राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

Find Us On:

English Hindi
Loading

किसान  (काव्य)

Author: सत्यनारायण लाल

नहीं हुआ है अभी सवेरा
पूरब की लाली पहचान
चिड़ियों के जगने से पहले
खाट छोड़ उठ गया किसान ।

खिला-पिलाकर बैलों को ले
करने चला खेत पर काम
नहीं कोई त्योहार न छुट्टी
उसको नहीं काबी आराम।

गरम-गरम लू चलती सन-सन
धरती जलती तवा समान
तब भी करता काम खेत पर
बिना किए आराम किसान।

बादल गरज रहे गड़-गड़-गड़
बिजली चमक रही चम-चम
मुसलाधार बरसता पानी
ज़रा न रुकता लेता दम।

हाथ पांव ठिठुरते जाते हैं
घर से बाहर निकले कौन
फिर भी आग जला, खेतों की
रखवाली करता है वह मौन।

है किसान को चैन कहाँ, वह
करता रहता हरदम काम
सोचा नहीं कभी भी उसने
घर पर रह करना आराम।

- सत्यनारायण लाल

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश