कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

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1857  (काव्य)

Author: शिव नारायण जौहरी 'विमल'

सत्तावन का युद्ध खून से
लिखी गई कहानी थी
वृद्ध युवा महिलाओं तक
में आई नई जवानी थी
आज़ादी के परवानों ने
मर मिटने की ठानी थी !

क्रांति संदेशे बाँट रहे थे
छदम वेश में वीर -जवान
नीचे सब बारूद बिछी थी
ऊपर हरा भरा उद्यान
मई अंत में क्रांतिवीर को
भूस में आग लगानी थी !

मंगल पांडे की बलि ने
संयम का प्याला तोड़ दिया
जगह-जगह चिंगारी फूटी
तोपों का मुँह मोड़ दिया
कलकत्ता से अंबाला तक
फूटी नई जवानी थी !

मेरठ कानपुर में तांडव
धू-धू जले फिरंगी घर
नर-मुंडों से पटे रास्ते
गूँजे 'जय भारत' के स्वर
दिल्ली को लेने की अब
इन रणवीरों ने ठानी थी !

तलवारों ने तोपें छीनी
प्यादों ने घोड़ों की रास
नंगे-भूखे भगे फिरंगी
जंगल में छिपने की आस
झाँसी में रणचंडी ने भी
अपनी भृकुटी तानी थी !

काशी इलाहाबाद अयोध्या
में रनभेरी गूँजी थी
फर्रूखाबाद, इटावा तक में
यह चिंगारी फूटी थी
गंगा-यमुना लाल हो गई
इतनी क्रुद्ध भवानी थी !

आज़ादी की जली मशालें
नगर, गाँव, गलियारों में
कलकत्ता से कानपुर तक
गोली चली बाज़ारों में
तांत्या, बाजीराव, कुंवर की
धाक शत्रु ने मानी थी !

दिल्ली पर चढ़ गये बांकुरे
शाह ज़फर सम्राट बने
सच से होने लगे देश
की आज़ादी के वे सपने
अँग्रेज़ों को घर जाने की
बस अब टिकिट कटानी थी !

लेकिन आख़िर वही हुआ
सर पत्थर से टकराने का
किंतु हार है मार्ग जीत
को वरमाला पहनाने का
बर्बरता को रौंध पैर से
माँ की मुक्ति करानी थी !

आज़ादी का महासमर यह
चला निरंतर नब्बे साल
बदली युध नीतियाँ लेकिन
हाथो में थी वही मशाल
पंद्रह अगस्त को भारत ने
लिखी नई कहानी थी
आज़ादी की हुई घोषणा
दुनिया ने सन्मानी थी !

- शिव नारायण जौहरी 'विमल'
  भोपाल (म. प्र.), भारत
  ई-मेल: madhupradh@gmail.com

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