राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

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असेम्बली हॉल में फेंका गया पर्चा  (विविध) 
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Author:हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना

(8 अप्रैल, सन् 1929 को असेम्बली में बम फैंकने के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अँग्रेज़ी परचे का हिंदी अनुवाद)

'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना'  

सूचना

'बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है', प्रसिद्ध फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।

पिछले दस सालों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है और न ही हिंदुस्तानी पार्लियामेंट पुकारे जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंक कर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने  की आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग 'साइमन कमीशन' से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आंखें फैलाए हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार 'सार्वजनिक सुर‌‌‌क्षा विधेयक' (पब्लिक सेफ्टी बिल)  और 'औ‍द्यौगिक विवाद विधेयक' (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में 'अख़बारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून' (प्रेस सैडिशन एक्ट)  जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।  

राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर 'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ' ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परंतु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड देना आवश्यक है।

जनता के प्रतिनिधियों से हमारा अनुरोध है कि वे इस पार्लियामेंट के पाखंड को छोडकर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ' सार्वजनिक सुर‌‌‌क्षा' और 'औ‍द्यौगिक विवाद' के दमनकारी क़ानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।

हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इनसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।

इंकलाब ज़िदाबाद!  


हस्ताक्षर बलराज
कमांडर इन चीफ


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