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छोटी हिन्दी कहानियां  (कथा-कहानी)    Print  
Author:भारत-दर्शन
 

दस शिक्षाप्रद व प्रेरणादायक कहानियाँ

 

मेज़बान - ख़लील जिब्रान की कहानी 

"कभी हमारे घर को भी पवित्र करो ।" करूणा से भीगे स्वर में भेड़िये ने भोली -भाली भेड़ से कहा ।

मैं जरूर आती बशर्ते तुम्हारे घर का मतलब तुम्हारा पेट न होता ।" भेड़ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया ।

- ख़लील जिब्रान
[Hindi Story by Khalil Gibran]

[भारत-दर्शन संकलन]

 


संसाधन और ज्ञान

एक बार एक राजा ने प्रसन्न होकर एक लकड़हारे को एक चंदन का वन (चंदन की लकड़ी का जंगल) उपहार स्वरूप दिया।

लकड़हारा ठहरा साधारण मनुष्य! वह चंदन की महत्ता और मूल्य से अनभिज्ञ था। वह जंगल से चंदन की लकड़ियां लाकर उन्हें जलाकर भोजन बनाने के लिये प्रयोग करने लगा।

राजा को अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तो उसकी समझ में आया कि संसाधन का उपयोग करने हेतु भी बुद्धि व ज्ञान आवश्यक है।

यही कारण है कि लक्ष्मी जी (धन की प्रतीक देवी) और श्री गणेश जी (ज्ञान के प्रतीक देव) की एक साथ पूजा की जाती है ताकि व्यक्ति को धन के साथ-साथ उसे प्रयोग करने का ज्ञान भी प्राप्त हो।

[Educational Hindi Story]
[ भारत-दर्शन संकलन ]

 

सच्चा कलावान् कौन है?

टॉल्स्टॉय का एक मित्र चित्रकार था । नाम था गे। गे ने ईसा से मिलते जुलते चित्र बनाने शुरू किए। उस समय टॉल्स्टॉय ने जो उपदेश उसे दिया, वह ध्यान देने लायक़ है ।

टॉल्स्टॉय ने कहा-''सच्चा कलावान् वही हो सकता है, जिसके हृदय में किसी उपकारक विषय का ज्ञान और चरित्र लबालब भरा हो, और फिर वह बाहर निकलने के लिये ज़ोर मार रहा हो; अर्थात् उस विषय की अपनी जानकारी लोगों को बताने के लिये प्रबल इच्छा उसके हृदय में ज़ोर मार रही हो, जिसको काम में लाना उसको याद हो, फिर चाहे वह लेखक हो, चित्रकार हो, या कोई भी कला का आश्रय लेनेवाला हो। जुदी-जुदी कलाओं के बाहरी रूप जुदे-जुदे होते हैं, पर सबकी जड़ तो एक ही प्रकार की होती है।''

-कृष्णगोपाल माथुर
साभार-आदर्श घटनाओं का संग्रह
[Educational Hindi Story]

 

जनसेवा का संदेश

लालबहादुर शास्त्री एक बार देश के सुदूर क्षेत्रों के दौरे पर थे। वे आम जनता से मिलने ऐसे क्षेत्रों में जा रहे थे जहां मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। लेकिन शास्त्री जी के उत्साह में कोई कमी नहीं आ रही थी। हालाँकि उनके साथ चलने वाले लोगों को कठिनाई हो रही थी। कुछ लोगों ने शास्त्री जी को लौट चलने को भी कहा पर वे नहीं माने।

वे जब एक छोटे से गांव में बड़ी देर तक पैदल घूमते हुए तो उनके पैर में थोड़ी चोट लग गई। उनके साथ आए लोगों ने बड़ी मुश्किल से एक डॉक्टर को बुलवाया। डॉक्टर ने आते ही उनके ज़ख़्म का उपचार किया और कुछ दवाइयाँ खाने को दीं। फिर कुछ जरूरी हिदायतें देकर वह जाने लगा तो शास्त्री जी ने उसकी फ़ीस उसे देनी चाही। डॉक्टर पैसे देखकर सकपका गया।

उसने शास्त्री जी को पैसे लौटाते हुए कहा- महोदय, इतनी छोटी सेवा के बदले फ़ीस देकर शर्मिंदा न करें। मैं आपके काम आ सका, यही बहुत है।

शास्त्री जी विनम्रतापूर्वक बोले- डॉक्टर साहब, मैं आपको पैसे दे सकता हूं तो आपको पैसे ले लेने चाहिए। हां, यदि कभी कोई निर्धन और असहाय व्यक्ति आपको मिले, जो फ़ीस न चुका सकता हो तो आप उसका इलाज बिना फ़ीस के करना। अगर आप ऐसा कर सकें तो यह मेरे ऊपर बहुत बड़ा अहसान होगा। यह सुनकर डॉक्टर बेहद प्रभावित हुआ। उसने अपना सारा जीवन ग़रीबों की सेवा में लगा दिया। शास्त्री जी ने इसी तरह कई लोगों का जीवन बदला था।

[Inspiring Motivational Hindi Story]

[ भारत-दर्शन संकलन ]

 

 

सर्वोत्तम धर्म

हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अपने सरल स्वभाव के कारण जाने जाते हैं, उनमें अहंकार लेशमात्र भी न था।

'सरस्वती' पत्रिका के संपादन से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् वे अपने गांव चले गए और वहीं खेती-बाड़ी करने लगे। ग्रामवासियों की इच्छा का आदर करते हुए उन्होंने सरपंच का पद स्वीकार कर लिया।

एक दिन जब वे अपने खेतों से होकर गुजर रहे थे, उन्होंने देखा कि एक मजदूर औरत मेड़ पर बैठी रो रही थी। आचार्य द्विवेदी ने जब रोने का कारण पूछा तो उस महिला ने बताया कि उसे सांप ने काट लिया था। द्विवेदी जी ने तुरंत वहीं हंसिए से घाव चीरकर जहर निकाला और फिर अपना जनेऊ तोड़कर उसे कस कर बांध दिया, ताकि विष फैलने न पाए। फिर वे उसे किसी डॉक्टर के पास ले जाने का उपक्रम करने लगे। इस बीच वहाँ गाँव के अनेक लोग आ पहुंचे। सब कुछ देखने-समझने के बाद कुछ गांव वालों ने द्विवेदी जी से कहा, आप ब्राह्मण हैं, यह महिला अछूत है और आपने पवित्र जनेऊ तोड़कर इसके पांव में बांध दिया। यह आपने ठीक नहीं किया। आचार्य ने कहा, "मनुष्य के जीवन की रक्षा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। जो जनेऊ इस स्त्री की रक्षा नहीं कर सकेगा, वह मेरी रक्षा क्या करेगा?"

इंसानियत का धर्म सर्वोत्तम धर्म है।

[Inspiring Hindi Story]

[ भारत-दर्शन संकलन ]

 

शास्त्रीजी को लाला लाजपतराय की सीख

लाला लाजपतराय ने लालबहादुर शास्त्री को जब लोक सेवा मंडल का सदस्य बनाया तो यह सीख दी थी, "लालबहादुर, ताजमहल में दो प्रकार के पत्थर लगे हैं। एक संगमर के सुंदर दिखने वाले पत्थर और दूसरे उसकी नींव में। लोग ताजमहल के उजले और सुंदर पत्थरों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। मगर जिन नींव के मजबूत पत्थरों पर ताजमहल टिका हुआ है वहां किसी की नजर नहीं जाती। तुम्हें नींव का पत्थर बनना है। इसलिए तुम्हें प्रचार-प्रसार से दूर रहकर दिखने वाला नहीं, टिकने वाला पत्थर बनना है।"

शास्त्रीजी जीवन भर प्रचार-प्रसारों से दूर रहे और देश के लिए नींव का पत्थर बने रहे। उन्होंने जीवन भर लालाजी की उस सीख पर अमल किया।

[Inspiring Hindi Story]
[भारत-दर्शन संकलन]

 

दंभी

एक पढ़ा-लिखा दंभी व्यक्ति नाव में सवार हुआ। वह घमंड से भरकर नाविक से पूछने लगा, ‘‘क्या तुमने व्याकरण पढ़ा है, नाविक?''

नाविक बोला, ‘‘नहीं।''

दंभी व्यक्ति ने कहा, ‘‘अफसोस है कि तुमने अपनी आधी उम्र यों ही गँवा दी!''

थोड़ी देर में उसने फिर नाविक से पूछा, "तुमने इतिहास व भूगोल पढ़ा?"

नाविक ने फिर सिर हिलाते हुए ‘नहीं' कहा।

दंभी ने कहा, "फिर तो तुम्हारा पूरा जीवन ही बेकार गया।"

मांझी को बड़ा क्रोध आया। लेकिन उस समय वह कुछ नहीं बोला। दैवयोग से वायु के प्रचंड झोंकों ने नाव को भंवर में डाल दिया।

नाविक ने ऊंचे स्वर में उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘महाराज, आपको तैरना भी आता है कि नहीं?''

सवारी ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे तैरना नही आता।''

"फिर तो आपको अपने इतिहास, भूगोल को सहायता के लिए बुलाना होगा वरना आपकी सारी उम्र बरबाद होने वाली है क्योंकि नाव अब भंवर में डूबने वाली है।'' यह कहकर नाविक नदी में कूद तैरता हुआ किनारे की ओर बढ़ गया।

मनुष्य को किसी एक विद्या या कला में दक्ष हो जाने पर गर्व नहीं करना चाहिए।

[The best Hindi short moral story with lesson]
[भारत-दर्शन संकलन]

 


पथ-प्रदर्शन

"क्या आपके सभी शिष्य निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं?" एक जिज्ञासु ने गौतम बुद्ध से पूछा।

"कुछ करते हैं, कुछ नहीं करते ।" बुद्ध ने उत्तर दिया।

''आप जैसा पथ-प्रदर्शक पाकर भी ऐसा क्यों?" जिज्ञासु ने प्रश्न किया।

"यदि कोई पथिक तुमसे राजमहल का मार्ग पूछे, फिर भटक जाए, तो तुम
क्या करोगे?" बुद्ध ने प्रश्न किया।


''तथागत, मेरा काम केवल रास्ता बताना है। मैं क्या करूँगा?" जिज्ञासु का
उत्तर था।

''श्रमण, मैं क्या करूँगा? मेरा काम केवल पथ-प्रदर्शन है।" बुद्ध का उत्तर था ।

[ भारत-दर्शन संकलन ]

[Hindi moral story]

 


ख़ुशहाली का रास्ता

एक बार हकीम लुक़मान से उसके बेटे ने पूछा, "अगर मालिक ने फरमाया कि कोई चीज मांग, तो मैं क्या मांगूं?"

लुक़मान ने कहा, "परमार्थ का धन।"

बेटे ने फिर पूछा, "अगर इसके अलावा दूसरी चीज मांगने को कहे तो?"

लुक़मान ने कहा, "पसीने की कमाई मांगना।"

उसने फिर पूछा, "तीसरी चीज?"

जवाब मिला, "उदारता।"

चौथी चीज क्या मांगू- "शरम।"

पांचवीं- "अच्छा स्वभाव।"

बेटे ने फिर पूछा, "और कुछ मांगने को कहे तो?"

लुक़मान ने उत्तर दिया, "बेटा, जिसको ये पांच चीजें मिल गईं उसके लिए और मांगने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। ख़ुशहाली का यही रास्ता है और तुझे भी इसी रास्ते से जाना चाहिए।"

[A moral story]

[भारत-दर्शन संकलन]

 

समाधान

एक बूढा व्यक्ति था। उसकी दो बेटियां थीं। उनमें से एक का विवाह एक कुम्हार से हुआ और दूसरी का एक किसान के साथ।

एक बार पिता अपनी दोनों पुत्रियों से मिलने गया। पहली बेटी से हालचाल पूछा तो उसने कहा कि इस बार हमने बहुत परिश्रम किया है और बहुत सामान बनाया है। बस यदि वर्षा न आए तो हमारा कारोबार खूब चलेगा।

बेटी ने पिता से आग्रह किया कि वो भी प्रार्थना करे कि बारिश न हो।

फिर पिता दूसरी बेटी से मिला जिसका पति किसान था। उससे हालचाल पूछा तो उसने कहा कि इस बार बहुत परिश्रम किया है और बहुत फसल उगाई है परन्तु वर्षा नहीं हुई है। यदि अच्छी बरसात हो जाए तो खूब फसल होगी। उसने पिता से आग्रह किया कि वो प्रार्थना करे कि खूब बारिश हो।

एक बेटी का आग्रह था कि पिता वर्षा न होने की प्रार्थना करे और दूसरी का इसके विपरीत कि बरसात न हो। पिता बडी उलझन में पड गया। एक के लिए प्रार्थना करे तो दूसरी का नुक्सान। समाधान क्या हो ?

पिता ने बहुत सोचा और पुनः अपनी पुत्रियों से मिला। उसने बडी बेटी को समझाया कि यदि इस बार वर्षा नहीं हुई तो तुम अपने लाभ का आधा हिस्सा अपनी छोटी बहन को देना। और छोटी बेटी को मिलकर समझाया कि यदि इस बार खूब वर्षा हुई तो तुम अपने लाभ का आधा हिस्सा अपनी बडी बहन को देना।

[Aspirational Hindi Story]

[भारत-दर्शन संकलन]

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