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जाम होठों से फिसलते (काव्य)

Author: शांती स्वरुप मिश्र

जाम होठों से फिसलते, देर नहीं लगती
किसी का वक़्त बिगड़ते, देर नहीं लगती

न समझो हर किसी को किस्मत अपनी
उस किस्मत को बदलते, देर नहीं लगती

न देखिये ख़्वाब ऐसा जो न हो पूरा कभी
चूंकि ख़्वाबों को बिखरते, देर नहीं लगती

न लगाइये दौलतों का ये ढेर बेसबब यूं ही
क्योंकि सांसों को अटकते, देर नहीं लगती

न खोइए इन दौलतों इन शोहरतों में दोस्त,
चूंकि ख़ुदा को सर झटकते, देर नहीं लगती

औरों की तबाहियों से खुश न होइए "मिश्र"
चूंकि तूफां को रुख बदलते, देर नहीं लगती

- शांती स्वरुप मिश्र
  ई-मेल: mishrass1952@gmail.com

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