राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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कविताएं
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रंगीन पतंगें - अब्बास रज़ा अल्वी | ऑस्ट्रेलिया

अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे
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माँ  - जगदीश व्योम

माँ कबीर की साखी जैसी
तुलसी की चौपाई-सी
माँ मीरा की पदावली-सी
माँ है ललित रुबाई-सी।
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नये सुभाषित - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

पत्रकार
...

भूखे-प्यासे  - देवेन्द्र कुमार मिश्रा

वे भूखे प्यासे, पपड़ाये होंठ
सूखे गले, पिचके पेट, पैरों में छाले लिए
पसीने से तरबतर, सिरपर बोझा उठाये
सैकड़ो मील पैदल चलते
पत्थर के नहीं बने
पथरा गये चलते-चलते।
...

एक वाक्य - धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti

चेक बुक हो पीली या लाल,
दाम सिक्के हों या शोहरत --
कह दो उनसे
जो ख़रीदने आये हों तुम्हें
हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होता है!
...

जवाब - डॉ सुनीता शर्मा | न्यूज़ीलैंड

दोहराता रहेगा इतिहास
भी युगों-युगों तक यह
दुर्योधन - दुशासन की
कुटिल राजनीति की
बिसात पर खेली गयी
द्रौपदी चीर-हरण जैसी
प्रवासी मजदूरों की
अनोखी कहानी,
जब पूरी सभा रही मौन
और मानवता - सिसकती
व कराहती हुई
दम तोड़ती रही थी...
इन प्रश्नों का जवाब
एक दिन ये पीढ़ी तुमसे
अवश्य मांगेगी...
मांगेगी अवश्य।
...

उपलब्धि - धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti

मैं क्या जिया ?
...

कौन है वो? - प्रीता व्यास | न्यूज़ीलैंड

कोई है
जिसके पैरों कि आहट से
चौंक उठते हैं कान
कोई है
जिसकी याद
भुला देती है सारे काम
कोई है
जिसकी चाह
कभी बनती है कमजोरी
कभी बनती है शक्ति
कोई है
जो कंदील सा टिमटिमाता है
मन के सूने गलियारों में
कोई है
जो प्रतिध्वनि सा गूंजता है
ह्रदय कि प्राचीरों में
कौन है वो?
तुम हो, तुम हो, तुम्हीं तो हो।
...

ज़िंदगी तुझे सलाम - डॉ पुष्पा भारद्वाज-वुड | न्यूज़ीलैंड

सोचा था अभी तो बहुत कुछ करना बाक़ी है
अभी तो घर भी नहीं बसाया
ना ही अभी किसी को अपना बनाया।
...

जीवन - नरेंद्र शर्मा

घडी-घड़ी गिन, घड़ी देखते काट रहा हूँ जीवन के दिन 
क्या सांसों को ढोते-ढोते ही बीतेंगे जीवन के दिन? 
सोते जगते, स्वप्न देखते रातें तो कट भी जाती हैं, 
पर यों कैसे, कब तक, पूरे होंगे मेरे जीवन के दिन?
...

अंततः - जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas

बाहर से लहूलुहान
आया घर
मार डाला गया
अंततः
...

पीर  - डॉ सुधेश

हड्डियों में बस गई है पीर ।

पाँव में काँटा लगा जैसे
जो बढ़ते क़दम को रोके
मगर इस का क्या करूँ
जो गई मेरी हड्डियों को चीर ।
...

दुर्दिन  - अलेक्सांद्र पूश्किन

स्वप्न मिले मिट्टी में कब के,
और हौसले बैठे हार,
आग बची है केवल अव तो
फूँक हृदय जो करती क्षार।
...

हैं खाने को कौन - गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

कुछ को मोहन भोग बैठ कर हो खाने को 
कुछ सोयें अधपेट तरस दाने-दाने को
कुछ तो लें अवतार स्वर्ग का सुख पाने को 
कुछ आयें बस नरक भोग कर मर जाने को 
श्रम किसका है, मगर कौन हैं मौज उड़ाते 
हैं खाने को कौन, कौन उपजा कर लाते?
...

स्वयं से  - रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

आजकल
तुम
धीमा बोलने लगी
या
मुझे
सुनाई देने लगा
कम?
...

परमात्मा रोया होगा - संतोष सिंह क्षात्र

कुछ पढ़े-लिखे मूर्खों के कारण
कितनों ने अपनों को खोया होगा।
स्वयं की रचना पर
परमात्मा फूट फूट कर रोया होगा।।
...

मीठी लोरी  - डाक्टर सईद अहमद साहब 'सईद' बरेलवी

लाडले बापके, अम्मा के दुलारे सो जा,
ऐ मेरी आँख के तारे, मेरे प्यारे सो जा।
गोद में रोज जो रातों को सुलाती है तुझे,
मीठी वो नींद तेरी, देख, बुलाती तुझे॥
...

सीख - हितेष पाल

अपने अपने दायरे रहना सीख लो
ज़रा सा क़ायदे में रहना सीख लो।
अभी तो क़ुदरत ने सिर्फ़ समझाया है
अपना असली रूप कहाँ दिखलाया है?
मनुष्य को अपना दायरा बताया है
फिर भी उसे कुछ समझ ना आया है।
क़ुदरत के दायरे का मज़ाक़ बनाया है
फिर कहता है क़ुदरत ने क़हर मचाया है।
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सीख लिया - प्रभा मिश्रा

अब उलझनों में अटकना छूट गया।
क्योंकि मैंने अब संभलना सीख लिया।
कभी राहों में डगमगाते हुए चलते थे
अब अपनी हर राह पर बेफिक्र चलना सीख लिया।
कभी मेरी मंजिल का कोई ठिकाना तय ना था
पर अब मैंने अपनी मंजिलें खुद से बनाना सीख लिया।
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काश !  - साकिब उल इस्लाम

काश कि कोई ऐसा दिन हो जाए
ज़माने के सारे सितम खो जाएं।
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थोड़ा इंतजार - राहुल सूर्यवंशी

नियमों से नहीं, तो निवेदन से रुक
डंडे से नहीं, तो ठंडे से रुक
महामारी की है भरमार, तू कर थोड़ा इंतजार।
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चले तुम कहाँ - नरेश कुमारी

ओढ़कर सोज़-ए-घूंघट
चले तुम कहाँ?
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औरत फूल की मानिंद है  - रश्मि विभा त्रिपाठी

फूल
किस कदर
घबरा रहा है,
एक
भंवरा इर्द-गिर्द
उसके मंडरा रहा है।
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स्वीकार करो  - रूपा सचदेव

मैं जैसी हूँ
वैसी ही मुझे स्वीकार करो।
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पिछली प्रीत - जाँ निसार अख्तर

हवा जब मुँह-अँधेरे प्रीत की बंसी बजाती है,
कोई राधा किसी पनघट के ऊपर गुनगुनाती है,
मुझे इक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!
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मौत की रेल - डॉ॰ चित्रा राठौड़

ज़िन्दगी की पटरियों पर से मौत की रेल गुज़र गई
‌भूख और मजबूरी कुछ और बदनसीबों को निगल गई।
जहॉं कुछ देर पहले तक शोर था आस भरी बातों का
अब वहीं पर मरघट सी मनहूसियत पसर गई।
रोटी-सब्ज़ी और सामान बिखर गया पटरियों पर
इंसानी देह लेकिन पोटलियों में सिमट गई।
कोरोना महामारी का तो फ़कत बहाना रहा
हक़ीक़त में रोज़ी-रोटी की फिक्र ही इन गरीबों को निगल गई।
ज़िन्दगी की पटरियों पर से मौत की रेल गुज़र गई
‌भूख औ' मजबूरी कुछ और बदनसीबों को निगल गई।
...

आत्मचिंतन - डॉ॰ कामना जैन

चिंतित हो गया है किंचित,
आज मानव,
इस आत्मचिंतन की अवधि में।
जीवन पर जब आया संकट,
तब समझ वह पाया,
इस अखंड ब्रह्मांड की लीला।
अजेय प्रकृति को विजित मान,
आज अपने ही पापों की गठरी को ढो रहा।
मानव का अहंकार,
कर रहा था प्रकृति का तिरस्कार।
रोजी-रोटी और सुविधाओं की आपाधापी में,
चर-अचराचर जगत और स्वयं से भी दूर हो गया।
बढ़ती बाढ़ों, भूकंपों, तूफानों के कहरों से,
अब तो विज्ञान भी डोल गया।
असीमित आकांक्षाओं ने ही तो दावानल दहकाया था,
बेजुबान मासूम जीवो की चितकार
ने भी यही दिखलाया था।
मारा-मारा, भागा-भागा फिर रहा था मानव ,
पर इस दहक को न रोक पाया था।
फिर मेघों की रिमझिम बूंदों ने यह जतलाया था,
प्रकृति बड़ी बलवान है।
मानव के बस में नहीं कुछ,
जब प्रकृति कुपित होती है,
प्लेग, चेचक, सार्स, स्वाइन और इबोला,
सब प्रकृति के हस्ताक्षर हैं।
कोरोना भी पदचाप उसी की,
पुनः उसी ने चेताया है।
ले लो सबक अनूठे,
इस आत्मचिंतन की अवधि में,
अन्यथा हाहाकार मच जाएगा।
मां का हृदय छलनी हुआ तो,
मानव जीवन पर भी,
विराम चिन्ह लग जाएगा,
विराम चिन्ह लग जाएगा।
...

कब तक लड़ोगे - बेबी मिश्रा

मत लड़ो सब जो चले गए उनसे डरो सब
क्या पता कल क्या हो
आज उन पर है कल तुम पर हो
आसान है कहना मुश्किल है सहना
संभलो कब तक लड़ोगे ।
...

मुक्तक - ताराचंद पाल 'बेकल'

समय देख कर आदमी यदि संभलता,
नया युग धरा पर ज़हर क्यों उगलता!
तरसती न चाहें, भटकती न साधें,
अगर आदमी, आदमी को न छलता।
...

जै-जै कार करो - अजातशत्रु

ये भी अच्छे वो भी अच्छे
जै-जै कार करो
डूब सको तो
चूल्लू भर पानी में डूब मरो
...