किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।

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डॉ॰ सुधेश के मुक्तक (काव्य)    Print  
Author:डॉ सुधेश
 

प्राण का पंछी सवेरे क्यों चहकता है
शबनम बूँद से नया बिरवा लहकता है
हड्डियों के पसीने से इसे सींचा है
फूल मेरे चमन का ज़्यादा महकता है ।

हम ग़म खाते हैं आँसू पीते हैं
केवल अपने ही लिए न जीते हैं
मानवता की भी पहचान हमें है
हम रिश्तों में ही मरते जीते हैं ।

दर्द का चिर संग है तो रहे
कौन कैसे उसे बरजे कहे
पागल मन झुठला रहा उस को
तन की नियति है दर्द को सहे ।

मेरा धन मेरे गीतों का सरमाया
गीतों में अपना दुनिया का दुख गाया
आलोचक दादा पूछ रहे पर मुझ से
किस किस कविसम्मेलन में मैं ने गाया ?

दर्द की शिद्दत कभी घट जाएगी
कहानी शीर्षकों में बंट जाएगी
रो कर कटे या कटे हँसते हुए
जो बची है ज़िन्दगी कट जाएगी ।

वह नहीं बनता जो ज़रूरी काम
हर वक़्त रहता मुझे कोई काम
जुगनुओं से चमकते हैं कभी सुख
ज़िन्दगी ग़मों की दास्ताँ का नाम ।

सीमेण्ट जंगल कहीं आबादी नहीं
आराम सारे हैं पर बुनियादी नहीं
प्रगति पर हूँ मगर इक ख़्वाब सा रंगीन
देश तो आज़ाद पर आज़ादी नहीं ।

मुझे भी साथ ले लिया होता
कुछ तो पुण्य भी किया होता
रोज़ शब्दों से खेलते हो
काम भी कुछ कर लिया होता ।

आप की वाणी सदा आकाशवाणी
वह शहद सी मधुर और क़ल्याणी
धरती पर उतर कर देख तो कभी लेते
कैसे जी रहे हैं मर मर के प्राणी ।

भक्तजन की भीड़ में मैं भी लगा हूँ
नहीं मैं पण्डित पुजारी का सगा हूँ
माँ शारदे ! मुझे भी दो अपनी कृपा
शब्द की ले आरती मैं भी जगा हूँ ।

खोखले जनतन्त्र नारे क्यों लिखूँ ?
खोखले हैं शब्द सारे क्यों लिखूँ ?
शब्द ही बस शब्द गुंजित हैं यहाँ
खो गये हैं अर्थ सारे क्यों लिखूँ?

दिल अगर बेचैन हो क्या कीजिए ?
पास श्रोता भी न हो क्या कीजिए ?
कभी कोई मुझ को पढ़े ना पढ़े
मगर लिखने के सिवा क्या कीजिए !

किस ने कहा कि तुम सिर्फ कविता लिखो
पुरुष को राम नारी को सीता लिखो
महाभारत के भगोड़े बने तो क्यों
कृष्ण की सामर्थ्य बिना गीता लिखो ?

आँसू दिल की भाषा है
घुटी घुटी अभिलाषा है
प्यार जिसे कहते उस की
यह प्यारी परिभाषा है ।

तम की निशा निराशा है
प्रात: लाती आशा है
इन्द़धनुष सा सतरंगी
दुनिया एक तमाशा है ।

दिल का दिल से संवाद है
यह वाद नहीं न विवाद है
इस घायल दिल में दर्द जो
कविता उस का अनुवाद है ।

दुनिया में द्वन्द्व विवाद है
वह युद्धों से बर्बाद है
बस प्यार जहाँ मेहमान है
दिल की बस्ती आबाद है ।

आज कल क्या कहें रिंश्तों से
अर्थ में तब्दील रिश्तों से
आदमीयत की चमक ग़ायब
शक्ल से दिखते फ़रिश्तों से ।

प्यार दिखता कहाँ रिंश्तों में
स्वाद किश्मिश में न पिस्तों में
जो धरे हैं उच्च सिंहासन
गिने जाते हैं फ़रिश्तों में ।

दूर रह कर पास आते हैं
पास रह कर प्यास पाते हैं
कुछ पास कुछ दूर रहिये तो
तन मन पास पास आते हैं ।

प्रेम की महिमा प्रेमी समझता है
दूसरा दूर से ही क्यों उलझता है
यह प्रश्न क्या है बस इक पहेली है
जो फिर फिर उलझता फिर सुलझता है।

-- डॉ॰ सुधेश
314 सरल अपार्मैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १०
दिल्ली 110075
फ़ोन 9350974120
ई-मेल: dr.sudhesh@gmail.com

 

 

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