दोहरे मापदंड' पुरुषों की दोहरी मानसिकता को दर्शाती है, जिसमें व्यक्ति सामने तो अत्यन्त मीठा बोलता है और पीठ पीछे सैकेंडहैंड बीबी वाला कहते हुए अपने पड़ोसी का मजाक उड़ाता है।

कहानी ‘वतनपरस्ती' में आस्ट्रेलिया में भारतीय और इराक की महिलाओं की नोकझोंक और तकरार देखते ही बनती है । कहानी ‘बहुरूपिया' का किरदार महिलाओं को अपनी पहुँच बताकर उनके विचारों से खेलता रहता है, किसी को वह बड़े चित्रकार बनाने का सपना दिखाता है, तो किसी को बहुत बड़ा संगीतकार। मगर कहानी के अंत में उसकी पोल खुल जाती है। कहानी संदेश देती है कि व्यक्ति अपने चेहरे पर चाहे जितने मुखौटे लगा ले, उसका वास्तविक रूप कभी न कभी तो दृष्टिगोचर हो ही जाता है।

कहानी ‘विरासत' नानी और धेवती के सम्बन्धों को दर्शाती बेहतरीन कहानी है, जिसमें नानी द्वारा अपनी धेवती के लिए लिखे गए पत्र, जिन्हें वह अपने विभिन्न जन्मदिनों पर पढ़ती है, समाज को सशक्त संदेश देते हैं, इन पत्रों में क्षमा को सर्वोपरि बताया गया है। हमारे बुजुर्गों के अनुभवों का निचोड़ है यह कहानी।

कहानी ‘सिल्वर जुबली गिफ्ट' स्त्री के दर्द को बयां करती है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को कितने कष्ट सहने पड़ते हैं, उनका ताना-बाना है यह कहानी। पुरुष अपनी नपुंसकता जैसी कमी को छिपाकर समाज से यह कहता फिरता है कि मेरी पत्नी के दिल में छेद है, इसलिए माँ नहीं बन सकती। शादी की सिल्वर जुबली पर बड़े से होटल में पार्टी देता है, लेकिन पत्नी को जब स्तन कैंसर की शिकायत हो जाती है, तो पत्नी के दाह-संस्कार का अधिकार भी वह अपने पति से छीन लेती है और वसीयत में यह जिम्मेदारी अपने पुत्र समान इकलौते भतीजे को सौंप देती है।

कहानी-संग्रह की समस्त कहानियां बेहद खूबसूरत और संदेश देने वाली हैं। लेखिका ने कहानियों के माध्यम से समाज की सोच में बदलाव लाने का प्रयास किया है, वह प्रशंसनीय है, जब एक विधुर कुंवारी कन्या से शादी कर सकता है, तो विधवा को किसी कुंवारे युवक से शादी करने का अधिकार क्यों नहीं? क्या तकलीफें सहने के लिए सिर्फ नारी ही है? ये ऐसे प्रश्न हैं, जो कहानी संग्रह पढ़ने के बाद हमारे मन-मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते हैं।

कहानी-संग्रह ‘रजकुसुम' की भाषा सरल तो है ही, वाक्यों की रचना भी काफी सशक्त है, जो अपनी बात कहने का पूरा दमखम रखते हैं। लेखिका की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं पर अच्छी पकड़ है। रीता कौशल जी की छोटी-छोटी कहानियां समाज को एक सकारात्मक संदेश प्रदान करती हैं, वह हमें सजग करती हैं। हर कहानी में समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करता हुआ दृष्टिकोण है, जो समाज को एकजुट होने का, अच्छी सभ्यता और संस्कृति, अच्छे संस्कार देने का संकेत देता है।

मस्तिष्क के प्रत्येक खांचे में रीता कौशल जी की एक-एक कहानी इस प्रकार समा जाती है, जैसा कि उस पात्र को अपने आसपास या बिल्कुल करीब से देखा हो, यह उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता है। अंत में इतना ही कहना चाहूंगी-

आपके लेखन-अनुभव का ही तो यह है अद्भुत ‘कौशल'
कि पाठक एक बार अपनी ‘सोच' को सोचता जरूर है।


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समीक्षा : रजकुसुम (कहानी संग्रह)
समीक्षक : नरेश गुलाटी - अहमदाबाद
सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक - भारतीय रिजर्व बैंक
कला समीक्षक व संस्कृति-कर्मी

मूल्य-धर्मी कहानियों का दस्तावेज है रजकुसुम ! भारतीय मूल की ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रीता कौशल शिक्षण में जीव विज्ञान खंगालती रहीं या अर्थशास्त्र, आजीविका के लिए वहां की नागरिक होकर ऑस्ट्रेलियाई सरकार में वित्त अधिकारी हो गईं, किन्तु मन लगा रहा हिंदी लेखन और संपादन में। लिहाज़ा एक तरफ तो पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के हिंदी समाज की वार्षिक पत्रिका भारत-भारती के संपादन का दायित्व-निर्वाह किया तो दूसरी ओर अपना रचनात्मक लेखन जारी रखा।

कुछ समय पहले प्रकाशित हुए उनके कहानी संग्रह 'रजकुसुम' को देखने का अवसर मिला। कहानियां पढ़ते हुए मन तो पूर्णरूपेण कथानक-कथाक्रम में रमा ही, क्योंकि यहां बुनियादी ज़रूरत किस्सागोई का प्रवाह भी है और कहानी का क्रमिक विकास और समुत्कर्ष भी; साथ ही हर कहानी के बाद यह खास अनुभूति हुई कि लेखिका एक सकारात्मक निष्कर्ष पर हर कहानी की परिणति करने में सफल होती हैं। इस मायने में कहानी संग्रह न केवल मौजूदा नैतिक-सामाजिक अवमूल्यन के विरुद्ध खड़ा हो पाता है, अपितु सही मूल्यों को चिन्हित करने और उन पर अमल करने की प्रेरक शक्ति भी देता है।

यह प्रेरणादायी शक्ति पहली कहानी 'स्वदेश के परदेसी' की नायिका अलाना से लेकर 'दोहरे मापदंड' के सह-नायक सचिन के हृदय-परिवर्तन से लेकर 'विरासत' की अपराजिता के संकल्प-निर्माण तक लगातार नज़र आती है व अनजाने और स्वतः पाठक को भी एक सम्बल और ऊर्जा प्रदान करने में सफल रहती है!

कहानियों में देशज भारतीय समाज के पारिवारिक अवलंबन से लेकर भारतीय अप्रवासी समाज की जद्दोजहद की अनुगूंज सुनाई देती है। जहां पहली कहानी 'स्वदेश के परदेसी' में भारत में व्याप्त प्रादेशिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों की पैनी पड़ताल की गई है तो वहीं 'वतनपरस्ती' में अप्रवासी भारतीय के देश छोड़ जाने के तमाम विरोधाभासों के बावजूद देश-समाज और इसकी सामूहिक-सामासिक चेतना के प्रति गहन आस्था का चित्रण दिखायी देता है। विदेश प्रवास की चकाचौंध में वैवाहिक रिश्तों की कुर्बानी को रेखांकित करती कहानी 'डॉलर की चमक' में नायिका की स्वावलम्बन की चेष्टा और दृढ़ इच्छाशक्ति, सम्बन्धों की टूटन के बीच किसी को भी रास्ता दिखाने का काम कर सकती है।

'किरदार' कहानी में नायिका के विभाजित-कुंठित मनोविज्ञान की वजह से न केवल उसके अपने जीवन, अपितु उसके संतति पर पड़ने वाली छाया का मार्मिक विवरण आया है, जिसे विदेश प्रवास और प्रेम-विवाह की पृष्ठभूमि में संपुष्ट किया गया है। कहानी 'बहुरूपिया' में कला जगत में विचरने वाले कल्चर-वल्चर का सुंदर, सहज और तार्किक पर्दाफाश किया गया है जो अच्छा लगता है, तो 'क्यों धन संचय' में पितृ-धर्म की श्रेष्ठ परिपाटी को बड़ी खूबसूरती से स्थापित किया गया है।

वनिका पब्लिकेशन्स, विष्णु गार्डन, नई दिल्ली से प्रकाशित यह संग्रह अप्रवासी साहित्य की श्रेणी में भी रखा जा सकता है, किन्तु इसकी भावभूमि समुचित रूप से देशज भी है। कुल मिलाकर संग्रह की बारह कहानियां चूंकि मेरी-आपकी-पड़ोस की बात भी करती हैं और ज़रा बड़े समाज की प्रवृति को भी बखूबी पकडती हैं, और कलेवर में किंचित अप्रवासी भी हैं, इसलिए सहज पठनीय और संग्रहणीय हैं।

कथा और काव्य में संवेदना और अभिव्यक्ति की सामर्थ्य से परिपूर्ण रीता कौशल निश्चित ही हिंदी जगत में अपना स्थान बनाने में अग्रसर होंगी, ऐसी अपेक्षा है।

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पुस्तक Amazon पर उपलब्ध है।  

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