मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
प्याज़ (काव्य)    Print  
Author:स्वरांगी साने
 

बहुत सारा
प्याज़ काटने बैठ जाती थी माँ।
कहती थी मसाला भूनना है।

दीदी को भी बड़ा प्यारा लगता
प्याज़ काटना।

तब समझ नहीं पाती थी
इतना अच्छा क्या है
प्याज़ काटने में

आज पूछती है बेटी
क्या हुआ?
और वो कह देती है
कुछ नहीं
प्याज़ काट रही हूँ।

- स्वरांगी साने
   ई-मेल: swaraangisane@gmail.com

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